Saturday, October 3, 2026
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हाड़ौती के ख्यात गीतकार दुर्गादान सिंह गौड़ का निधन, राजस्थानी साहित्य जगत में शोक

हाड़ौती के ख्यात गीतकार दुर्गादान सिंह गौड़ का निधन, राजस्थानी साहित्य जगत में शोक

कोटा। हाड़ौती की माटी, लोकजीवन और राजस्थानी भाषा को अपने गीतों के माध्यम से देशभर में पहचान दिलाने वाले वरिष्ठ कवि एवं गीतकार दुर्गादान सिंह गौड़ के निधन से साहित्यिक और सांस्कृतिक जगत में शोक की लहर है। उनके निधन का समाचार सामने आने के बाद कोटा सहित हाड़ौती अंचल के साहित्यकारों, कवियों और उनके प्रशंसकों में शोक की भावना व्याप्त है।

दुर्गादान सिंह गौड़ को हाड़ौती गीत परंपरा के प्रमुख और सम्मानित गीतकारों में गिना जाता है। साहित्यिक स्रोत अंजस उन्हें “ख्यात गीतकार” तथा हाड़ौती गीत परंपरा में अतिसम्मानित रचनाकार के रूप में दर्ज करता है। उनका साहित्यिक जुड़ाव कोटा से रहा और उनकी रचनाओं में हाड़ौती के लोकजीवन, मानवीय संवेदनाओं, प्रेम, श्रृंगार और ग्रामीण संस्कृति की गहरी छाप दिखाई देती है।

राजस्थानी गीतों को दी अलग पहचान

दुर्गादान सिंह गौड़ की रचनाओं ने मंचीय राजस्थानी कविता और हाड़ौती गीत को व्यापक पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी चर्चित रचनाओं में ‘गोरी गोरी गजबण’ और ‘पाणी में चांद घुळै छै’ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। साहित्यिक मंचों पर उनके गीतों को लंबे समय तक सराहा जाता रहा है। अंजस के संग्रह में उनकी कई अन्य रचनाएं भी दर्ज हैं, जिनमें ‘चाक पै’, ‘छोरी को चत न लागै’, ‘नीमड़ी’, ‘मोट्यारपणो’ और ‘साजन गीतां को बोपारी’ शामिल हैं।

उनके गीतों की विशेषता यह रही कि वे केवल श्रृंगार अथवा मनोरंजन तक सीमित नहीं रहे, बल्कि उनमें हाड़ौती अंचल का लोकजीवन, बोली-बानी, रिश्तों की आत्मीयता और ग्रामीण संवेदनाओं की जीवंत तस्वीर दिखाई देती है। एक साहित्यिक आलेख में उनकी कविता को राजस्थानी-हाड़ौती की लोक संस्कृति और जीवन से गहराई से जुड़ी हुई रचनाशीलता के रूप में रेखांकित किया गया है।

पांच दशक से अधिक का साहित्यिक सफर

उपलब्ध साहित्यिक सामग्री के अनुसार दुर्गादान सिंह गौड़ का जन्म वर्ष 1947 दर्ज है। अंजस उन्हें कोटा संभाग से जुड़े रचनाकार के रूप में सूचीबद्ध करता है।

उनका साहित्यिक सफर कई दशकों तक चला। वे कवि सम्मेलनों के लोकप्रिय मंचीय गीतकार रहे। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान रुड़की के आधिकारिक कवि सम्मेलन रिकॉर्ड में भी दुर्गादान सिंह गौड़ का नाम आमंत्रित कवियों में दर्ज है, जिससे उनके राष्ट्रीय स्तर के काव्य मंचों तक पहुंच का प्रमाण मिलता है।

उनकी कविताओं और गीतों को विभिन्न साहित्यिक एवं डिजिटल मंचों पर भी संरक्षित किया गया है। वर्धमान महावीर खुला विश्वविद्यालय की सामग्री में उन्हें आधुनिक राजस्थानी भाषा के महत्वपूर्ण कवियों की सूची में स्थान दिया गया है।

‘पाणी में चांद घुळै छै’ रही चर्चित कृति

दुर्गादान सिंह गौड़ की साहित्यिक पहचान को मजबूत करने वाली प्रमुख कृतियों में ‘पाणी में चांद घुळै छै’ का विशेष उल्लेख मिलता है। रज़ा फाउंडेशन पर प्रकाशित साहित्यिक आलेख के अनुसार उनकी गीतों की पहली पुस्तक वर्ष 2013 में प्रकाशित हुई थी। आलेख में उनके गीतों की भाषा, लोक-संस्कृति और बिंब-विधान की विशेष सराहना की गई है।

उनकी रचना ‘गोरी गोरी गजबण’ भी लंबे समय से राजस्थानी काव्य-मंचों पर चर्चित रही है। उनके गीतों के वीडियो और काव्य-पाठ आज भी ऑनलाइन उपलब्ध हैं।

हाड़ौती साहित्य की एक महत्वपूर्ण आवाज

हाड़ौती अंचल के साहित्यिक इतिहास में दुर्गादान सिंह गौड़ का नाम उन रचनाकारों के साथ लिया जाता है जिन्होंने स्थानीय बोली और लोक-संस्कृति को साहित्यिक अभिव्यक्ति दी। ‘आपणो राजस्थान’ की सामग्री में भी उन्हें हाड़ौती के महत्वपूर्ण कवि-लेखकों में शामिल किया गया है।

उनकी रचनाओं की सबसे बड़ी ताकत उनकी सहज भाषा और लोकजीवन से निकली संवेदना रही। उन्होंने हाड़ौती की बोलचाल, लोक प्रतीकों और ग्रामीण जीवन को गीतों का विषय बनाया और इस तरह स्थानीय भाषा को व्यापक साहित्यिक मंच तक पहुंचाने में योगदान दिया।

साहित्यिक जगत के लिए अपूरणीय क्षति

दुर्गादान सिंह गौड़ के निधन का समाचार हाड़ौती के साहित्यिक संसार के लिए निश्चित रूप से बड़ी क्षति है। उनका जाना केवल एक वरिष्ठ गीतकार का जाना नहीं, बल्कि हाड़ौती की उस गीत परंपरा के एक महत्वपूर्ण स्वर का मौन हो जाना है, जिसने राजस्थानी भाषा और लोक संस्कृति को मंचों तक पहुंचाया।

उनकी रचनाएं आने वाली पीढ़ियों के लिए हाड़ौती की भाषा, लोकजीवन और सांस्कृतिक संवेदना का महत्वपूर्ण दस्तावेज बनी रहेंगी।

दुर्गादान सिंह गौड़ का अंतिम संस्कार 17 अगस्त , सोमवार को सुबह 10 बजे उनके पैतृक गांव जोलपा में किया जाएगा। अंतिम संस्कार में परिजनों, साहित्यकारों, मित्रों और उनके प्रशंसकों के शामिल होने की संभावना है।

दुर्गादान सिंह गौड़ का निधन हाड़ौती की साहित्यिक परंपरा के लिए एक बड़ी क्षति है। उनके गीतों में जीवित हाड़ौती की भाषा, लोकसंस्कृति और संवेदनाएं आने वाली पीढ़ियों तक उनकी स्मृति को जीवित रखेंगी।

 

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