गीता श्लोक 2/11(भाग – 2)
अर्जुन कहते हैं कि –
एक – “स्वजनों” को देखकर मेरे.. दो – “स्वजनों” को मार कर हम कैसे सुखी होंगे माधव?
भगवान कहते हैं कि हे अर्जुन! तू विद्वान अर्थात पंडित की तरह से भाषण अर्थात बातें करता है और दूसरी तरफ शोक मना रहा है। तू पंडित तो है नहीं, क्योंकि जो पंडित होते हैं, वह किसी के लिए अर्थात- जो चले गए हैं और – जो भविष्य में जाएंगे (मृत्यु प्राप्त होंगे), उनके लिए शौक नहीं करते। परंतु तू तो शोक कर रहा है। इसलिए तू विद्वान नहीं है।
गतासून अर्थात जिनके प्राण चले गए हैं अर्थात जिनकी मृत्यु हो चुकी है,
अगतासून – जिनके प्राण अभी नहीं गए हैं अर्थात जो अभी जीवित हैं अर्थात जो अभी मृत्यु को प्राप्त नहीं हुए हैं,
इन दोनों प्रकार के लोगों के लिए तुम्हें शौक नहीं करना चाहिए। परंतु तुम तो शोक कर रहे हो। अतः तुम विद्वान तो हो नहीं।
गीता श्लोक 2/12 (भाग -1)
मैं, तू और ये राजा लोग, क्या पहले नहीं थे?
भगवान कहते हैं कि है अर्जुन! किसी काल में मैं नहीं था और तू नहीं था तथा यह राजा लोग नहीं थे, यह बात भी नहीं है और इसके बाद भविष्य में मैं, तू और यह राजा लोग, हम सब नहीं रहेंगे, यह बात भी नहीं है।
देखा जाए तो संसार में दो ही वस्तुएं हैं – शरीर जो असत है और शरीरी जो सत्य है। आत्मा है यह दोनों ही अशोच्य अर्थात दुख न करने योग्य हैं। शरीरी अर्थात शरीर के अंदर रहने वाली आत्मा का कभी अभाव नहीं होता अर्थात वह सदैव विद्यमान रहती है और शरीर कभी बहुत लंबे समय तक नहीं रह सकता। शरीर का अंत होना ही है।
ना तो तुम या मैं किसी काल में नहीं थे ऐसी बात नहीं है, इससे पहले भी तुम और मैं दोनों रहे हैं। लोगों की दृष्टि में मैंने जब तक अवतार नहीं लिया था, तब तक मैं भी, इस कृष्ण रूप से प्रकट नहीं था अर्थात मैं इस कृष्ण रूप में नहीं था और जब तक तेरा जन्म नहीं हुआ था, तू भी अर्जुन रूप में से प्रकट नहीं था। जब तक इन राजाओं का प्रकट रूप से जन्म नहीं हुआ था, तब तक यह सब भी अपने इस प्रकट नाम से नहीं जाने जाते थे। परंतु मैं, तू और यह राजा लोग पहले भी थे, अभी हैं, आगे भी रहेंगे ।
गीता श्लोक 2/12 (भाग -2)
…तो फिर क्या बात है ?……
बात यही है कि पहले भी हम सब जरूर थे, क्योंकि नित्य तत्व सदा रहता है। इसका कभी अभाव नहीं होता। भगवान कहते हैं कि भविष्य में शरीरों की यह अवस्थाएं नहीं रहेगी और एक दिन यह शरीर भी नहीं रहेंगे।
यह शरीर भी नहीं रहेंगे, तो क्या हम रहेंगे? हां हम जरूर रहेंगे अर्थात जो नीति है, उसका अभाव न कभी था और न कभी रहेगा। हम सब पहले भी थे, अब भी हैं और आगे भी रहेंगे।
यह शरीर पहले नहीं थे और आगे भी नहीं रहेंगे — इससे शरीरों की अनित्यता (mortelity) सिद्ध होती है अर्थात यह शरीर हमेशा नहीं रहते। दूसरी बात, हम सब पहले थे और आगे भी रहेंगे। इससे सबके स्वरूप (आत्मा) की नित्यता सिद्ध हुई अर्थात जो आज, अर्थात आरंभ में और अंत में रहता है, वह मध्य में भी रहता है। जो आदि (जन्म के पहले) और अंत में (मृत्यु के बादu)नहीं था, वह मध्य (वर्तमान) में भी नहीं रहता। अतः या सब राजा लोग अब मारी जाने वाले हैं अर्थात अब इनके शरीर ज्यादा समय तक नहीं रहेंगे अर्थात मृत्यु को प्राप्त होंगे।
इसी दृष्टि से मैं, तू और इन राजा लोगों का स्वरूप (शरीर), शोक करने योग्य नहीं है। शरीर तो पैदा होते हैं और मरते रहते हैं। परंतु एक अदृश्य शक्ति है, वह हमेशा जीवित रहती है. उसका न जन्म होता है और न मरण होता है। वह तो है शरीर के अंदर रहने वाली शरीरी है अर्थात आत्मा है ।
गीता श्लोक 2/13
अनेक युग बदल जाएं तो भी शरीरी अर्थात प्राण अथवा आत्मा बदलती नहीं। वह तो वही रहती है, क्यों वह तो परमात्मा का अंश है, परंतु शरीर तो प्रतिक्षण बदलता ही रहता है।
हे अर्जुन! देहधारी के इस मनुष्य शरीर में जैसे बालकपन जवानी और वृद्धावस्था होती है ऐसे ही दूसरे शरीर की प्राप्ति होती है। उस विषय में धीर अर्थात धैर्यवान पुरुष मोहित नहीं होते अर्थात विचलित नहीं होते.
शरीर में अवस्थाओं का क्रम होता है -पहले बाल्यावस्था आती है, फिर यौवन, फिर वृद्धावस्था। शरीर में सदैव एक अवस्था नहीं रहती, उसमें निरंतर परिवर्तन होता रहता है। शरीर धारी के इस शरीर में ऐसा कहा जाए तो यह बात जाहिर होती है कि शरीर अलग है और शरीरी अर्थात आत्मा अलग है। शरीर में अलग अवस्थाओं के रूप में जो परिवर्तन होता है, वह शारीरी अर्थात आत्मा में नहीं होता।r
शरीर की अवस्थाओं में क्रमानुसार परिवर्तन होता है, तब तो इन अवस्थाओं के परिवर्तन से हमें कोई शोक नहीं होता। इसी प्रकार शरीरी अर्थात आत्मा एक शरीर से दूसरे शरीर में जाता है, तो फिर इस विषय में भी कोई शोक नहीं होना चाहिए। क्योंकि शरीरी भी तो अपना शरीर बदल रही है अर्थातp एक पुरुष की मृत्यु होती है, तो वह शरीर अर्थात आत्मा दूसरे शरीर में पहुंच जाती है, तो इस प्रकार के परिवर्तन में हमें कोई शोक नहीं होना चाहिए ।
गीता श्लोक 2/14
इन्द्रियों के विषय…
भगवान कहते हैं कि हे कुंती नंदन! इंद्रियों के विषय, जड़ पदार्थ तो, उष्ण अर्थात प्रतिकूलता के द्वारा, सुख और दुख देने वाले हैं तथा आने- जाने वाले हैं एवं अनित्य हैं, सदा नहीं रहने वाले हैं। हे भरत वंश के उद्भव अर्जुन! तुम आने और जाने वाले दुखों को, सहन करो।
मात्रास्पर्शा — मात्रा का तात्पर्य होता है, माप तोल अर्थात परिमाण या मात्रा / परिमाण का पता लगाना, जिससे माप तोल का ज्ञान होता है, उन इंद्रियों और अंतःकरण का नाम मात्रा है। इन्द्रियाँ अपने ज्ञान से पता लगा लेती हैं कि यह पढ़ार्थ छोटा है, बड़ा है, ठण्डा है, गरम है, हलका है, भारी है । इंद्रियों और अंतःकरण से जिनका सहयोग होता है, उनका नाम स्पर्श है। अतः इंद्रियों और अंतःकरण से जिनका ज्ञान होता है, ऐसे सृष्टि के पदार्थ मात्रास्पर्श हैं ।
आगमपायिन — पदार्थ तो आदि और अंत वाले, उत्पत्ति और विनाश वाले, आने और जाने वाले हैं, क्योंकि वह उत्पत्ति से पहले नहीं थे और विनाश के बाद भी नहीं रहेंगे, इसलिए वह आगमपायिन अर्थात आने और जाने वाले हैं।
श्रीमद्भगवद्गीता-कालीचरन राजपूत






