गीता श्लोक 8/27….
अर्जुन तू योग युक्त हो जा …
भगवान कहते हैं कि हे प्रथा नंदन अर्जुन ! इन दोनों मार्गों को जानने वाला कोई भी योगी मोहित नहीं होता । अतः हे अर्जुन! तू सब समय में योग युक्त अर्थात समता में स्थित हो जा ।
भगवान कहते हैं कि शुक्ल मार्ग प्रकाश मय है और कृष्ण मार्ग अंधकार मय है । जिनके अंतःकरण में उत्पत्ति विनाश सील वस्तुओं का महत्व नहीं है और जिनके उद्देश्य ध्येय में प्रकाश रूप अर्थात ज्ञान रूप परमात्मा ही हैं, ऐसे परमात्मा की तरफ चलने वाले साधक शुक्ल मार्गी है अर्थात उनका मार्ग प्रकाश मय है ।
परंतु संसार में जो रचे पचे हैं और उनके सांसारिक पदार्थों का संग्रह करना और उनसे सुख भोगना ही ध्येय होता है ऐसे मनुष्य तो घोर अंधकार में ही हैं । परंतु जो भोगने के उद्देश्य से यहां के भोगों से संयम करके यज्ञ,तप, दान आदि शास्त्र विहित शुभ कर्म करते हैं और करने के बाद स्वर्ग आदि ऊंची भोग भूमियों में जाते हैं । यद्यपि ऐसे भक्त मनुष्यों से ऊंचे उठे हुए हैं, फिर भी जन्म मरण वाले मार्ग में होने के कारण अंधकार में ही हैं ।
गीता श्लोक 8/28….
योगी परमात्मा को प्राप्त होता है ..
भगवान कहते हैं कि योगी अर्थात भक्त इसको (अर्थात इस अध्याय में वर्णित विषय को) जानकर वेदों में, यज्ञों में, तपों में तथा दान में जो_ जो पुण्य फलों का अतिक्रमण कर जाता है और आदि स्थान अर्थात आरंभिक अर्थात शुरूआती स्थान में, परमात्मा को प्राप्त हो जाता है ।
यज्ञ, दान, तप, तीरथ, व्रत आदि जितने भी शास्त्रीय उत्तम से उत्तम कार्य हैं और उनका जो फल है, वह विनाशी ही होता है । जब उत्तम से उत्तम कार्य का भी आरंभ और समाप्ति होती है, तो फिर उस कार्य से उत्पन्न होने वाला फल अविनाशी कैसे हो सकता है ? जीव स्वयं परमात्मा का अविनाशी अंश होकर भी विनाशी पदार्थ में फंसा रहे तो इसमें उसकी अज्ञानता ही मुख्य है । अतः मनुष्य इस अध्याय में वर्णित विषय के रहस्य को समझ लेता है, वह यज्ञ, तप, दान आदि सभी पुण्य फलों का अतिक्रमण कर जाता है अर्थात वह इन सब पर विजय प्राप्त कर लेता है ।
अध्याय _9
राजविद्या_राजगुह्य _योग
श्लोक 9/1
भगवान द्वारा अर्जुन के लिए विज्ञान सहित ज्ञान……..
श्री भगवान बोले यह अत्यंत गोपनीय विज्ञान सहित ज्ञान, दोष दृष्टि रहित तेरे लिए तो मैं फिर अच्छी तरह से कहूंगा, जिसको जानकर तू अशुभ से अर्थात जन्म मरण रूप संसार से मुक्त हो जाएगा ।
भगवान के मन में जिस तत्व को या विषय को कहने की इच्छा है,उसकी तरफ लक्ष्य करने के लिए “इदम”पद कहा गया है । उसी तत्व को जो भगवान के मन और बुद्धि में स्थित है, की महिमा कहने के लिए ही उसको गुह्यतम (गीता 9/34 )कहा गया है अर्थात वह तत्व अत्यंत गोपनीय है ।
इसी को अन्य स्थानों पर राजगुह्यम तथा सर्वगुह्यम (गीता 18/64 )भी कहा गया है ।
अनसूयवे _ इसका तात्पर्य है कि हे अर्जुन तुम भगवान में दोष दृष्टि रहित हो अर्थात तुम भगवान में दोष नहीं ढूंढते, सदा उनके भजन में लगे रहते हो ।
प्रवक्ष्यामि _ इस पद का तात्पर्य है कि मैं यह ज्ञान अच्छी तरह से कहूंगा ।
_ मैं तेरे लिए गोपनीय बात को फिर से अच्छी तरह अर्थात समझाकर कहूंगा ।
_ उस गुह्यतम बात को विलक्षण रीति से अर्थात विशेष तरीके से कहूंगा ।
ज्ञान_ इन सब बातों को दृढ़ता से मानना “ज्ञान” है ।
विज्ञान_ इस ज्ञान को जानना या अनुभव करना “विज्ञान” है ।
भगवान ने_ इसी ज्ञान को गुह्यतम कहा गया है ।
गीता श्लोक 9/2
यह विज्ञान सहित ज्ञान संपूर्ण विद्याओं का राजा है ……
भगवान कहते हैं कि यह विज्ञान (तर्क) सहित ज्ञान अर्थात समग्र रूप संपूर्ण विद्याओं का राजा और संपूर्ण गोपनीयों का राजा है । अतः यह अति पवित्र तथा अति श्रेष्ठ है और फल भी प्रत्यक्ष है । यह धर्म है, अविनाशी है और करने में बहुत सुगम है अर्थात इसको प्राप्त करना बहुत सुगम है ।
राजविद्या _ यह विज्ञान सहित ज्ञान संपूर्ण विद्याओं का राजा है क्योंकि इसको ठीक तरह से जान लेने के बाद कुछ भी जानना शेष नहीं रहता । पहले भगवानh ने कहा था कि मेरे समग्र रूप को जानने के बाद कुछ भी जानना बाकी नहीं रहता ।
राजगुह्ययम _ संसार में गुप्त रखने योग्य जितनी बातें हैं, उन सब बातों का यह राजा है । क्योंकि संसार में सबसे बड़ी दूसरी कोई रहस्य की बात है ही नहीं ।
गीता श्लोक 9/3
मुझे न मानने वाले ( मुझे न पूजने वाले) बार बार जन्म लेते हैं ..
भगवान कहते हैं कि है परंतप( दुष्टों को कष्ट पहुंचाने वाले, दुष्टों को तपाने वाले) अर्जुन ! इस धर्म की महिमा पर श्रद्धा न रखने वाले मनुष्य मुझे प्राप्त न होकर मृत्यु रूप संसार के मार्ग में लौटते रहते हैं अर्थात बार-बार जन्मते मरते रहते हैं ।
धर्म धर्म दो तरह का होता है_ स्वधर्म और परधर्म । मनुष्य का जो अपना स्वरूप है, वह उसके लिए स्वधर्म है और प्रकृति तथा प्रकृति का कार्य करने के लिए परधर्म है । मनुष्य अपने शरीर को,कुटुंब को, धन संपत्ति वैभव को, निःसंदेह रूप से उत्पत्ति_ विनाश शील और प्रतिक्षण परिवर्तनशील जानते हुए भी, उन पर विश्वास करते हैं, श्रद्धा करते हैं, उनका आश्रय लेते हैं । वह ऐसा विचार नहीं करते कि इस शरीर आदि के साथ हम कितने दिन रहेंगे और यह हमारे साथ कितने दिन रहेगा । श्रद्धा तो स्वधर्म पर होनी चाहिए,परंतु वह हो गई पर धर्म पर ।
संसार के रास्ते पर तो मरना ही मरना है,विनाश ही विनाश है । परम धाम एक ऐसा स्थान है, जहां पहुंचने पर बार बार आने जाने का चक्कर खत्म हो जाता है ।
गीता श्लोक 9 / 4 व 5…..
सभी प्राणी मेरे में स्थित हैं ….
भगवान कहते हैं कि यह संसार मेरे निराकार रूप से व्याप्त है । सभी प्राणी मेरे में स्थित हैं, परंतु मैं उनमें स्थित नहीं हूं । मेरे इस ईश्वर संबंधी योग सामर्थ्य को देख सभी प्राणियों को उत्पन्न करने वाला और प्राणियों का धारण एवं भरण _ पोषण करने वाला मेरा स्वरूप उन प्राणियों में स्थित नहीं है ।
मया का अर्थ है _मेरा साकार रूप तथा
अव्यक्त मूर्तिना _से निराकार रूप बताया गया है ।
इसका तात्पर्य यह हुआ कि भगवान साकार रूप से भी हैं और निराकार रूप से भी है अर्थात व्यक्त रूप से भी हैं और अव्यक्त रूप से भी हैं । वास्तव में भगवान दोनों रूप में है और वह एक ही है निर्गुण और सगुण भगवान के अलग-अलग विशेषण है और अलग- अलग नाम है लेकिन भगवान तो एक ही है।
सभी प्राणी मेरे में स्थित है । प्राणी मेरे को छोड़कर रह नहीं सकते । क्योंकि सारे प्राणी मेरे से ही उत्पन्न होते हैं, मेरे में स्थित रहते हैं और मेरे में ही ली हो जाते हैं । उनकी उत्पत्ति स्थिति और प्रलय जो कुछ परिवर्तन होता है, वह सब मेरे में ही होता है अतह वे सब प्राणी मेरे में ही स्थित है।
गीता श्लोक 9/6……
सभी प्राणी मुझ में ही स्थित हैं / मुझ में ही समाए हुए हैं …..
भगवान कहते हैं कि जैसे सब जगह बिचरने वाली हवा / वायु आकाश में स्थित रहती है, ऐसे ही संपूर्ण प्राणी मुझ में ही स्थित रहते हैं, ऐसा हे अर्जुन तुम मान लो ।
जिस प्रकार सब जगह विचरण करने वाली महान वायु नित्य ही आकाश में स्थित रहती है, कहीं बिना स्पंदन के अर्थात बिना कंपन के रहती है, कहीं सामान्य रूप से क्रियाशील रहती है, कहीं बड़े बेग से चलती है, परंतु किसी भी रूप से चलने वाली वायु आकाश से अलग नहीं होती । चाहे वायु कहीं रुकी हुई मालूम पड़ती है, परंतु वह रहती आकाश में ही है । वह आकाश को छोड़कर कहीं नहीं जा सकती । इस प्रकार तीनों लोकों और 14 भवनों में घूमने वाले स्थावर जंगम सभी प्राणी मेरे में ही स्थित रहते हैं ।
गीता श्लोक 9/7….
सभी प्राणी मेरी प्रकृति को प्राप्त होते हैं ….
भगवान कहते हैं कि एक कुंती नंदन अर्जुन कपों का छह होने पर अर्थात महा प्रलय के समय सभी प्राणी मेरी प्रकृति को प्राप्त होते हैं और कपों के आड़ अर्थात आरंभ में अर्थ अर्थात शुरुआत में महासर्ग या महाउदय के समय मैं फिर उनकी रचना करता हूं ।
भगवान कहते हैं कि सभी प्राणी मेरे ही अंश से हैं और सदा ही मेरे में ही स्थित रहने वाले हैं । परंतु वह प्रकृति और प्रकृति के कार्य शरीर आदि के साथ तालमेल या तादात्म्य करके जो कुछ भी करते कार्य करते हैं, उन कर्मों का तथा उनके फलों के साथ संबंध जुड़ जाता है, इससे बार-बार जन्मते और मरते रहते हैं । महाप्रलय अर्थात महाविनाश का समय आता है, जिसमें ब्रह्मा जी अपनी 100 वर्ष की आयु पूरी करके विलीन हो जाते हैं । उस समय प्रकृति के पर्वत हुए हुए सभी प्राणी प्रकृति जन्य संबंध को लेकर प्रकृति में लीन हो जाते हैं ।
गीता श्लोक 9/8….
मैं बार बार प्रकृति की रचना करता हूं …..
भगवान कहते हैं की प्रकृति के वश में होने से परतंत्र हुए, इस संपूर्ण प्राणी जगत अर्थात प्राणी समुदाय के कल्पों के आदि में मैं अपनी प्रकृति को वश में करके बार-बार रचना करता हूं ।
भगवान का कहना है की महाप्रलय या महाविनाश के समय सभी प्राणी अपनी व्यष्टि प्रकृति में लीन हो जाते हैं । व्यस्ति प्रकृति समस्टि प्रकृति में लीन हो जाती है । समस्टी प्रकृति परमात्मा में लीन हो जाती है । परंतु जब महासर्ग अर्थात महाउत्पत्ति अथवा महाविकास का समय आता है, जीवों के कर्मफल देने के लिए भगवान उन्मुख हो जाते हैं ।
यह जीव महा प्रलय अर्थात महाविनाश के समय प्रकृति में लीन हो जाते हैं तो तत्व है प्रकृति का कार्य प्रकृति में ही लीन हुआ था और परमात्मा का अंश चेतन समुदाय परमात्मा में लीन हुआ था, अगर वह परमात्मा में लीन होने से पहले गुणों का त्याग कर देता है, तो परमात्मा में लीन होने पर सदा के लिए मुक्त हो जाता है अर्थात जन्म मरण बंधन से छूट जाता है ।






