Saturday, April 18, 2026
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(कॊटा दशहरा मेले का इतिहास) रावण जी तीसरॊ और कोटा बाहरे नीसरो…

 

रावण जी तीसरॊ और कोटा बाहरे नीसरो…

कॊटा का राष्ट्रीय दशहरा मेला मैसूर शहर के दशहरे मेले के बाद भारत का दूसरा से बड़ा उत्सव माना जाता है। उत्सव आधु‌निकता के साथ कॊ खुद अपने आप में समेटे हुए है। मह‌ाराव उम्मेद‌सिंह के समय तीन दिन तक होने वाला यह मेला अब महीने भर तक चलता है। रावण दहण के साथ सांस्कृतिक कार्यक्रम भी इसकी शान बन गए है। कोट में दशहरा मनाने की परम्परा 150 साल से ज्यादा पुरानी है। दशहरा पर्व की शुरुआत महाराव दुर्जन शॉल सिंह (1723 से 1756) के शासन काल में हुई। इसमें राजसी शान शौकत बढ़ाने वाली विभिन्न प्रकार की सवरियाँ और दरीखाने के सुन्दर उत्सव शामिल है। महाराव उम्मेदसिंह के शासन में इस धार्मिक पर्व को अध्यधिक आकर्षण एवं रंगीन बनाने का सिलसिला शुरु हुआ। कोटा का राष्ट्रीय दशहरा मेला इन्हीं के शासनकाल में सन् 1892 में शुरु हुआ। कोटा का राष्ट्रीय दशहरा मेला इन्हीं के शासनकाल में तीन दिवसीय होता था, मेले में हाडौती के ग्रामीण लोग हजारों की संख्या में आते थे, मेले का शताब्दी वर्ष 1992 में धूमधान से मनाया गया था,

रावणवध के तीन दिन बाद गाँव के लोग जाते थे। उस समय प्रचलित था कि रावण जी तीसरॊ और कोटा बाहरे नीसरो… मतलब रावण मर गया और उसका तीसरा हो गया अब अपने घर लौट जाओ। सन् 1928 में महाराव उम्मेदसिंह ने मेले को भव्यता प्रदान करने के लिए देश के बड़े शहरों से व्यापारियों आंमत्रित किया। दशहरा मेले की चहल-पहल पंचमी से ही शुरु हो जाया करती थी। इसमें पंचमी पर ड़ाढ़ देवी मन्दिर से सवारी, सप्तमी पर काल भैरव नान्ता और करणी माता अभेड़ा की सवारियां आयोजित की जाती थी। अष्टमी के दिन गढ़ में स्थित कुलदेवी आशापुरा के मन्दिर पर आराधना करते थे। शाम को एक छॊटा दरीखाना हाथियापॊल के बाहर छोटे चढ़‌तरे पर समन्न होता था। इस ड़ॊड़ा का दरीखाना कहते थे। नवमी के दिन शाम की आशापुरा देवी की सवारी निकलती की। दशहरा की सुबह रंगबाड़ी के बालाजी की सवारी मॊयला की सवारी और शाम को रावणवध की सवारी निकाली जाती थी। 116 साल पुरानी ऐतिहासिक दशहरा मेले के अवसर पर रावण वध की पंरपरा का राजपरिवार निर्वाह करता आ रहा है

 

दरीखाने का आयोजन रियासतकालीन परम्परा है। यह दशहरे की राम-राम के लिए होता है। ये 1632 से मनाया जा रहा है। वर्ष 1984 हथियापॊल के पास बड़े चबूतरे पर आयोजित किया जा रहा है। दशहरा के मॏके पर मन्दिरों में होने वाली परंपरागत पूजा अर्चना कायम है। सप्तमी के दिन दरबार के परिवार द्वारा नान्ता में करणी माता मन्दिर और कालभैरव के मन्दिर में पूजा अर्चना की जाती है। अष्टमी के दिन दशहरा मेले का उद्‌घाटन आशापुरा के मन्दिर में आराधना से किया जाता है। वर्तमान में महाराज कुमार इज्यराज सिंह के द्वारा कमान से तीर चलाकर रावण के अमृत कलश को भेदा जाता है।

 

गढ़ पैलेस से भगवान लक्ष्मीनारायण जी की सवारी निकलती है। महाराव इज्येराज सिंह व राजपरिवार सवारी में उपस्थित रहते है। रावण पर विजय के महाराव इज्येराज सिंह गढ़ पैलेस में धार्मिक अनुष्ठान करते है। उस दिन विजय के प्रतीक शमी वृक्ष का पूजन किया जाता है। प्राचीन तीर कमान का पूजन किया जाता है। इसके बाद भगवान बृजनाथजी का पूजन आरती करके रेवन्त शन्ति यज्ञ किया जाता है। क्योकि रावण ब्राह्मण था, इसलिए यह यज्ञ उसके वध का प्रायश्चित करने के रूप में किया जाता है।

 

कोटा के दशहरे मेले के रंगमंच ने देश के ख्यातनाम गायकों को सुनने का अवसर दिया है। इस मंच पर दर्द भरे गानों का पर्यायवाची मुकेश से लेकर चुलबुले सोनू निगम तक गायक कलाकार आ चुके हैं। इस रंगमंच पर उषा मंगेशकर, मुकेश, मोहम्मद रफी, मन्नाडे, तलत अजीज, चंदन दास, अनूप जलोटा, मेहेंद्र कपूर, बाबुल सुप्रियो, सुलक्षणा पडित, नितिन मुकेश, अनुराधा पौडवाल, उदित नारायण, सोनू निगम, कुमार शानू, अभिजीत जैसे गायक अपनी आवाज का जादू बिखेर चुके हैं। दशहरा मेले में पहले तो गिनती के झूले होते थे, लेकिन अब तो झुले ही आसमान छु रहे।

 

रियासतकाल से लग रहे कोटा के दशहरा मेले का रंग भी समय के साथ-साथ आधुनिक हो गया है। मेला अपनी संस्कृति को साझा करने का माध्यम रहा है। जहां एक ओर यह मेला लोगों के मनोरंजन का एक साधन है, वहीं इससे लोगों में आपसी प्यार, बंधुत्व, पारम्परिक सहयोग एवं राष्ट्र की एकता और अखण्डता को भी बल मिलता है। कोटा दशहरा मेला सिर्फ हाडौती या राजस्थान का ही नहीं वरन् राष्ट्रीय स्तर का है। देश में मैसूर और कुल्लू के दशहरे के बाद तीसरे स्थान पर कोटा का दशहरा मेला आता है।

 

 

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