जायका
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रंग कई जीवन के,
स्वाद लेकर जीयो ।
कड़वे-मीठे घूँट का,
जायका लेकर पीयो ।।
प्रारब्ध भी जुड़ा हुआ,
इम्तिहान उसे कहो ।
गंगा-यमुना-सरस्वती की,
धाराऐं बन कर बहो ।।
संघर्षों पर कदम रखो,
विपदाओं का मज़ा चखो ।
हिम्मत कभी न हारिये,
ग़म का भी ज़ाम भखो ।।
श्रृंगार न जाने दो हाथ से,
लेते रहो जायका ।
अर्धांगनी भी आखिर जाना,
भूल जायेगी मायका ।।
दूध-सोमरस-काॅफी और,
संग मज़ा है चाय का ।
लेते रहें समय समय पर,
इनका मधुर जायका ।।
#स्वरचित/मौलिक/सर्वाधिकार सुरक्षित
#रचनाकार: बृजेन्द्र सिंह झाला”पुखराज”
कोटा (राजस्थान)






