********** ग़ज़ल**********
शकूर अनवर
जंग ये ज़ुल्म के मुक़ाबिल है।
कौन अब इस मुहिम में शामिल है।।
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कितनी मासूमियत है चेहरे पर।
कितना हुशियार मेरा क़ातिल है।।
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हर क़दम ज़ुल्म की फ़ज़ाओं में।
क़ाफ़िला ज़िंदगी का शामिल है।।
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फ़स्ल उगने लगी है लाशों की।
ये ज़मीं कितनी सैर-हासिल है।।
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सब नसीमे-सहर के मतवाले।
“कौन ऑंधी के अब मुक़ाबिल है”।।
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किसने समझा हयात का मक़सद।
हर कोई ज़िंदगी से ग़ाफ़िल है।।
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जो ग़मे-दिल बचा के रक्खा था।
अब वही ज़िंदगी का हासिल है।।
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हक़-परस्ती से इन्हिराफ़ “अनवर”।
या तो वो कुफ्र है या बातिल है।।
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शब्दार्थ:-
मुक़ाबिल*सामने
मुहिम*अभियान
सैर हासिल* ज़रखेज़ उपजाऊ
नसीमे सहर* सुबह की ठंडी हवा
हक़-परस्ती*सच्चाई
इन्हिराफ़*इन्कार
बातिल*झूट
शकूर अनवर
9460851271
********** ग़ज़ल*********
शकूर अनवर
वो उफनती नदी, उठती मॅंझधार वो।
मैं इधर इस तरफ़ और उस पार वो।।
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उसका ऑंखों ही ऑंखों में इक़रार वो।
अब मयस्सर* कहाँ ऐसा दीदार वो।।
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पारसाई* मेरी काट कर रख गया।
ऐसी लाया मुहब्बत की तलवार वो।।
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फिर सितमगर बहाना बना ही गया।
कैसा निकला ज़माने का हुशियार वो।।
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सर्द-मोहरी* तेरी याद आई बहुत।
दिल की हर बात पर तेरा इन्कार वो।।
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मिल ही जायेगा हमको किनारा कहीं।
उसकी कश्ती हूंँ मैं, मेरी पतवार वो।।
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जिसकी “अनवर” किसी को ज़रूरत नहीं।
नफ़रतों की गिरे अब तो दीवार वो।।
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शब्दार्थ:-
मयस्सर*प्राप्त होना मिलना
पारसाई*पवित्रता
सर्द मोहरी*बेवफाई
शकूर अनवर
9460851271
********** ग़ज़ल**********
शकूर अनवर
फिर वही पाॅंवों में बेड़ियाँ क्या करूँ।
फिर वही गर्दिशे-आसमाॅं* क्या करूँ।।
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रास आई नहीं ये मुहब्बत मुझे।
अब तुम्हीं कुछ कहो जाने-जाॅं*क्या करूँ।।
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जो भी थे दिल-नशीं* सब सितमगर* हुए।
कोई भी अब नहीं मेहरबाॅं क्या करूँ।।
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फूल ख़ुशबू हवा ऐसे बदज़न* न थे।
हो गये सब के सब बदगुमाॅं* क्या करूँ।।
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कैसी मंज़िल कहाँ का सफ़र कुछ नहीं।
रास्ते, मरहले*, कारवाॅं क्या करूँ।।
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सर छुपाने को जब कोई छप्पर नहीं।
फिर ये सर पर रखा आसमाॅं क्या करूँ।।
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ऐसी बिजली गिरी घर का घर जल गया।
रह गया बस धुआँ ही धुआँ क्या करूँ।।
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जो मिली, जैसी थी, ज़िंदगी जी गये।
अब बयाॅं* उसकी मैं दास्ताँ क्या करूँ।।
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कोई दर, कोई चौखट मयस्सर नहीं।
कोई मिलता नहीं आस्ताँ* क्या करूँ।।
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घर के होते हुए जैसे बेघर हूँ मैं।
लामकानी* बता अब मकाॅं क्या करूँ।।
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खुद ही माॅंगे थे “अनवर” ये दारो-रसन*।
अब अगर खुल गईं रस्सियाँ क्या करूँ।।
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शब्दार्थ:-
गर्दिशे-आसमाॅं*समय का चक्र
जाने-जाॅं*प्रिय प्रेमिका
दिल-नशीं*दिल में रहने वाले
सितमगर*ज़ालिम
बदज़न*शक़ करने वाला
बदगुमाँ*बुरा खयाल रखने वाला
मरहले*पड़ाव
बयाॅं*वर्णन
ला मकानी* विश्वरूपी घर ईश्वरीय वास
आस्ताँ*चौखट
दारो-रसन*सूली और फाॅंसी का फंदा
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शकूर अनवर
9460851271






