Saturday, April 18, 2026
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कोटा में रियासतकाल के समय होली खेलने के तरीके नायाब और अनूठे होते थे

*प्रतीकात्मक इमेज*

कोटा में रियासत काल के समय होली खेलने के तरीके नायाब और अनूठे होते थे,होलिका दहन से सात दिन तक मनाए जाने वाले रंगों उत्सव के दौरान नावडे की होली और हाथियों की होली विशेष आकर्षण हुआ करती थी, यह त्यौहार भाईचारे को बढ़ाने और उच्च नीच के भेद को मिटाने की अनोखी मिसाल कायम करता था, इतिहासकार स्वर्गीय जगत नारायण के एक लेख के अनुसार उम्मेद सिंह जी के समय होलिका दहन हर मोहल्ले में होता था, धुलण्डी पर’ नाथा पंड़ा’ गीतों पर नित्य करते हुए लोग गुलाल से होली खेलते थे, सात दिनों तक कोटा वासी रंगों में सरोबार रहते थे, गढ़ पैलेस में जिमनास्टिक और पहलवान की कुश्ती होती थी, इस मौके पर होली का झंडा उतारने की रस्म होती थी महिलाएं ‘नाथा पंडा’ गीत गाती थी, इसी बीच लोग झंडा उतारने का प्रयास करते थे तो महिलाएं कोडे मरती थी, महा राव की तरफ से महिलाओं को गुड़ की भेली, नगदी और रात-धोला कपड़े का थान उपहार में दिया जाता था, इसी के साथ-साथ दिन में होली उत्सव का समापन होता था,

हाथी होली *- पूरे राजसी ठाठ बाठ से कोटगढ़ पैलेस से महाराज उम्मेद सिंह जी की सवारी निकलती थी, हाथों में बड़ी पिचकारियों लिए चारों ओर रंग गुलाल उड़ाते हुए यह सवारी रामपुरा तक जाती थी

इस दृश्य को देखने के लिए महिलाएं पुरुष अच्छा तो पर डटे रहते थे, होली पर नागरिक को को महाराव के साथ होली खेलने की इच्छा रहती थी, महाराव के स्वागत एवं जय-जयकार के बीच रंग गुलाल का क्रम जारी रहता था, चौथे दिन हाथियों की होली होती थी, इस दिन गढ़ पैलेस से रामपुर डाकघर तक करीब एक दर्जन हाथियों की सवारी निकलती थी, एक पर महाराव और अन्य हाथियों पर दरबारी सवारी में होकर चलते थे, शहर की जनता घरों की छतों और सड़कों पर खड़ी होकर उनका स्वागत करती थी, महाराव इंजन वाली पिचकारी से लोगों पर रंगीन गुलाल छिड़कते थे, इसी दिन शाम को ब्रिजविलास में दरीखाना लगता था, छठे दिन होली का न्हाण मनाया जाता था, राजमहल में लगने वाले दरीखाने में महाराव दरबारियों से होली खेलते थे, शाम को लगने वाले दरीखाने में महाराव को नजराने पेश किए जाते थे,

नावडे की होली- कोटा बैराज रोड पर बोट के बालाजी मंदिर के पास एक बड़ा घाट था, जिसे गणगौर घाट के नाम से जाना जाता था, लगभग 100 सवारी की बैठक क्षमता वाली एक बड़ी नाव बनी होती थी, नाव के पिछले भाग में ऊंचाई पर एक छोटा मंच बनाया जाता था, तत्कालीन शासक उम्मेद सिंह बैठते थे, सेल्स दरबारी नाव में बैठते थे, यह नो टिपटा गणगौर घाट से रामपुरा घाट तक जाती थी, महाराणा नाव से बड़ी पिचकारियों की बौछारे करते थे, धुलण्डी के बाद तीसरे दिन विशेष रूप से नावडे की होली खेली जाती थी, गढ़ पैलेस के पीछे राजघाट से चंबल पुलिया तक 7-8 नावें चलती थी, इनमें से एक में महाराव तथा अन्य नावों में दरबारी व गवैया होते थे एक नाव में गुलाल और गोट रखे जाते थे, इंजन वाली नाव में फुव्वारे नुमा पिचकारी रखी जाती थी, नाव में सवार लोग नृत्य करते थे वही महा राव नव से नदी किनारे खड़े लोगों पर गुलाल डालते थे

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