“सावन”
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मेघों की झिरमिर-झिरमिर,
करती वसुधा को पावन ।
रमणियों की कोकिल-कण्ठी,
लगती है मन-भावन ।।
झूलों की छाई रौनक,
दादुर की “टर्र-टर्र” गावन ।
सँवर रहा जो मंज़र,
वो ही मतवाला सावन ।।
अम्ब प्रकृति-अंक में,
करे पवन अठखेली ।
सर्व कुटुम्बीजन जहाँ,
मना रहे रंगरेली ।।
संग फुहारों के टोलियाँ,
खुशियाँ बन कर खेली ।
नव-विवाहित जोड़े अपनी,
सजा रहे रंगोली ।।
उछल-कूद करती नव-कलियाँ,
करती रहती धावन ।
सँवर रहा जो मंज़र,
वो ही मतवाला सावन ।।
मेघों की झिरमिर-झिरमिर,
करती वसुधा को पावन ।
रमणियों की कोकिल-कण्ठी,
लगती है मन-भावन ।।
झूलों की छाई रौनक,
दादुर की “टर्र-टर्र” गावन ।
सँवर रहा जो मंज़र ,
वो ही मतवाला सावन ।।
(स्वरचित/मौलिक/सर्वाधिकार सुरक्षित)
(रचनाकार: बृजेन्द्र सिंह झाला”पुखराज”)
कोटा (राजस्थान )
कर्मभूमि ही तपोवन है मेरा
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बिन फल-इच्छा-निश्छल मन से
दत्त-चित्त हो पूर्ण लगन से ।
इन्दियाँ एकाग्र निरंतर,
कर्म करूँ नित-नित्य मगन से ।।
कर्म साधना-कर्म ही तप है,
ज़र्रा-ज़र्रा कर्मभूमि है ।
हौसला है तपोवन मेरा,
सफलता चरण चूमी है ।।
जिसे समझले ऐरा-ग़ैरा,
अन्धविश्वास का मिटे अन्धेरा ।
लापरवाही न करे बसेरा,
कर्मभूमि ही तपोवन मेरा ।।
यही एक उत्थान मेरा,
ऐसा हिन्दुस्तान मेरा ।
राम-कृष्ण की वसुंधरा पर,
कर्मभूमि ही तपोवन मेरा ।।
(स्वरचित/मौलिक/अप्रकाशित)
(रचनाकार: बृजेन्द्र सिंह झाला”पुखराज”)
कोटा (राजस्थान)
सावन-बृजेंद्र सिंह झाला ‘पुखराज’




