Tuesday, April 21, 2026
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श्रीमद्भगवद्गीता- कालीचरण राजपूत

गीता शोक 7/27 …

मूढ़ मनुष्य जन्म मरण को प्राप्त होते हैं……..

भगवान कहते हैं कि हे अर्जुन ! इच्छा अर्थात राग और द्वेष से उत्पन्न होने वाले द्वंद मोह से मोहित, सभी प्राणी संसार में अनादि काल से मूढ़ता को अर्थात जन्म मरण को प्राप्त हो रहे हैं । इच्छा और मोह के द्वंद से मोह पैदा होता है, जिससे मोहित होकर प्राणी भगवान से बिल्कुल विमुख हो जाते हैं और विमुख होने से बार-बार संसार में जन्म लेते हैं । मनुष्य को संसार से विमुख होकर केवल भगवान में लगने की आवश्यकता है । भगवान में न लगे में बड़ी बाधा है। मनुष्य शरीर तो विवेक वाला है, अतः उसकी प्रवृत्ति विवेक के अनुसार ही होनी चाहिए । परंतु मनुष्य अपने विवेक को महत्व न देकर राग और द्वेष को लेकर ही प्रवृत्ति और निवृत्ति करता है जिससे उसका पतन होता है ।

गीता श्लोक 7/28….

पुण्य कर्मा मनुष्य मेरा भजन करते हैं….

हे अर्जुन परंतु जिन पुण्य कर्मा मनुष्यों के पाप नष्ट हो गए हैं, वह द्वंद मोह से रहित हुए मनुष्य, दृढ़ वृत्ति होकर मेरा भजन करते हैं ।

 

भगवान कहते हैं कि जो द्वंद मोह से मोहित हैं, वे भजन नहीं करते और जो द्वंद मोह से मोहित नहीं है, वह भजन करते हैं । तब भजन न करने वालों की अपेक्षा, भजन करने वालों की विलक्षणता बताने के लिए इस श्लोक में “तु” पद दिया गया है । जिन मनुष्यों ने अपने लिए भगवत प्राप्ति ही करनी है अर्थात जिनका उनके उद्देश्य भागवत भजन, जप, तप, कीर्तन की स्मृति आ गई है, वह मनुष्य ही पुण्य कर्मा है । एक निश्चय करने से ही शुद्ध और पवित्रता आती है । उनका उद्देश्य रहता है कि हमें तो केवल भगवान की तरफ ही जाना है, ऐसा सोचने से विमुखता अर्थात अर्थात भगवान से दूर जाने की भावना मिट जाती है ।

गीता श्लोक 7/29 …..

मुक्ति पाने के लिए मनुष्य मेरा आश्रय लें ….

 

भगवान कहते हैं कि वृद्धावस्था और मृत्यु से मुक्ति पाने के लिए जो मनुष्य मेरा आश्रय लेकर प्रयत्न करते हैं, वह उस ब्रह्म, संपूर्ण अध्यात्म और संपूर्ण कर्म को जान जाते हैं ।

 

 बुढ़ापा अर्थात वृद्धावस्था और मृत्यु से छुटकारा पाने के लिए वे लोग मेरा आश्रय या सहारा लेते हैं । यहां पर “जरा” अर्थात वृद्धावस्था और “मरण” अर्थात मृत्यु से मुक्ति अर्थात छुटकारा, का तात्पर्य यह नहीं के अध्यात्म और कर्म के ज्ञान पर वृद्धावस्था नहीं आएगी, तात्पर्य यह है कि बोध हो जाने पर शरीर में आने वाली वृद्धावस्था और मृत्यु तो आएगी ही । परंतु यह दोनों अवस्थाएं उसको दुखी नहीं कर सकेगी । जरा, मृत्यु आदि शरीर के विकारों से संबंध विच्छेद हो जाए अर्थात वृद्धावस्था में उनकी ओर ध्यान कम से कम जाए अथवा जाए ही नहीं, ऐसा होना चाहिए ।

गीता श्लोक 7/30 ….

आरंभ में जानने वाले, अंत में भी मुझे ही जानते हैं…..अर्थात आरंभ ममेरा भजन करने वाले अंत में भी मेरा ही भजन करते हैं

 

भगवान कहते हैं कि जो मनुष्य आदिभूत तथा आदि देव के सहित और अधियज्ञ के सहित मुझे जानते हैं, वह मुझ में लगे हुए चित्त वाले मनुष्य, अंत काल में भी मुझे ही जानते हैं अर्थात मुझे ही प्राप्त होते हैं ।

 

अधिभूत_ अदिभूत का तात्पर्य है कि भौतिक स्थूल सृष्टि इसमें तमोगुण की प्रधानता होती है । भौतिक सृष्टि की क्षण भर भी स्वतंत्र सत्ता नहीं होती, क्षण भर भी स्थिति नहीं होता । फिर भी यह भौतिक सृष्टि सत्य मालूम पड़ती है । यह सब वास्तव में भगवान के ही हैं, क्षणभंगुर संसार के नहीं ।

 

अधिदेव _ सृष्टि की रचना करने वाले ब्रह्मा जी का नाम अधिदेव है । इसमें रजोगुण की प्रधानता रहती है । भगवान ही ब्रह्मा जी के रूप में पैदा होते हैं अर्थात प्रकट होते हैं अर्थात तत्व से ब्रह्मा जी भगवत स्वरूप हैं । यह जानना ही अधिदेव के साथ भगवान को पूजना है और भगवान को जानना है ।

 

अधियज्ञ_ अधियज्ञ नाम भगवान विष्णु का है । वह अंतर्यामी रूप में सब में व्याप्त हैं । सगुन की प्रधानता है । तत्व से भगवान ही अंतर्यामी रूप से सब में व्याप्त हैं। ऐसा जानना ही अधियग्य के सहित भगवान को जानना है।

 

अधिभूत _ अधदैव और अधियग्य के सहित भगवान को जानने का तात्पर्य है कि भगवान श्रीकृष्ण के शरीर के किसी एक अंश में विराट रूप में अर्थात विशाल रूप में अर्थात विश्व रूप में उस विराट रूप में अधिभूत अर्थात अनंत ब्रह्मांड, आदिदेव अर्थात ब्रह्मा जी और अधियज्ञ अर्थात श्री विष्णु आदि सभी है ।

गीता अध्याय_ 8 ……

(अक्षर ब्रह्म योग)

श्लोक 8/1 और 8/2

श्री कृष्ण से…अर्जुन के आठ प्रश्न

अर्जुन कहते हैं कि 1_ हे पुरुषोत्तम वह ब्रह्म क्या है? 2_अध्यात्म क्या है?

3_कर्म क्या है ?

4_अदिभूत किसको कहा गया है?

5_और अधिदेव किसको कहा जाता है ?

6_यहां अधियज्ञ कौन है?

7_ और वह इस देह में कैसे रहता है ?

8_ हे मधुसूदन वसीभूत अंतकरण वाले मनुष्य के द्वारा अंतकाल में आप कैसे जानने में आते हैं ?

 

अर्जुन ने भगवान से प्रश्न किए एक _हे पुरुषोत्तम ! वह ब्रह्म क्या है अर्थात ब्रह्म शब्द से क्या समझना चाहिए अर्थात ब्रह्म शब्द से क्या तात्पर्य है?

दो _अध्यात्म क्या है?

तीन_ कर्म क्या है अर्थात कर्म शब्द से क्या तात्पर्य है?

चार _अधिभूत शब्द से क्या कहा गया है अथवा अधिभूत शब्द से क्या तात्पर्य है ?

पांच _अधिदेव किसको कहा जाता है?

छह_इस प्रकरण में अधिक यज्ञ शब्द से क्या तात्पर्य है अथवा फिर अधियग्य इस देह में कैसे रहता है?

सातवां _हे मधुसूदन ! जो पुरुष वशीभूत अंतःकरण वाले हैं अथवा जो संसार से सर्वथा हटकर अनन्य भाव से केवल आप में ही लगे हुए हैं, उनके द्वारा अंत काल में आप कैसे जानने में आते हैं ?

आठ _ वे आपके किस रूप को जानते हैं और किस प्रकार से जानते हैं ?

गीता श्लोक 8/3….

अक्षर ब्रह्म ही परमात्मा है ….

भगवान बोले कि परम अक्षर ब्रह्म है और परा प्रकृति जीव को अध्यात्म कहते हैं । प्राणियों की सत्ता (भाव) को प्रकट करने वाला जो त्याग है, कर्म कहा गया है ।

: गीता श्लोक 8/4…..

अधिदेव ब्रह्मा हैं और अधियज्ञ में हूं ।

हे देहधारियों में श्रेष्ठ अर्जुन ! क्षर भाव अर्थात नाशवान पदार्थ अधिभूत हैं । पुरुष अर्थात हिरण्य गर्भा ब्रह्मा, अधिदेव हैं और इस देह में अंतर्यामी रूप से मैं ही अधियज्ञ हूं ।

तात्पर्य_

प्रश्न 4_ अधिभूत किसको कहा गया है ?

__ हे अर्जुन ! सारे नाशवान पदार्थ अधिभूत हैं ।

 

प्रश्न_5 अधिदैव किसको कहा गया है ?

__ पुरुष अर्थात् हिरण्यगर्भा ब्रह्मा अधिदैव हैं ।

प्रश्न_6 अधियज्ञ कौन हैं ?

__ इस देह / शरीर में अन्तर्यामी रूप से विराजमान, मैं (ईश्वर) ही अधियज्ञ हूं ।

पृथ्वी, जल, तेज,वायु, और आकाश इन महा भूतों से बनी सृष्टि प्रतिक्षण परिवर्तनशील और नाशवान है । इस नाशवान सृष्टि को अधिभूत कहा गया है ।

अधिदैव पद में, आदि पुरुष और हिरण्यगर्भ, ब्रह्मा को कहा गया है ।

महासर्ग के आदि में भगवान के संकल्प से सबसे पहले ब्रह्मा की उत्पत्ति होती है, फिर वे सर्ग के आदि में सारी सृष्टि की रचना करते हैं।

 

गीता श्लोक 8/5 …..

अंत काल में प्रभु आप कैसे जानने में आते हैं ?

भगवान कहते हैं कि जो मनुष्य अंत काल में भी मेरा स्मरण करते हुए शरीर छोड़कर जाता है, वह मेरे स्वरूप को ही प्राप्त होता है । इसमें संदेह नहीं ।

प्रश्न 7 अंत काल में प्रभु आप कैसे जानने में आते हैं ?

उत्तर _जो मनुष्य अंत काल में भी मेरा (भगवान का) स्मरण करते हुए,शरीर छोड़कर जाता है, वह मेरे स्वरूप को ही प्राप्त होता है, इसमें संदेह नहीं ।

यहां पर प्रभु कह रहे हैं कि जो मनुष्य अपने जीवन के अंतिम समय में अर्थात मृत्यु के पास की अवस्था में अगर मेरे को याद करता है, तो निसंदेह वह मुझे ही प्राप्त होता है या मेरे ही स्वरूप को प्राप्त होता है ।

इसका तात्पर्य है कि यह वाक्य भगवान ने मनुष्य शरीर देखकर साधन भजन करके अपना उद्धार करने का अवसर दिया है मनुष्य ऐसा कुछ करें, ना करें, यह उसी पर निर्भर करता है । मनुष्य अंत समय में शारीरिक कमजोरी और मानसिक कमजोरी के कारण साधन अर्थात भजन, तप, यज्ञ, जप आदि तो कर नहीं सकता, अतः मुझे याद तो कर ही सकता है, अथवा मेरा नाम तो ले ही सकता है । अंत समय के स्मरण के अनुसार वह मेरे उसी भाव को प्राप्त होता है अर्थात मुझे ही प्राप्त होता है ।

गीता श्लोक 8 /6 …..

अंत काल में जो मेरा अर्थात भगवान का स्मरण करते हैं, वह तो मेरे को प्राप्त होते हैं अर्थात भगवान को प्राप्त होते हैं । परंतु जो पुरुष किसी का स्मरण नहीं करते, वह किसको प्राप्त होते हैं?

भगवान कहते हैं कि अंतिम चिंतन के अनुसार मनुष्य को उस उस योनि की प्राप्ति होती है । जब यही नियम है, तो मेरी स्मृति से तो मेरी ही प्राप्ति होगी । परम दयालु भगवान ने अपने लिए कोई नया नियम नहीं बनाया । वरन सामान्य नियम में ही अपने को भी शामिल कर लिया है । भगवान की दया की कितनी विलक्षण बात है, कि कितने मूल्य में निम्न योनि, मिले उतने ही मूल्य में भगवान का सानिध्य प्राप्त हो जाए ।

अंत काल में जिस भाव का, जिस किसी का चिंतन होता है, शरीर छोड़ने के बाद वह जीव जब तक दूसरा शरीर धारण नहीं करता है, तब तक वह उस भाव से भावित रहता है अर्थात अंत काल का चिंतन या स्मरण वैसा ही सदैव बना रहता है । अंत काल के उस चिंतन के अनुसार ही उसका मानसिक शरीर बनता है और मानसिक शरीर के अनुसार ही, दूसरा शरीर धारण करता है ।

गीता श्लोक 8/7…

अंत काल में भगवान की स्मृति रहे इसके लिए क्या करें ?

भगवान कहते हैं कि है अर्जुन इसलिए तू सब समय में मेरा ही स्मरण कर और युद्ध भी कर । मुझ में मन और बुद्धि अर्पित करने वाला तू निसंदेह मुझे ही प्राप्त होगा ।

भगवान कहते हैं कि सब समय में मेरा ही स्मरण कर परंतु यहां अर्जुन के सामने युद्ध कर्म भी है जो उसको स्वत ही प्राप्त हुआ है इसी प्रकार मनुष्य को जो कर्तव्य के रूप में प्राप्त हो जाए उसको भगवान का स्मरण करके करना चाहिए । परंतु उसमें भगवान का स्मरण मुख्य है और कर्तव्य कर्म गौण है । भगवान के स्मरण की जागृति के लिए भगवान के साथ अपनापन होना चाहिए अर्थात भगवान से लगाव होना चाहिए । यह अपनापन या लगाव जितना ज्यादा दृढ़ होगा उतनी ही भगवान की स्मृति बार-बार आएगी ।

गीता श्लोक 8/8….

अभ्यास योग से भी भगवान प्राप्त होते हैं।

भगवान कहते हैं कि हे प्रथा नंदन ! अभ्यास योग से युक्त और अन्य का चिंतन न करने वाले चित्त से परम दिव्य पुरुष का चिंतन करता हुआ अर्थात शरीर छोड़ने वाला मनुष्य, भगवान को प्राप्त होता है ।

“अभ्यास योगयुक्ते” इस पद का तात्पर्य है कि संसार से मन हटाकर परमात्मा में बार-बार लगाना और उसका अभ्यास करना । समता का नाम योग कहा गया है । अभ्यास में मन लगाने से प्रसन्नता होती है और मन न लगने से खिन्नता अर्थात दुख होता है । यह अभ्यास तो है, परंतु अभ्यास योग नहीं है । अभ्यास योग तभी होगा जब प्रसन्नता और खिन्नता दोनों ही नहीं हो । अगर मन में प्रसन्नता और खिन्नता हो भी जाए तो भी, हम उसको महत्व नहीं दें । केवल अपने लक्ष्य को महत्व दें । अपने लक्ष्य पर दृढ़ रहना भी योग है । अर्जुन तू ऐसे योग से युक्त हो जा । चित्त अन्यगामी ना हो, वह परमात्मा के सिवाय अन्य किसी की ओर लक्ष्य ना करें, ऐसे चित्त से परम दिव्य पुरुष अर्थात् परमात्मा का चिंतन करते हुए शरीर छोड़ने वाला मनुष्य, उस परमात्मा को प्राप्त हो जाता है ।

गीता श्लोक 8 /9 ….

सगुन निराकार परमात्मा का स्वरूप…….

भगवान कहते हैं कि जो सर्वज्ञ अनादि, सब पर शासन करने वाला, सूक्ष्म से सूक्ष्म सबका धारण और पोषण करने वाला, अज्ञान से अत्यंत परे, सूर्य की तरह प्रकाश स्वरूप अर्थात ज्ञान रूप, ऐसे अचिंत्य स्वरूप का चिंतन करता है…..

संपूर्ण प्राणियों को और उनके संपूर्ण शुभ कर्मों को जानने वाले होने से, उन परमात्मा का नाम कवि अर्थात सर्वज्ञ है । भगवान सबके आदि यानी कि आरंभ होने से पुराण अर्थात प्राचीन कहे जाते हैं । हर कोई नेत्रों से देखता है । नेत्रों के ऊपर शासन करने वाला मन है, मन के ऊपर बुद्धि और बुद्धि के ऊपर अहम तथा अहम के ऊपर जो भी शासन करता है, जो सब का आश्रय प्रकाशक और प्रेरक है, वह परमात्मा अनुशासित है । परमात्मा परमाणु से भी सूक्ष्म है । परमात्मा मन और बुद्धि के विषय नहीं है । मन और बुद्धि उनको पकड़ नहीं पाते अर्थात भगवान मन और बुद्धि की पकड़ से बहुत दूर हैं । फिर परमात्मा तो उस प्रकृति से भी परे हैं । अतः वे परमात्मा सूक्ष्म से भी अत्यंत सूक्ष्म है ।

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