Thursday, April 23, 2026
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श्रीमद्भगवद्‌गीता- कालीचरण राजपूत

 

गीता श्लोक 10/33…

भगवान की विभूतियां…

 

भगवान कहते हैं कि अक्षरों में “अ” कार और समाजों में द्वंद्व समास मैं ही हूं । अक्षयकाल अर्थात काल का भी महाकाल तथा सब प्रमुख वाला धाता अर्थात सबका पालन पोषण करने वाला भी मैं ही हूं ।

वर्णमाला में पहला अक्षर “अ” कार आता है । स्वर और व्यंजन दोनों में “अ” कार मुख्य है । “अ” के बिना व्यंजनों का उच्चारण नहीं होता । इसलिए “अ” कार को भगवान ने अपनी विभूति माना है ।

जिसमें दो या दो से अधिक शब्दों को मिलाकर एक शब्द बनता है, उसको समास कहते हैं । समास कई प्रकार के होते हैं उनमें अव्ययीभाव, तत्पुरुष, बहुव्रीहि और द्वंद मुख्य हैं । दो शब्दों के समास में यदि पहला शब्द प्रधानता रखता है, तो वह अव्ययीभाव समास होता है । यदि आगे का शब्द प्रधान रखता है, तो वह तत्पुरुष समास होता है । यदि दोनों शब्द अन्य के वाचन होते हैं, तो वह बहुव्रीहि समास होता है । यदि दोनों शब्द प्रधानता रखते हैं, तो वह द्वंद समास होता है । द्वंद समास में दोनों शब्दों का अर्थ मुख्य होने से भगवान ने इसको अपनी विभूति माना है ।

अक्षयकाल को भगवान ने अपनी विभूति माना है ।

 

गीता श्लोक 10/34….

भगवान की विभूतियां….

 

भगवान कहते हैं कि सबका हरण करने वाली मृत्यु और भविष्य में उत्पन्न होने वाला मैं हूं तथा स्त्री जाति में कीर्ति, श्री, वाक् अर्थात वाणी, स्मृति, मेधा, धृती और क्षमां में हूं ।

भगवान कहते हैं कि मृत्यु में हरण करने की ऐसी विलक्षण समर्थ है, कि मृत्यु के बाद यहां पृथ्वी लोक की स्मृति तक नहीं रहती । सब कुछ अपहृत अर्थात विस्मृति हो जाता है । वास्तव में यह सामर्थ मृत्यु की नहीं है,वरन परमात्मा की है । अगर उन जन्मों की याद रहती है, तो मनुष्य की चिताओं का उसके मोह का कभी अंत नहीं आता । परंतु मृत्यु के द्वारा विस्मृति होने से पूर्व जन्मों के कुटुंब, संपत्ति आदि की चिंता नहीं होती । इस तरह मृत्यु में जो चिंता मोह मिटाने का सामर्थ है वह सब भगवान की है ।

कीर्ति,श्री, वाक, स्मृति, मेधा, धृती और क्षमां, यह सातो संसार भर की स्त्रियों में श्रेष्ठ मानी गई हैं, इनमें से कीर्ति, स्मृति, मेधा, धृती और क्षमा, यह पांच प्रजापति दक्ष की कन्याएं हैं । श्री महर्षि भृगु की कन्या है .। सद्गुणों को लेकर संसार में जो प्रसिद्धि है या प्रतिष्ठा है, उसे कीर्ति कहते हैं । यह सभी भगवान के ऐश्वर्या हैं । इन सातों विशेषताओं को भगवान ने अपनी विभूति बताया है ।

 

गीता श्लोक 10/35…

 

भगवान की विभूतियां….

 

भगवान कहते है कि गाई जाने वाली श्रूस्तियों में वृहत्साम और सब छंदों में गायत्री छंद मैं हूं । बारह महीनों में मार्गशीर्ष अर्थात अगहन मास और छह ऋतुओं में बसंत मैं हूं ।

सामवेद में वृहत शाम नामक एक गीत है इसके द्वारा इंद्र रूप परमेश्वर की स्तुति की गई है अति राग में एक पृष्ठ स्रोत है सामवेद सबसे श्रेष्ठ होने से इस व्रत शाम को भगवान ने अपनी विभूति माना है वेदों की जितनी चांदो बढ़ ऋचाएं हैं उनमें गायत्री की मुख्यता है । गायत्री को वेद माता कहते हैं अर्थात वेदों की जननी कहते हैं । क्योंकि इसीसे वेद प्रकट हुए हैं । स्मृतियां और शास्त्रों में गायत्री की बड़ी भारी महिमा गाई गई है । गायत्री में स्वरूप, प्रार्थना और ध्यान तीनों परमात्मा के ही होने से इसे परमात्मतत्व की प्राप्ति होती है । इसलिए भगवान ने गायत्री को अपनी विभूति माना है ।

महीना में मार्गशीर्ष को भगवान ने अपनी विभूति माना है वसंत ऋतु में बिना वर्ष के वृक्ष लता आदि पत्र पुष्पों से युक्त हो जाते हैं । इस ऋतु में न अधिक गर्मी रहती है, न अधिक सर्दी इसलिए भगवान ने बसंत रितु को अपने विभूति बताया है। हमें हमेशा भगवान की विभूतियों का चिंतन करना चाहिए ।

 

गीता श्लोक 10/36…

भगवा की विभूतियां…

भगवान कहते हैं कि छल करने वालों में जुआ और तेजस्वियों में तेज हूं । जीतने वालों में विजय हूं । सात्विक मनुष्यों में सात्विक भाव मैं ही हूं ।

भगवान कहते हैं कि छलके द्वारा दूसरों के राज्य धन संपत्ति आदि का अपहरण करने की विशेष समर्थ रखने वाली जो विद्या है, उसको जुआ कहते हैं । इस जुए को भगवान ने अपनी विभूति बताया है । भगवान का चिंतन सुगमता से हो जाए, इसका उपाय विभूतियों के रूप में बताया है । अतः जिस समुदाय में मनुष्य रहता है, उस समुदाय में जहां दृष्टि पड़े, वहां संसार को न देख कर भगवान को ही देखें । क्योंकि भगवान कहते हैं कि यह संपूर्ण जगत मेरे से व्याप्त है । अर्थात इस जगत में मैं व्याप्त हूं या परिपूर्ण हूं । महापुरुषों के उस देवी संपत्ति वाले प्रभाव का नाम तेज है । जिसके सामने पापी पुरुष भी पाप करने से हिचकते हैं । इस तेज को भगवान ने अपनी विभूति बताया है ।

 

गीता श्लोक 10/37….

भगवान की विभूतियां…

 

भगवान कहते हैं कि वृष्णी वंशियों में वासुदेव पुत्र श्रीकृष्ण और पांडवों में अर्जुन मैं हूं । मुनियों में वेदव्यास और कवियों में कवि शंकराचार्य मैं हूं।

वृष्णी वंशियों में जो विशेषता है उस विशेषता को लेकर भगवान ने अपना विभूति रूप से वर्णन किया है । भगवान कृष्ण का जन्म जिस वंश में हुआ था उस वंश का नाम था वृष्णी वंश । इस वंश में जन्म लेने के कारण भगवान कृष्ण को वार्ष्णेय भी कहते हैं । पांडवों में अर्जुन की जो विशेषता है, वह विशेषता भगवान की है । इसलिए भगवान ने अर्जुन को अपनी विभूति बताया है ।

वेदों का चार भागों में वेद, पुराण, उप पुराण, महाभारत जो कुछ संस्कृत वांग्मय साहित्य है, वह सब का सब व्यास जी की कृपा का ही फल है । आज भी कोई नई रचना करता है, तो उसे भी व्यास जी का ही उच्छिष्ट माना जाता है । इस तरह सब मुनियों में व्यास जी मुख्य हैं और भगवान ने उन्हें अपनी विभूति बताया है ।

गायत्री सिद्धांतों को ठीक तरह से जानने वाले जितने भी पंडित अर्थात विद्वान हैं, वह सभी कवि कहलाते हैं । उन सब कवियों में शुक्राचार्य भी मुख्य हैं । शुक्राचार्य संजीवनी विद्या के ज्ञाता हैं, इसलिए भगवान ने उन्हें अपनी विभूति बताया है ।

 

गीता श्लोक 10/38…

भगवान की विभूतियां….

भगवान कहते हैं की दमन करने वालों में दंड नीति और विजय चाहने वालों में नीति में हूं गोपनीय भावों में मोन मैं हूं और ज्ञानवानों में ज्ञान भी मैं ही हूं ।

दुष्टों को दुष्टता से बचाकर सन्मार्ग पर लाने के लिए दंड नीति मुख्य है, इसलिए भगवान ने इसको अपनी विभूति बताया है । नीति का आश्रय लेने से ही मनुष्य विजय प्राप्त करता है और नीति से ही विजय ठहरती है । इसलिए नीति को भगवान ने अपनी विभूति बताया है ।

गुप्त रखने योग्य जितने भाव हैं, उन सब में मौन अर्थात वाणी का संयम या चुप रहना मुख्य है । क्योंकि चुप रहने वाले के भावों को हर व्यक्ति नहीं जान सकता । इसलिए गोपनीय भावों में भगवान ने मौन को अपनी विभूति बताया है। संसार में कला कौशल आदि को जानने वालों में जो ज्ञान अथवा जानकारी है, वह भगवान की विभूति है इन सब विभूतियों की जो विलक्षणता है, वह उनकी अपनी खुद की नहीं है, वरण परमात्मा श्री भगवान की है, इसलिए परमात्मा की तरफ दृष्टि जानी चाहिए ।

 

गीता श्लोक 10/39…

भगवान की विभूतियां ….

 

भगवान कहते हैं कि हे अर्जुन संपूर्ण प्राणियों का जो बीज अर्थात मूल कारण है, वह बीज भी मैं ही हूं । क्योंकि वह चर और अचर कोई प्राणी नहीं है, जो मेरे बिना हो अर्थात चर और अचर सब कुछ में ही हूं।

श्लोक 10/20 से लेकर 10/39 तक भगवान ने अपनी कुल 82 विभूतियों का वर्णन किया है । 20 वे श्लोक में चार विभूति, 21 वे में चार,वॉइस वे में 4, 23 में 4, 24 में तीन, 25 में 4, 26 में 4, 27 में तीन, 28 में 4, 29 में 4, 30 में चार, 31 वे में 5, 37 में 4, 38 में चार, 39 में एक, विभूति का वर्णन आया है ।

इस श्लोक में भगवान समस्त विभूतियों का सार बताते हैं कि सबका बीज अर्थात मुख्य कारण मैं हूं । बीज कहने का तात्पर्य है कि इस संसार का निमित्त कारण भी मैं ही हूं और उपादान कारण भी मैं ही हूं अर्थात संसार को बनाने वाला भी मैं ही हूं और संसार रूप से बनाने वाला भी मैं ही हूं अर्थात सब कुछ मैं ही हूं । ऐसा मानने से साधक को भगवान का ही चिंतन करना चाहिए ।

 

गीता श्लोक 10/40…

दिव्य विभूतियों का उपसंहार…

भगवान कहते हैं कि ही परंतप अर्जुन ! मेरी दिव्य विभूतियों का अंत नहीं है । मैंने तुम्हारे सामने अपनी विभूतियों का जो विस्तार कहा है, यह तो केवल संक्षेप में कहा है ।

ये दिव्य शब्द अलौकिकता और विलक्षणता का द्योतक हैं । साधक का मन जहां चला जाता है, वहीं भगवान का चिंतन करने से यह दिव्यता वहीं प्रकट हो जाती है । क्योंकि भगवान के समान दिव्य कोई है ही नहीं । देवता, जो दिव्या कहे जाते हैं, वह भी नित्य ही भगवान के दर्शन की इच्छा रखते हैं । इससे सिद्ध होता है कि दिव्यता तो एक भगवान में ही है । इसलिए भगवान की जितनी विभूतियां हैं, तत्वों से सभी दिव्य हैं । परंतु साधक के सामने उन विभूतियों की दिव्यता तभी प्रकट होती है, जब उसका उद्देश्य केवल एक भगवत प्राप्ति का ही होता है । भगवत तत्व जानने के लिए राग, द्वेष से रहित होकर उन विभूतियों में केवल भगवान का ही चिंतन करना चाहिए । भगवान की दिव्य विभूतियों का कोई अंत नहीं है । भगवान स्वयं अनंत हैं और उनकी विभूतियां, गुण लीलाएं आदि सभी अनंत हैं । कहा जाता है कि “हरि अनंत, हरि कथा अनंता” ।

 

गीता श्लोक 10/41…

भगवान का तेज अर्थात योग…

भगवान कहते हैं कि जो जो ऐश्वर्या युक्त शोभा युक्त और बाल युक्त प्राणी तथा पदार्थ हैं उसको तुम मेरे ही तेज अर्थात योग अर्थात समर्थ के अंश से उत्पन्न हुई समझो ।

संसार में जिस किसी सजीव निर्जीव वास्तु व्यक्त घटना स्थिति गुण भाव क्रिया आदि में जो कुछ ऐश्वर्या दिखे शोभा या सौंदर्य दिखे बलवत्ता दिखे तथा जो कुछ भी विशेषता विलक्षणता योग्यता दिखे उन सब को मेरे तेज से किसी एक अंश से उत्पन्न हुई जानू अर्थात उनमें यह विलक्षण था में मेरे योग या तेज अथवा समर्थ से आई है तुम ऐसा ही समझो मेरे बिना कहीं भी और कुछ भी विलक्षणता नहीं है मनुष्य को जिस जिस में विशेषता मालूम पड़े उसे उसमें भगवान की ही विशेषता मानते हुए भगवान का ही चिंतन स्मरण करना चाहिए हर वस्तु में विशेषता भगवान के कारण ही है ।

 

गीता श्लोक 10/42…

भगवान की खास बात….

 

भगवान कहते हैं कि हे अर्जुन! तुम्हें इस प्रकार बहुत सी बातें जानने की क्या आवश्यकता है? जब मैं अपने किसी एक अंश से इस संपूर्ण जगत को विकास करके स्थित हूं अर्थात अनंत ब्रह्मांड मेरे किसी अंश में हैं ।

अर्जुन ने भगवान से जो प्रश्न किया था, उसका उत्तर दे चुके हैं। अब भगवान अपनी तरफ से एक विशेष महत्व की बात बताते हैं ।भगवान अर्जुन से कहते हैं कि अब तुम्हें अन्य बहुत कुछ जानने की क्या आवश्यकता है? मैं स्वयं घोड़े की लगाम और चाबुक पकड़े तेरे सामने बैठा हूं । दिखने में तुम्हें छोटा दिखाई पड़ता हूं, परंतु मेरे इस शरीर के किसी एक अंश में, अनंत को ब्रह्मांड महासर्ग और महाप्रलय दोनों अवस्थाओं में मेरे में स्थित हैं

उन सब को लेकर मैं तेरे सामने बैठा हूं तब तेरे लिए बहुत सी बातें जानने की क्या आवश्यकता है।

मैं इस संपूर्ण जगत को एक अंश से व्याप्त करके स्थित हूं । तात्पर्य यह है कि भगवान के किसी भी अंश में अनंत सृष्टियां विद्यमान हैं ।

“रोम रोम प्रति वालों को–कोटि ब्रह्मांड” परंतु उन सृष्टियों से भगवान का कोई अंश अथवा भाग रुका नहीं है ।

 

अध्याय _11…………..

विश्व रूप दर्शन योग ….

श्लोक 11/01…………

अर्जुन उवाच_

अर्जुन बोले_ मुझ पर कृपा करने के लिए, प्रभु आपने जो परम गोपनीय आध्यात्म विषयक वचन कहे, उससे मेरा यह मोह नष्ट हो गया।

भगवान की कृपा का अनुभव करके अर्जुन भाव_ विभोर हो उठे और कृपा का रहस्य प्रकट करने के लिए जब अत्यधिक प्रसन्नता से बोले, तब नियम का ध्यान नहीं रहा, अतः यह श्लोक( गीता 11/01) 32 अक्षरों के बजाय, 33 अक्षरों का आया है, बाकी गीता में श्लोक से में 32 अक्षर ही आए हैं । इससे यह पता चलता है कि, अत्यधिक प्रसन्नता रहने पर अर्जुन को नियम का ध्यान नहीं रहता ।

भगवान कहते हैं कि मेरा भजन करने वालों पर कृपा करके मैं स्वयं उनके अज्ञान जन्य अंधकार का नाश कर देता हूं । यह बात भगवान ने केवल कृपावश होकर कही है । इस बात का अर्जुन पर बड़ा प्रभाव पड़ा, जिससे अर्जुन भगवान की स्तुति करने लगे । उसी का लक्ष्य करने pके लिए अर्जुन कहने लगे कि केवल मेरे पर कृपा करने के लिए ही आपने ऐसी बात कही है। भगवान ने अपनी प्रधान _ प्रधान विभूतियों को कहने के बाद अपनी ओर से कहा कि, मैं अपने किसी अंश में संपूर्ण जगत को अनंत कोटि ब्रह्मांडों को व्याप्त करके स्थित हूं ।

 

गीता श्लोक 11/02…

अर्जुन का मोह कैसे नष्ट हुआ…

अर्जुन कहते हैं कि हे कमल नयन भगवान ! संपूर्ण प्राणियों के उत्पत्ति तथा विनाश मैने विस्तार पूर्वक आपसे सुने हैं और आपका अविनाशी महात्म्य भी सुना ।

अर्जुन का मोह इसलिए नष्ट हुआ कि उसने भगवान के श्री मुख से प्राणियों के उत्पत्ति तथा विनाश विस्तार पूर्वक सुने और भगवान का अविनाशी महात्म्य सुना है । भगवान में हर चीज समाई हुई है अर्थात हर वक्त भगवान मय है। हर वस्तु उन्हीं की है और उन्हीं के लिए है । यह जानकर अर्जुन का मोह नष्ट हो गया । भगवान तो स्वयं कह चुके हैं कि, मैं संपूर्ण जगत का उत्पादक प्रभव और प्रलय अर्थात विनाशक मेरे सिवाय अन्य कोई कारण नहीं है । सात्विक, राजस, तामस भाव भगवान से ही होते हैं । प्राणियों के अलग-अलग अनेक तरह के भाव मेरे से ही होते हैं । संपूर्ण प्राणी मेरे से ही होते हैं और मेरे से ही चेष्टा करते हैं ।

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