कुछ दोहे,,,,,,,,,,
शकूर अनवर
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कौन किसी की क्या कहे,क्या होगा इस बार।
गूंगे बहरे आमजन, अंधों की सरकार।।
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अनपढ़ रहना श्राप है, तू इसको पहचान।
शिक्षा से ही लाज़मी, जीवन का उत्थान।।
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राजा हो या बादशा, कहाँ गये वो ठाट।
मिट्टी में सब मिल गये, बड़े बड़े सम्राट।।
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शकूर अनवर
9460851271
***** ग़ज़ल**”***
शकूर अनवर
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सब उसको पागल कहते हैं, यूँ ही बकता रहता है।
फिर भी उसकी बात का जादू दिल पर छाया रहता है।।
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शहर बसाकर शहर जलाना अहले-ख़िरद* समझायेगा।
अहले-जुनूँ* तो वीरानों में तन्हा फिरता रहता है।।
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मछली का विपरीत दिशा में चलने का साहस देखो।
पंछी में भी जान है कितनी फिर भी उड़ता रहता है।।
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अपना अपना रोल करो और दुनिया से रुख़सत* लेलो।
दुनिया तो इक नाटक घर है पर्दा गिरता रहता है।।
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मैं अपने घर के छप्पर को ठीक कहाँ तक करवाऊँ।
बारिश का मौसम तो “अनवर” आता जाता रहता है।।
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शकूर अनवर
अहले-ख़िरद*बुद्धिजीवी
अहले-जुनूँ*दीवाना
रुख़सत*अवकाश
9460851271





