मयूर टाइम्स न्यूज़ ✍️
कोटा। जन्माष्टमी का पर्व भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के साथ-साथ उनकी बाल एवं राजसी लीलाओं को स्मरण करने का अवसर है। कोटा की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान में इस पर्व का महत्व इसलिए भी खास है, क्योंकि यहां कृष्ण भक्ति केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है। मंदिरों में राग, कीर्तन, श्रृंगार, भोग, इत्र और ऋतु आधारित सेवा के माध्यम से ठाकुरजी की आराधना की जाती है।
पुराने कोटा शहर के पाटनपोल क्षेत्र में स्थित श्री बड़े मथुराधीश मंदिर इस परंपरा का प्रमुख केंद्र है। राजस्थान पर्यटन विभाग भी पाटनपोल स्थित मथुराधीश मंदिर को प्रथम वल्लभपीठ के रूप में दर्ज करता है और बताता है कि रियासतकाल से कोटा कृष्ण भक्ति का प्रमुख केंद्र रहा है। जन्माष्टमी जैसे अवसरों पर देश-विदेश में रहने वाले प्रथम पीठ के अनुयायी दर्शन के लिए कोटा आते हैं।
इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक है हवेली संगीत। यहां प्रभु की सेवा के अलग-अलग अवसरों के अनुरूप कीर्तन और रागों का विधान है। वहीं दूसरी ओर मौसम और ऋतु के अनुसार ठाकुरजी की इत्र सेवा में भी परिवर्तन किया जाता है। गर्मी में शीतल प्रभाव वाले सुगंधित इत्र और सर्दी में अपेक्षाकृत गर्म तासीर वाले इत्रों का उपयोग किए जाने की परंपरा बताई जाती है।
यानी यहां भगवान की सेवा में संगीत भी ऋतु के साथ बदलता है और सुगंध भी।
हवेली संगीत—जब राग बन जाता है ठाकुरजी की सेवा
पुष्टिमार्गीय परंपरा में संगीत को केवल मनोरंजन या मंचीय प्रस्तुति के रूप में नहीं देखा जाता। यह ठाकुरजी की दैनिक सेवा का हिस्सा है। हवेली संगीत में प्रभु की दिनचर्या और सेवा के अलग-अलग चरणों के अनुरूप पदों का गायन किया जाता है।
संगीत संबंधी शोध साहित्य में हवेली संगीत को पुष्टिमार्गीय सेवा-पद्धति से जोड़ा गया है। इसमें मंगला, ग्वाल, श्रृंगार, राजभोग, उत्थापन, भोग, संध्या आरती और शयन जैसे सेवा-क्रमों के अवसर पर राग और पदों का प्रयोग होने का उल्लेख मिलता है।
इसी कारण हवेली संगीत की मूल भावना को एक वाक्य में कहा जाए तो—
“जैसी प्रभु की सेवा, वैसा ही कीर्तन।”
प्रभु को जगाने के समय का भाव अलग होता है, श्रृंगार के समय अलग और राजभोग के समय अलग। उसी के अनुरूप पद और संगीत का वातावरण निर्मित किया जाता है।
अष्टछाप कवियों के पदों से जुड़ी परंपरा
हवेली संगीत की पहचान अष्टछाप कवियों के पदों से भी गहराई से जुड़ी है। सूरदास, कुंभनदास, परमानंददास, कृष्णदास, गोविंदस्वामी, नंददास, छीतस्वामी और चतुर्भुजदास को अष्टछाप के आठ प्रमुख कवियों के रूप में परंपरा में स्मरण किया जाता है।
इन पदों में भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं, व्रज भाव, गोचारण, श्रृंगार, भोग और विभिन्न सेवा प्रसंगों की अभिव्यक्ति मिलती है।
हवेली संगीत में राग और समय का संबंध भी महत्वपूर्ण है। उपलब्ध सांस्कृतिक संदर्भों में ऋतु और पर्व के अनुसार रागों के प्रयोग की परंपरा का उल्लेख मिलता है।
इसलिए मंदिर में गूंजने वाला कीर्तन केवल शब्दों का गायन नहीं, बल्कि समय, ऋतु, सेवा और भाव का संगीतात्मक संयोजन है।
बड़े मथुराधीश मंदिर की एक अलग पहचान—एकल गायन
कोटा की इस परंपरा की एक उल्लेखनीय विशेषता एकल गायन बताई जाती है। डॉ. गुंजन हाड़ा के शोध से संबंधित उपलब्ध सामग्री के अनुसार बड़े मथुराधीश मंदिर में ठाकुरजी की सेवा के दौरान एकल गायन की परंपरा रही है।
यह विशेषता इसे अन्य प्रमुख पुष्टिमार्गीय केंद्रों की कुछ गायन परंपराओं से अलग पहचान देती है। यहां गायन का उद्देश्य किसी मंच पर कलाकार की प्रस्तुति देना नहीं, बल्कि सेवा के दौरान ठाकुरजी के समक्ष राग और पद अर्पित करना है।
यही कारण है कि इस गायन में शुद्ध स्वरूप और परंपरागत राग-विधान को विशेष महत्व दिया जाता है।
आठ प्रहर की सेवा में संगीत का संसार
पुष्टिमार्गीय परंपरा में ठाकुरजी की सेवा को दिन के विभिन्न चरणों में विभाजित किया गया है। मंगला से लेकर शयन तक प्रत्येक झांकी का अपना भाव है।
मंगला
प्रातःकाल प्रभु को जगाने की सेवा। इस समय के पदों में जागरण और प्रभु के दर्शन का भाव प्रमुख रहता है।
ग्वाल
बाल स्वरूप में श्रीकृष्ण के गोचारण से जुड़े भावों की अभिव्यक्ति।
श्रृंगार
ठाकुरजी के वस्त्र, आभूषण और श्रृंगार के अनुरूप पदों का गायन।
राजभोग
प्रभु को मुख्य भोग अर्पित करने की सेवा। इस दौरान वातावरण में विशेष भक्ति भाव रहता है।
उत्थापन
विश्राम के बाद प्रभु के पुनः जागरण की सेवा।
भोग
दोपहर या संध्या की सेवा व्यवस्था के अनुरूप पदों का गायन।
संध्या आरती
दिन के समापन की ओर बढ़ती सेवा में आरती और भक्ति संगीत का विशेष महत्व।
शयन
रात्रि में प्रभु को विश्राम कराने की सेवा और शयन से जुड़े पद।
इस प्रकार मंदिर में संगीत पूरे दिन की सेवा व्यवस्था के साथ चलता है।
ऋतु बदलते ही बदल जाते हैं राग और कीर्तन
हवेली संगीत की खूबसूरती यह है कि यह प्रकृति और ऋतु से अलग नहीं है।
वसंत में वसंत से जुड़े राग और पद, वर्षा ऋतु में वर्षा भाव वाले राग तथा विभिन्न पर्वों पर उत्सव के अनुरूप संगीत का प्रयोग किए जाने की परंपरा का उल्लेख मिलता है।
अर्थात मंदिर में संगीत की दुनिया स्थिर नहीं है। समय बदलता है तो भाव बदलता है और भाव के साथ राग का वातावरण भी बदलता है।
यही परंपरा जन्माष्टमी के अवसर पर और अधिक जीवंत हो जाती है, जब पूरा वातावरण श्रीकृष्ण जन्म और उनकी बाल लीलाओं के भाव से भर जाता है।
संगीत के साथ इत्र भी बदलता है ऋतु के अनुसार
कोटा के मंदिरों में ठाकुरजी की सेवा की एक और आकर्षक परंपरा इत्र सेवा है।
मान्यता और मंदिर परंपरा के अनुसार ऋतु के अनुरूप सुगंध का चयन किया जाता है। गर्मी में शीतल प्रभाव वाले इत्रों को प्राथमिकता दी जाती है, जबकि सर्दियों में गर्म तासीर वाले इत्रों का प्रयोग किया जाता है।
आषाढ़ और गर्मी के दिनों में मोगरा, केवड़ा, जूही, खस और चंदन जैसी सुगंधों का प्रयोग किए जाने की परंपरा बताई जाती है। इनकी महक मंदिर के वातावरण में फैलकर श्रद्धालुओं को भी अलग अनुभव कराती है।
यह सेवा केवल सुगंध फैलाने तक सीमित नहीं है। ठाकुरजी के श्रृंगार और सेवा के साथ इसे जोड़ा जाता है।
100 साल पुरानी इत्रदानी में सुरक्षित है परंपरा की खुशबू
पाटनपोल स्थित बड़े मथुराधीश मंदिर की इत्र सेवा से जुड़ी एक खास बात सामने आती है। मंदिर में करीब 100 वर्ष पुरानी इत्रदानी सुरक्षित होने की जानकारी दी जाती है।
इससे भी अधिक रोचक बात यह बताई जाती है कि इसमें खस, चंदन, मोगरा और केवड़ा जैसे पारंपरिक इत्रों से जुड़ी पुरानी सामग्री सुरक्षित रही है।
यह इत्रदानी केवल एक वस्तु नहीं, बल्कि मंदिर की सेवा परंपरा की स्मृति के रूप में देखी जा सकती है।
पीढ़ियां बदल गईं, शहर का स्वरूप बदल गया, लेकिन ठाकुरजी की सेवा में सुगंध का यह भाव आज भी कायम है।
बड़े महाप्रभुजी मंदिर में खसखस का बंगला
गर्मी के दिनों में बड़े महाप्रभुजी मंदिर में ठाकुरजी की सेवा के लिए खसखस का बंगला सजाने की परंपरा भी आकर्षण का केंद्र रहती है।
खस की सुगंध और ठंडक का भाव गर्मी के मौसम में मंदिर के वातावरण को विशेष बनाता है। खसखस के पर्दों पर पानी का छिड़काव किए जाने से सुगंधित और शीतल वातावरण तैयार होता है।
मंदिर के महंत विनय बावा के अनुसार रथयात्रा तक ठाकुरजी की सेवा में मोगरा, गुलाब, केवड़ा, खस, चंदन और मिट्टी के इत्रों का उपयोग किया जाता है।
इस सेवा में सुगंध के साथ ऋतु का भाव भी जुड़ा हुआ है।
मथुराधीश मंदिर में अभिषेक, इत्र और फव्वारों से शीतल सेवा -गर्मी में बड़े मथुराधीश मंदिर की सेवा व्यवस्था में भी शीतलता को महत्व दिया जाता है।
श्री मथुराधीश मंदिर ट्रस्ट के महामंत्री मोनू व्यास के अनुसार गर्मी के दौरान ठाकुरजी के अभिषेक और इत्र सेवा के साथ फव्वारों का भी उपयोग किया जाता है।
चांदी की झारी से अभिषेक और सुगंधित इत्र का छिड़काव ठाकुरजी की ऋतु अनुकूल सेवा का हिस्सा बताया जाता है।
इस व्यवस्था में भक्तों को भी मंदिर के भीतर एक अलग आध्यात्मिक और सुगंधित वातावरण का अनुभव होता है।
बांके बिहारी मंदिर में रोजाना इत्र से श्रृंगार
फूलबिहारी और रंगबाड़ी क्षेत्र के बांके बिहारी मंदिर में भी नियमित इत्र सेवा की परंपरा बताई जाती है।
यहां मोगरा और टाटारोज जैसी सुगंधों का प्रयोग ठाकुरजी के श्रृंगार और इत्र सेवा में किया जाता है।
इस तरह कोटा के अलग-अलग मंदिरों में सुगंध की सेवा अपने-अपने स्थानीय स्वरूप में दिखाई देती है।
सर्दियों में बदल जाती है सुगंध
जिस प्रकार गर्मी में ठंडी तासीर वाली सुगंधों का उपयोग किया जाता है, उसी प्रकार सर्दियों में गर्म तासीर वाले इत्रों को प्राथमिकता देने की परंपरा बताई जाती है।
पौष जैसे शीतकालीन समय में कस्तूरी और हीना जैसे इत्रों के प्रयोग का उल्लेख मिलता है। वहीं अन्य अवसरों पर गुलाब, केसर और चंदन जैसी सुगंधों का उपयोग किया जाता है।
इस तरह मंदिरों की इत्र सेवा में भी ऋतुचक्र का पूरा ध्यान रखा जाता है।
जन्माष्टमी पर चरम पर पहुंचता है कृष्ण भक्ति का यह संसार
जन्माष्टमी इस पूरी परंपरा का सबसे बड़ा उत्सवी पड़ाव है।
इस अवसर पर मंदिरों में विशेष सजावट, श्रृंगार, भोग और कीर्तन होते हैं। आधी रात भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के समय शंख, घंटा-घड़ियाल और जयकारों से मंदिर परिसर गूंज उठते हैं।
कोटा के पुराने शहर के मथुराधीशजी, बड़े महाप्रभुजी, बृजनाथजी, फूल बिहारीजी और अन्य मंदिरों में वल्लभ परंपरा के अनुरूप जन्माष्टमी मनाई जाती है। हालिया स्थानीय रिपोर्टों में भी इन मंदिरों में जन्माष्टमी की तैयारियों और मध्यरात्रि जन्म दर्शन का उल्लेख किया गया है।
ऐसे में हवेली संगीत के पद, इत्र की सुगंध, फूलों की सजावट और ठाकुरजी का विशेष श्रृंगार मिलकर जन्माष्टमी को केवल एक धार्मिक पर्व नहीं रहने देते, बल्कि इसे जीवंत सांस्कृतिक अनुभव में बदल देते हैं।
रियासतकाल से जुड़ी है कोटा की कृष्ण भक्ति
कोटा के इतिहास में राजपरिवार और मंदिर परंपराओं का संबंध भी महत्वपूर्ण रहा है। राजस्थान पर्यटन विभाग के अनुसार रियासतकाल से कोटा कृष्ण भक्ति का प्रमुख केंद्र रहा है।
हाड़ौती के राजपूत शासकों के संगीत संरक्षण पर किए गए शोध में भी मंदिरों और धार्मिक स्थलों पर भक्ति संगीत के विकास की भूमिका को रेखांकित किया गया है।
मंदिरों में संगीतकारों की नियुक्ति, वाद्य यंत्रों का प्रयोग और सेवा के दौरान पद गायन जैसी व्यवस्थाओं ने इस परंपरा को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाने में योगदान दिया।
केवल संगीत नहीं, पूरी जीवनशैली है हवेली सेवा
हवेली संगीत को समझने के लिए इसे केवल भजन या शास्त्रीय गायन के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा।
यहां—
राग है तो उसके साथ समय है।
कीर्तन है तो उसके साथ सेवा है।
श्रृंगार है तो उसके साथ ऋतु है।
इत्र है तो उसके साथ मौसम है।
भोग है तो उसके साथ समय और परंपरा है।
यही समन्वय हवेली सेवा को विशिष्ट बनाता है।
लोक परंपराओं में भी संगीत की गहरी जड़ें
हाड़ौती की धार्मिक-सांस्कृतिक विरासत में मंदिर संगीत के साथ लोकनाट्य और रामलीला की संगीत परंपराएं भी रही हैं।
कोटा की ढाई कड़ी की रामलीला से जुड़ी ‘अखाड़ा तान’ को लेकर लोकमान्यता है कि रामलीला के मंचन के दौरान किसी कलाकार की मृत्यु के बाद भी मंचन को रोका नहीं गया। इसके बाद नकारात्मक शक्तियों से रक्षा और मंचन में विघ्न न आने की मान्यता से अखाड़ा बांधने की परंपरा शुरू होने की बात कही जाती है।
इस प्रकार हाड़ौती में धार्मिक संगीत केवल मंदिरों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि रामलीला और लोकनाट्य जैसी परंपराओं में भी इसकी गहरी छाप दिखाई देती है।
जन्माष्टमी पर कोटा की विरासत को समझने का अवसर
आज जब आधुनिक मनोरंजन के साधन तेजी से बदल रहे हैं, ऐसे समय में कोटा के मंदिरों में जीवित ये परंपराएं सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
पाटनपोल के बड़े मथुराधीश मंदिर में राग और कीर्तन की परंपरा, महाप्रभुजी मंदिर में ऋतु आधारित सज्जा, मंदिरों में इत्र सेवा और जन्माष्टमी के अवसर पर होने वाली विशेष आराधना—ये सभी मिलकर कोटा की कृष्ण भक्ति की एक अलग तस्वीर प्रस्तुत करते हैं।
यहां भगवान श्रीकृष्ण केवल प्रतिमा के रूप में नहीं, बल्कि बाल स्वरूप में सेवा पाने वाले ठाकुरजी के रूप में माने जाते हैं। इसलिए उनके जागरण से लेकर शयन तक हर चरण में संगीत, श्रृंगार, भोग और सुगंध का अपना स्थान है।
जन्माष्टमी का संदेश
जन्माष्टमी के अवसर पर कोटा की यह परंपरा हमें यह बताती है कि संस्कृति केवल पुस्तकों में सुरक्षित इतिहास नहीं है। जब कोई कलाकार पीढ़ियों पुराने राग में ठाकुरजी के सामने पद गाता है, जब ऋतु के अनुसार इत्र की सुगंध मंदिर में फैलती है, जब खसखस का बंगला सजता है और आधी रात जन्म के समय पूरा मंदिर ‘नंद के आनंद भयो’ के भाव से भर उठता है—तब विरासत जीवित होती है।
यही कोटा की कृष्ण भक्ति की विशेष पहचान है—
जहां सेवा में संगीत है, संगीत में भक्ति है, भक्ति में ऋतु का भाव है और ऋतु के साथ मंदिर की हर सुगंध भी बदल जाती है।
जानकारी- विभिन्न मीडिया रिपोर्ट के अनुसार👉
जन्माष्टमी विशेष | कोटा की सांस्कृतिक विरासत
आधार: राजस्थान पर्यटन विभाग की जानकारी, हवेली संगीत एवं पुष्टिमार्गीय सेवा पर उपलब्ध शोध-साहित्य तथा मंदिर सेवाओं से संबंधित उपलब्ध जानकारी।





