Thursday, April 23, 2026
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सावन-बृजेंद्र सिंह झाला ‘पुखराज’

 

“सावन”

———-

मेघों की झिरमिर-झिरमिर,

करती वसुधा को पावन ।

रमणियों की कोकिल-कण्ठी,

लगती है मन-भावन ।।

झूलों की छाई रौनक,

दादुर की “टर्र-टर्र” गावन ।

सँवर रहा जो मंज़र,

वो ही मतवाला सावन ।।

अम्ब प्रकृति-अंक में,

करे पवन अठखेली ।

सर्व कुटुम्बीजन जहाँ,

मना रहे रंगरेली ।।

संग फुहारों के टोलियाँ,

खुशियाँ बन कर खेली ।

नव-विवाहित जोड़े अपनी,

सजा रहे रंगोली ।।

उछल-कूद करती नव-कलियाँ,

करती रहती धावन ।

सँवर रहा जो मंज़र,

वो ही मतवाला सावन ।।

मेघों की झिरमिर-झिरमिर,

करती वसुधा को पावन ।

रमणियों की कोकिल-कण्ठी,

लगती है मन-भावन ।।

झूलों की छाई रौनक,

दादुर की “टर्र-टर्र” गावन ।

सँवर रहा जो मंज़र ,

वो ही मतवाला सावन ।।

(स्वरचित/मौलिक/सर्वाधिकार सुरक्षित)

(रचनाकार: बृजेन्द्र सिंह झाला”पुखराज”)

कोटा (राजस्थान )

 

कर्मभूमि ही तपोवन है मेरा

——————–

बिन फल-इच्छा-निश्छल मन से

दत्त-चित्त हो पूर्ण लगन से ।

इन्दियाँ एकाग्र निरंतर,

कर्म करूँ नित-नित्य मगन से ।।

कर्म साधना-कर्म ही तप है,

ज़र्रा-ज़र्रा कर्मभूमि है ।

हौसला है तपोवन मेरा,

सफलता चरण चूमी है ।।

जिसे समझले ऐरा-ग़ैरा,

अन्धविश्वास का मिटे अन्धेरा ।

लापरवाही न करे बसेरा,

कर्मभूमि ही तपोवन मेरा ।।

यही एक उत्थान मेरा,

ऐसा हिन्दुस्तान मेरा ।

राम-कृष्ण की वसुंधरा पर,

कर्मभूमि ही तपोवन मेरा ।।

(स्वरचित/मौलिक/अप्रकाशित)

(रचनाकार: बृजेन्द्र सिंह झाला”पुखराज”)

कोटा (राजस्थान)

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