अर्जुन द्वारा प्रभु को नमस्कार
प्रभु के बहु रूपों में से, हो उग्र रूप में कौन ?
आप स्वयं बताइए, हम सब रहते मौन ।।
हम सब की जिज्ञासा है,जानें आपका तत्व ।
बार-बार नमस्कार है, अब तो बताओ सत्य ।
प्रभु से है मेरी विनती, आप माने प्रश्न या शंका ।
पितरों की कुरु भूमि में, अर्जुन वीर है बंका ।।
उग्र रूप है आपका, आप हैं देवों में से कौन ?
मैं तो अति तुच्छ हूं, आपको जान न पाए द्रोण ।।
समझ नहीं कुछ आ रहा, चिंता में है पार्थ ।
समझें कैसे रूप को? अब तुम ही बताओ सार्थ ।।
समझ नहीं पा रहा मैं, प्रभु नमन करो स्वीकार ।
तरह-तरह के रूप क्यों ? आप किए स्वीकार ।।
अति भयंकर रूप में, प्रकट हुए क्यों आप ?
कौरवजन या धर्म पक्ष, निगल रहे क्यों आप ?
साफ बताएं हमें प्रभु, क्यों प्रविष्ट हो रहे वीर ?
क्षत्रिय तब मुख गमन से, मन हो रहे अधीर ।।
मन हो रहे अधीर,…
मन हो रहे अधीर….




