*गुमानपुरा- राव शत्रुशाल के भाई गुमानसिंह के नाम पर गुमानपुरा का नामकरण हुआ था, सन 1766 में शत्रुशाल के बाद राव गुमानसिंह गद्दी पर बैठे दरअसल राव शत्रुशाल के कोई पुत्र नहीं था, आजादी से पहले 1932 में गुमानपुरा का पहला निर्माण माणिक भवन के नाम से हुआ था, गुमानपुरा का यह सबसे पहले भवन है जो क्रांतिकारी केसरीसिंह बारहठ के लिए राव उम्मेदसिंह ने बनवाया था
*छावनी- महाराव रामसिंह द्वितीय के शासनकाल में पर कोटे से 4 किलोमीटर दूर रामचंद्रपुरा गांव बसाया गया था, उसे समय कोटा रियासत में अंग्रेजों का आगमन हो चुका था, अंग्रेजी फौज ने रामचंद्रपुरा गांव में पास छावनी बना ली और वही अपना डेरा जमा लिया, तभी से इलाके का नाम छावनी पड़ गया
*रेतवाली- रेतवाली रियासत काल में दरा अभ्यारण के झरने नदी-नालों का पानी साजीदेहड़ा नाले का पानी कोटा दुर्ग के परकोट के पास से बहकर चंबल नदी में मिलता था, चंबल व नाले के मुहाने पर रेत इकट्ठी हो जाया करती थी, बरसात में रेत के ऊंचे -ऊंचे टीले बन जाते थे, कोटा दुर्ग में रहने वाले लोग रेत के टीले वाले स्थान को रेतवाली के नाम से जानते हैं
*बीन-बजा – रियासत काल में युद्ध के समय वाद्य यंत्रों को बजने वाले कलाकार और सिपाही इस जगह पर रहते थे, इस जगह को बीन-बजा नाम से जाना जाता है, लाडपुरा स्थित बीन बजा में वर्तमान में देवस्थान विभाग और स्वास्थ्य विभाग के कार्यालय है
*शिवपुरा कोटा से 5-6 किलोमीटर दूर रावतभाटा रोड पर चंबल नदी के किनारे 300 साल पूर्व महाराव उम्मेद सिंह जी ने सोमेश्वर महादेव की स्थापना की थी, जहां पर एक बस्ती बनाई गई, शिव मंदिर होने से इस बस्ती का नाम शिवपुरा रखा
*पुरोहित जी की टापरी- रेलवे स्टेशन क्षेत्र में पहले यहा राजपुरोहित टापरी बनाकर रहते थे, अन्य लोग यहां खेती करते थे और प्राचीन समय में अधिकतर लोग उन्हें देखकर खुद भी टापरी बनकर ही रहने लगे, अधिकतर टापरियों के होने से यह जगह पुरोहित जी की टापरी के नाम से पहचानी जाने लगी
*सरायकास्थान- रियासत काल में राजा महाराजाओं के यहां पर पुरोहित मंत्री व लेखाकार का कार्य करने वाले कायस्थ जाति के लोगों के रहने के लिए भवनो का निर्माण कराया गया, जिसका नाम कायस्थों की सराय रखा गया, इसे पुराने शहर के नाम से भी जाना जाता है
*चंद्रघटा- कोटा नरेश चंद्रघाट देवी के असीम भक्त थे, वह प्रतिदिन चंद्रघटा के दर्शन करने जाया करते थे, यहां रोजाना सैकड़ो श्रद्धालु दर्शन करने आते थे, पूजा सामग्री बेचने वाले व्यापारी यहां रहने लगे और उस बस्ती का नाम चंद्र घाट हो गया,
*नंदग्राम- सन 1760 से 1720 के काल में महाराव भीम सिंह प्रथम वृंदावन की यात्रा पर गए, वहां जाने के बाद में वल्लभ संप्रदाय के अनुयायी हो गए, इन्होंने कृष्ण महल के पराकोट के अंदर ही बृजनाथ मंदिर व कृष्ण मंदिरों का निर्माण कराया तथा पाटनपोल इस क्षेत्र का नाम नंदग्राम रखा
*गोबरिया बावड़ी- महाराव भीम सिंह प्रथम ने जब कोटा का नाम बदलकर नंदग्राम रखा तब हजारों गायों का पालन किया जाता था, जिनको चराने के लिए ग्वालो दराअभ्यारण के रास्ते पर गोबरया बावड़ी क्षेत्र में गाय चराने जाते थे, गायों एवं ग्वालो के लिए बावड़ी का निर्माण कराया, ग्वाले बावड़ी से पानी लेकर पास ही कंडे थापते थे, इसलिए लोग इस क्षेत्र को गोबर या बावड़ी कहने लगे
*पाटनपोल दरवाजा- पाटनपोल दरवाजा 1857 की क्रांति का बड़ा प्रतीक स्थान है, दरवाजे से केशवराय पाटन जाने का रास्ता है, प्राचीन समय से इसे पाटनपोल कहा जाता था, जो अभी जारी है, इस ऐतिहासिक दरवाजे का निर्माण कोटा राज्य के प्रथम शासक राव माधोसिंह जी( सन 1631 से 1649) ने करवाया था, गेट के पास ही पुराना वाचनालय मदन मोहन मालवीय है, 26 जनवरी व 15 अगस्त को यहां झंडारोहण किया जाता है
*केथुनीपोल दरवाजा- कोटा दुर्ग से कैत के वृक्षों के बीच मे बसे कस्बे कैथून में जाने के लिए पर कोटे से एक दरवाजे का निर्माण कराया था जिसका नाम केथुनीपोल दरवाजा पड़ा, वर्तमान यहां दरवाजा नहीं है, इस इलाके का नाम इस दरवाजे से कैथूनीपोल हो गया
*नयापुरा- वर्ष 1900 में कोटा रियासत में घूमतु जातियों का आगमन हुआ, तात्कालिक नरेश ने उनके रहने के लिए परकोट के बाहर जगह आवंटित की जिसको नयापुरा नाम दिया, नयापुरा में रहने वाली घूमतु जाति के लोग कोटा में भिक्षार्जन कर पेट पालते थे, नयापुरा के बाद कहीं बस्तियां बस जाने के बाद आज भी इसे नयापुरा के नाम से जाना जाता है
*मकबरा बाजार- वर्ष 1857 की क्रांति में शहीद हुए पठान चांद खाजी का मकबरा है, इस कारण से इसे मकबरा कहते हैं
* चौथ माता बाजार- मकबरा क्षेत्र में प्राचीन चौथ माता का मंदिर है, इस कारण से इसे चौथ माता बाजार कहते हैं, यहां सर्राफा व्यवसाय की दुकान होने के कारण सराफा बाजार भी कहते हैं
*रामपुरा- 17वीं शताब्दी के मध्य में महाराव राम सिंह ने बसाया था इसलिए इसका नाम रामपुरा पड़ा, रामपुर को कोटा का प्राचीनतम बाजार कहा जाता है
* बक्शपुरी का कुंड- रामपुर में पहले एक विशाल बक्शपुरी का कुंड था जो धीरे-धीरे यहां बस्ती बसने लगी लोगों ने यहां मकान और दुकान बनाना शुरू कर दिया, कुंड अपना अस्थि तत्व होता गया आज यहां कुंड के स्थान पर विशाल मार्केट बन चुका है, उसे कुंड के कारण इस जगह को बक्शपूरी का कुंड कहते हैं
*लाडपुरा- लाडपुरा राव किशन सिंह के दीवान जालम सिंह झाला के लंबे समय तक संतान नहीं हुई थी, वर्ष 1817 में जालिम सिंह झाला की पत्नी के पुत्री हुई, उसे समय दीवान जालम सिंह की आयु 40 वर्ष थी, उसका नाम लाडकवर रखा जो परिवार में सभी की लाडली थी, उसी के नाम से कोटा रियासत के मोहल्ले का नाम लाडपुरा रखा
*इन्द्रमार्केट- पहले इसे लखारापड़ा ही रहते थे, क्योंकि यहां नमकीन व लाख की चूड़ियों के ही काम हुआ करते थे, इस बाजार का नाम इन्द्रमार्केट नूर मोहम्मद भाई ने रखवाया था, जो उसे समय के मिलनसार दुकानदार थे, यह वह दौर था जब इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री हुआ करती थी
*टिपटा- कोटा दुर्गा के परखूट के अंदर तीन रास्तों वाला एक ही चौराहा जिसको त्रिपथा कहा जाता था, धीरे-धीरे त्रिपथा अपभ्रंश होते हुए यह नाम टिपटा हो गया,
* खाई रोड- महाराव उम्मेदसिंह नेशन 1927 से 1928 में कोटा शहर में लाइट लगवाई जिसके लिए पावर हाउस का निर्माण कराया गया, बिजली बनाने के लिए पानी और कोयला कोटा दरबार द्वारा परकोट के अंदर भूमिगत मार्ग से बैलगाड़ियों में पानी और कोयला लाया जाता था, खुशी मार्ग को खाई रोड कहां जाने लगा
* गन्दी जी की पुल- महाराव उम्मेद सिंह जी के शासनकाल में सुगंधित द्रव्य को परोसने वाले दरबारी गंदी जी रोजाना गंदे नाले को पार करके कोटा निवासियों को इत्र बेचने आया करते थे, नले को पार करते समय गंदी जी के कपड़े खराब हो जाया करते थे, यही आलम कोटा रियासत के लोगों का था, लेकिन किसी ने भी महाराव से नाले पर पुलिया बनाने की गुहार नहीं की, एक दिन गंदी जीके गंदे कपड़ों से दरबार में महाराव उम्मेद सिंह जी को इत्र परोसने पहुंच गए, गंदी जी ने सारी दास्तान महाराव उम्मेद सिंह जी को सुनाई, महाराव ने सन 1932 में नाले पर पुलिया का निर्माण कराया, पुलिया का नामकरण गंदी जी की पुल रखा, आज पुलिया का नवनिर्माण होकर पक्की सड़क बन चुकी है
*अटाघर चौराहा- राजकीय महाविद्यालय के पास दक्षिण मार्ग पर बनी विशाल इमारत कोटा रियासत के लोग यूरोपियंस क्लब के नाम से जानते थे, आज यहां जेडीबी कन्या महाविद्यालय का छात्रावास है, यहां अंग्रेजी शासन बिलियर्ड खेलते थे, इस भवन का निर्माण महाराव उम्मेद सिंह जी देते ने 1889 से 1940 के मध्य कराया था, तात्कालिक कोटा नरेश भी बिलियर्ड खेलते थे, वे अक्सर यहां अंग्रेजों के साथ बिलियर्ड खेलते थे, कोटा रियासत के लोग अंग्रेजी खेल बिलियर्ड के बारे में अनजान थे, उन्होंने यह अंटो से खेले जाने के कारण इमारत को अंटाघर का नाम दिया
*बजाज खाना- हाडोती की सबसे बड़ी कपड़ा मंडी के नाम से पहचाने जाने वाला बजाजखाना पहले नगर सेठ बहादुर माल के नाम से पहचाने जाने वाला बहादुर मल जी व बाद में दान मल जी की बड़ी हवेली लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचती है, हालांकि अब यहां बुध सिंह वफना का परिवार रहता है, यहां कहीं महाजन परिवार भी है, जो अपने नाम के पीछे बजाज लगते हैं, यह बजाज खाना मार्केट घंटाघर के पास स्थित है, सेठ बहादुर मल के नाम से इस बाजार का नाम बहादुर बाजार पड़ा
*किशोरपुरा- किशोरपुरा दरवाजे का महाराव किशोर सिंह ने कराया था, इस कारण इस इलाके का नाम किशोर पुरा पड़ा, किशोरपुरा दरवाजे का निर्माण कोटा के प्रथम शासक राव माधोसिंह जी ने 17 वी शताब्दी में कराया था, उसे समय इस दरवाजे को भीलवाड़ीपोल कहा जाता था
* श्रीपुरा- श्री लाल जी सारंगिया के नाम पर श्रीपुरा बसा






