राष्ट्रपिता महात्मा गांधी कोटा की धरती पर कभी नहीं उत्तरे, लेकिन बापू कोटा से ट्रेन में गुजरे थे और वह ट्रेन 15 मिनट यही रुकी रही थी।निधन के बाद गांधी जी की कुछ पवित्र अस्थियों की कोटा और केशवरायपाटन में बहने वाली चम्बल नदी में विसर्जित किया गया था। महात्मा गांधी दिल्ली से मुम्बई और वापसी से जाते समय कई बार कोटा से होकर निकले, लेकिन कभी कोटा प्लेटफार्म पर नही उत्तरे। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी नगेन्द्र बालाजी के अनुसार एक बार दिल्ली से जाते समय गांधी जी कोटा रेलवे स्टेशन से निकले। लोगों को जानकारी मिलने पर स्टेशन पर भीड उमड़ने लगी। यह बात वर्ष 1946 की है। गांधी जी के निधन के बाद 12 फरवरी को नगेन्द्र बालाजी और उनकी बहने दिल्ली से गांधी जी की अस्थियां चम्बल में विसर्जन के लिए लेकर आई। रामपुरा स्थित महात्मा गांधी स्कूल में महात्मा गांधी (1948) की मृत्यु के बाद उनके अस्थि कलश की लोगो ने दर्शन के लिए यही रखा गया था। दूसरे दिन चम्बल में उनका विसर्जन किया गया। इसमें से कुछ अस्थियां बून्दी जिले के केशवरायपाटन में बहने वाली चम्बल नदी और कुछ अस्थियां बांरा में भी विसार्जित की गई। इस बात का उल्लेख विमलकुमार कजोलिया की पुस्तक ‘आजादी और उसके बाद’ में भी है, 1948 में महात्मा गांधी की मृत्यु के बाद उनके अस्थि कलश को लोगों के दर्शन के लिए महात्मा गांधी स्कूल में रखा गया था, तभी से इसका नाम महात्मा गांधी स्कूल हो गया इससे पहले इसका नाम कर्जन वाइल मेमोरियल था
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी कोटा की धरती पर कभी नहीं उत्तरे, लेकिन बापू कोटा से ट्रेन में गुजरे थे और वह ट्रेन 15 मिनट यही रुकी रही थी






