कुछ दोहे,,,,,,,
शकूर अनवर
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चतुर, स्वार्थी लोग सब, रहते हैं हुशियार।
भोले-भाले आम जन, सहते अत्याचार।।
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किसको हम अपना कहें,किसको समझें ग़ैर”।
राजनीति के खेल में, मची हुई अन्धेर।।
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रोक सको तो रोक लो, ख़ूब लगालो ज़ोर।
नया सवेरा आयेगा, नई उगेगी भोर।।
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शकूर अनवर
ग़ैर*अन्य,दुश्मन
9460851271




