Saturday, April 18, 2026
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एक नज़्म -शकूर अनवर 

एक नज़्म

शकूर अनवर

*

हमसफ़र और चल,,,,

*

कैसी कैसी तमन्नाएँ दिल में रहीं

कैसी कैसी उमीदो पे जीते रहे

तल्ख़ियाँ* ज़िंदगी पर मुसल्लत* हुईं

जामे इशरत* न थे,ज़हर पीते रहे

ख़त्म होगी कभी तो ये शामे-अलम

ख़त्म होंगे कभी तेरे मेरे ये ग़म,,,,,

*

ऐ मेरे हम क़दम*

ऐ मेरे हम नशीं*

रात काली सदा सर पे रहती नहीं

हौसला फिर भी देखो न टूटे कहीं

क्या हुआ गर सितारे ये बेनूर हैं

क्या हुआ पाॅंव तेरे जो मजबूर हैं

जिनकी ठंडक निगाहों में फिरती रही

वो बहारों के खेमे अभी दूर हैं

*

इसलिए हमसफ़र

कुछ क़दम तेज़तर*

तेरी रफ़्तार* हो मिस्ले-बर्क़ो-शरर*

टेड़ी-मेढ़ी सही रहगुज़र और चल

मुश्किलों से भरी है डगर और चल

मंज़िलों से न हो बेख़बर और चल

ये मुहिम* तुझको करनी है सर और चल

हमसफ़र और चल

हमसफ़र और चल,,,,,,

*

शकूर अनवर

तल्ख़ियाँ* कड़वाहटें

मुसल्लत हुईं* यानी हावी होना

जामे इशरत*खुशी के प्याले

शामे-अलम*दु:खों की शाम हम क़दम*सह यात्री

हम नशीं*साथी

तेज़तर*जल्दी

ररफ़्तार*गति

मिस्ले-बर्क़ो-शरर*बिजली और चिंगारी की तरह

मुहिम*अभियान

9460851271

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