ग़ज़ल
शकूर अनवर
गाती हुई कोयल न कोई मोर मिलेगा।
शहरों में मशीनों का फ़क़त शोर मिलेगा।।
आसान नहीं है तेरा उस पार पहुॅंचना।
मॅंझधार में तूफ़ा का बड़ा ज़ोर मिलेगा।।
ऐसे ही निगाहों को झुकाया नहीं करते।
जब दिल को टटोलोगे तो इक चोर मिलेगा।।
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बैठे से तो दुख-दर्द कभी ख़त्म न होंगे।
हिम्मत जो रखोगे तो कहीं छोर मिलेगा।।
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तपते हुए सहराओं* में क्या पाओगे “अनवर”।
पानी तो मेरे यार कहीं और मिलेगा।।
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शब्दार्थ:-
सेहराओं*रेगिस्तानों
शकूर अनवर
946085127
****ग़ज़ल ****
शकूर अनवर
लो हमारे रंजो-ग़म का हमसफ़र* जाता रहा।
आज दिल भी हाथ से ऐ चारागर* जाता रहा।।
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फिर टपक कर गुम हुआ वो ख़ाक* की आग़ोश* में।
फिर तेरा लख़्ते-जिगर* ऐ चश्मे-तर* जाता रहा।।
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इक ज़रा देखा था उसको खो गई बीनाई* भी।
हसरते-दीदार में लुत्फ़े-नज़र* जाता रहा।।
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ज़िंदगी का मोल कितना घट गया है आजकल।
मौत सस्ती हो गई इतनी कि डर जाता रहा।।
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जैसे तैसे कट रही थी उसमें अपनी ज़िंदगी।
इस बरस बरसात में वो कच्चा घर जाता रहा।।
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क्यूँ नहीं सुनता वो “अनवर” मेरे ग़म की दास्ताँ*।
क्या मेरी आहो-फ़ुग़ाॅं * में अब असर जाता रहा।।
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शब्दार्थ:-
हमसफ़र*साथी
चारागर*चिकित्सक
ख़ाक*मिट्टी
आग़ोश में*बाहों में
लख़्ते-जिगर*जिगर का टुकड़ा पुत्र समान प्यारा
चश्मे-तर*भीगी हुई आंख
बीनाई*दृष्टि
हसरते-दीदार यानी देखने की इच्छा
लुत्फे-नज़र*देखने का आनंद
दास्ताँ*कहानी
आहो-फ़ुग़ाॅं*विलाप रोना धोना
शकूर अनवर
9460851271





