एक नज़्म
शकूर अनवर
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हमसफ़र और चल,,,,
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कैसी कैसी तमन्नाएँ दिल में रहीं
कैसी कैसी उमीदो पे जीते रहे
तल्ख़ियाँ* ज़िंदगी पर मुसल्लत* हुईं
जामे इशरत* न थे,ज़हर पीते रहे
ख़त्म होगी कभी तो ये शामे-अलम
ख़त्म होंगे कभी तेरे मेरे ये ग़म,,,,,
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ऐ मेरे हम क़दम*
ऐ मेरे हम नशीं*
रात काली सदा सर पे रहती नहीं
हौसला फिर भी देखो न टूटे कहीं
क्या हुआ गर सितारे ये बेनूर हैं
क्या हुआ पाॅंव तेरे जो मजबूर हैं
जिनकी ठंडक निगाहों में फिरती रही
वो बहारों के खेमे अभी दूर हैं
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इसलिए हमसफ़र
कुछ क़दम तेज़तर*
तेरी रफ़्तार* हो मिस्ले-बर्क़ो-शरर*
टेड़ी-मेढ़ी सही रहगुज़र और चल
मुश्किलों से भरी है डगर और चल
मंज़िलों से न हो बेख़बर और चल
ये मुहिम* तुझको करनी है सर और चल
हमसफ़र और चल
हमसफ़र और चल,,,,,,
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शकूर अनवर
तल्ख़ियाँ* कड़वाहटें
मुसल्लत हुईं* यानी हावी होना
जामे इशरत*खुशी के प्याले
शामे-अलम*दु:खों की शाम हम क़दम*सह यात्री
हम नशीं*साथी
तेज़तर*जल्दी
ररफ़्तार*गति
मिस्ले-बर्क़ो-शरर*बिजली और चिंगारी की तरह
मुहिम*अभियान
9460851271
एक नज़्म -शकूर अनवर





