*********ग़ज़ल********
शकूर अनवर
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चले हो परिंदे उड़ाने कहाँ।
मयस्सर* अभी इनको दाने कहाँ।।
अभी दिल्लगी के ज़माने कहाँ।
मगर वो मेरी बात माने कहाँ।।
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अब आगे तो मक़तल* ही आबाद हैं।
चले जा रहे हैं दिवाने कहाँ।।
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अब और इन दरख़्तों को मत काटिये।
बनाऍंगे पंछी ठिकाने कहाँ।।
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ये दुनिया तो रहने के लायक़ नहीं।
हमें लाके पटका खुदा ने कहाँ।।
बहारों के क़िस्से बयाबान* में।
उड़ाई है बातें हवा ने कहाँ।।
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कहीं और “अनवर” बचो धूप से।
यहाँ ज़ुल्फ़ के शामियाने कहाँ।।
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शब्दार्थ:-
मयस्सर*प्राप्त होना,मिलना
मक़तल*वधस्थल
बयाबान*निर्जन स्थान,वीराना
शकूर अनवर
9460851271
********* ग़ज़ल*******
शकूर अनवर
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इस अजनबी दुनिया में शनासा* नहीं मिलता।
मैं ढूॅंढ रहा हूँ कोई अपना नहीं मिलता।।
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दुनिया में गुनाहों से बहुत दूर रहा हो।।
ऐसा तो कोई शख़्स फ़रिश्ता नहीं मिलता।।
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तफ़्तीश* मेरे क़त्ल की फाइल में दबी है।
मक़तल* में कोई ख़ून का धब्बा नहीं मिलता।।
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चोराहों की मैं भूल-भुलैयाॅं में फॅंसा हूँ।
पहुॅंचा दे जो घर पर वही रस्ता नहीं मिलता।।
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ये सिर्फ़ तमन्ना है तमन्ना ही रहेगी।
तपते हुए सहराओं* में साया नहीं मिलता।।
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सूरज की हुकूमत में भी ये हाल हुआ है।
लोगों को यहाँ धूप का टुकड़ा नहीं मिलता।।
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क्यूँ गर्दिशे-दौराॅं* से परीशान है “अनवर”।
क्या तुमको इलाजे-ग़मे-दुनिया नहीं मिलता।।
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शब्दार्थ:-
शनासा*परिचित
तफ़्तीश*जाॅंच,अनुसंधान
मक़तल*वधस्थल
सहराओँ*रेगिस्तान गर्दिर्शे-दौराॅं*ज़माने का चक्र,मुसीबतें
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शकूर अनवर
9460851271






