“कविता:- खुशियाँ बाँटे”
जो अशक्त हैँ, जो निर्धन हैँ
बाँटे उनमें प्यार
आओ उनके बीच मनाएँ
खुशियों का त्यौहार
घोर ग़रीबी , घोर निराशा
चेहरों पर दिखती न आशा
आप उन्हें, जो मिल जाएंगे
चेहरे उनके खिल जाएंगे
थोड़ी खुशियाँ लेकर जाएं
थोड़ा उन पर स्नेह लुटाएं
जन-सेवा,सच्ची धन-लक्ष्मी
उनके घर भी दीप जलाएं
जिन्हें न मिलताअच्छा भोजन
आज मिठाई पा जाएंगे
जीवन में कुछ कमी न होगी
इतनी दुआएं दे जाएंगे
ईश्वर ने जो दिया आपको
निर्धन – निर्बल में भी बाँटे
होली-दिवाली,ईद-क्रिसमस
खुशियाँ उनके साथ भी बाँटे
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( स्वरचित,मौलिक, अप्रकाशित)
( सलीम “स्वतंत्र” कोटा- राज.)






