Saturday, April 18, 2026
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श्रीमद्भगवतद् गीता-कालीचरण राजपूत

गीता श्लोक 6/32…

भक्त का भगवान के साथ व्यवहार …….

भगवान कहते हैं कि है अर्जुन जो भक्त अपने शरीर की उपमा से सब जगह मुझे समान देखता है और सुख तथा दुख को भी सामान देखता है, वह परम योगी माना गया है ।

मनुष्य चाहता है कि उसके किसी अंग में किसी तरह की पीड़ा ना हो वैसे ही सब प्राणियों में भगवान को देखने वाला भक्त सभी प्राणियों का समान रूप से आराम चाहता है । उसके समान कोई दुखी प्राणी आ जाए तो अपने शरीर के किसी अंग का दुख दूर करने की स्वाभाविक चेष्टा होती है । जैसे साधारण मनुष्य अपने शरीर की पूरी चिंता रखता है, वैसे ही भक्त भी दूसरों के शरीर स्वस्थ रखने की स्वाभाविक चेष्टा करता है ।

गीता श्लोक 6/31 ….

भगवान हर प्राणी में स्थित हैं.. भगवान कहते हैं कि मुझ में एक ही भाव से स्थित जो भक्त योगी संपूर्ण प्राणियों में स्थित मेरा भजन करता है, वह सब कुछ वरताव करता हुआ भी मुझ में ही बर्ताव कर रहा है अर्थात वह नित्य निरंतर मुझ में ही स्थित है ।

भगवान केवल प्राणियों में ही स्थित है, ऐसी बात नहीं । भगवान तो संसार के कण कण में परिपूर्ण रूप से स्थित हैं । सृष्टि के पहले और सृष्टि के समय और सृष्टि के बाद एक परमात्मा ही परमात्मा है। परंतु लोगों की दृष्टि में प्राणियों और पदार्थ की सत्ता अलग प्रतीत होने के कारण उनको समझने के लिए कहा जाता है कि सब में एक ही परमात्मा है, दूसरा कोई नहीं । भगवान कहते हैं कि जो मेरे को सब में देखा है, उसके लिए मैं अदृश्य नहीं होता । संपूर्ण प्राणियों में स्थित मेरे साथ उसकी अभिन्नता हो गई है अर्थात मेरे साथ उसका अत्यधिक प्रेम हो गया है ।

गीता श्लोक 6/35 ……

मन के निग्रह /नियंत्रण करने के उपाय….

भगवान कहते हैं कि हे महाबाहु अर्जुन! यह मन बड़ा चंचल है और उसका निग्रह अर्थात नियंत्रण करना भी बड़ा कठिन है। यह तुम्हारा कहना बिल्कुल ठीक है, परंतु हे कुंती पुत्र !अभ्यास और वैराग्य के द्वारा इसका निग्रह अर्थात नियंत्रण किया जा सकता है ।

अर्जुन ने पहले चंचलता के कारण मां का निग्रह करना अर्थात बस में करना बड़ा कठिन बताया इस बात पर भगवान कहते हैं कि तुम जो कहते हो वह एकदम ठीक बात है और निस्संदिग्ध बात है क्योंकि मन बड़ा चंचल है और इसका निग्रह करना अर्थात नियंत्रण में करना या बस में करना बड़ा कठिन है ।

अर्जुन की माता कुंती अर्थात श्री कृष्ण की हुआ बहुत विवेक वती अर्थात ज्ञानवती तथा भोगों से विरक्त रहने वाली थी । कुंती ने भगवान कृष्ण से सदा विपत्ति का वरदान मांगा था । ऐसा वरदान मांगने वाला इतिहास में बहुत कम मिलता है । भगवान इस श्लोक में कौंतेय संबोधन देकर अर्जुन को कुंती माता की याद दिलाते हैं कि जैसे तुम्हारी माता कुंती विरक्त अर्थात साध्वी हैं । ऐसे ही तुम भी संसार से विरक्त होकर अर्थात सन्यासी होकर परमात्मा में लग जाओ और मन को संसार से हटाकर परमात्मा में लगाओ ।

गीता श्लोक 6/34….

मन की चंचलता…..

अर्जुन कहते हैं कि है कृष्ण ! मन बड़ा ही चंचल,प्रमथनशील, दृढ़ अर्थात जिद्दी और बलवान है । उसको रोकना, मैं आकाश में स्थित वायु को रोकने की तरह अत्यंत कठिन मानता हूं ।

इस श्लोक में एक विशेषता नजर आ रही है कि यहां अर्जुन भगवान को उनका नाम लेकर संबोधित कर रहे हैं, कि “हे कृष्ण” आप ही कृपा करके मेरे मन को खींचकर अपने में लगा लें, तब तो यह मन लग सकता है । मेरे से तो इसका बस में होना कठिन है, क्योंकि यह मन बड़ा ही चंचल है । चंचलता के साथ-साथ यह प्रमाथी अर्थात जिद्दी ही है अर्थात यह साधक को अपनी स्थिति से विचलित कर देता है । यह मन बड़ा चंचल है, जिद्दी है और बलवान भी है ।

कृष्ण__ कृष्ण पद या शब्द का अर्थ होता है, कर्षण करने वाला या खींचने वाला या आकर्षित करने वाला । अर्जुन यहां यह कहना चाहते हैं कि हे प्रभु मेरे मन को आप अपनी ओर आकर्षित कर लीजिए अपनी ओर खींच लीजिए तभी यह मन स्थिर रह सकता है, अन्यथा नहीं ।

गीता श्लोक 6/33…..

मन की चंचलता से समता नहीं आती……

अर्जुन बोले हे मधुसूदन ! आपने समता पूर्वक जो यह योग कहा है मन की चंचलता के कारण, मैं इस योग की स्थिति नहीं देखता हूं । मन की चंचलता के कारण योग स्थिर नहीं होता ।

मनुष्य के कल्याण के लिए भगवान ने खास बात कही है कि सांसारिक पदार्थों की प्राप्ति या अप्राप्ति को लेकर चित्त में समता अर्थात समान भाव रहना चाहिए । इस समता से मनुष्य का कल्याण होता है । अर्जुन पापों से डरते थे, तो उनके लिए भगवान ने कहा की जय _पराजय, लाभ_ हानि,सुख और दुख को समान समझकर युद्ध करो, फिर तुम्हें पाप नहीं लगेगा । ऐसा गीता के श्लोक 2/38 में कहा गया है । सम बुद्धिपूर्वक सांसारिक काम करने से कर्मों से बंधन नहीं होता । एक स्थान पर भगवान ने कहा है कि जो कर्म फल का आश्रय न लेकर कर्तव्य कर्म करता है, वही संन्यासी और योगी है । इसी कर्म फल त्याग की सिद्धि को भगवान ने समता बताया है ।

गीता श्लोक 6/36 …..

मन बस में करने से योग प्राप्त होता है………

भगवान कहते हैं कि जिसका मन पूरा बस में नहीं है, उसके द्वारा योग प्राप्त होना कठिन है । परंतु उपाय पूर्वक यत्न करने वाले तथा वश में किए हुए मन वाले साधक को योग प्राप्त हो सकता है, ऐसा मेरा मत है ।

भगवान कहते हैं कि मेरे मत में जिसका मन वश में नहीं है, उसके द्वारा योग सिद्ध होना कठिन है । क्योंकि योग की सिद्ध में मन का वश में होना जितना वाधक है उतनी मन की चंचलता बाधक नहीं है । ध्यान योगी को अपना मन बस में करना चाहिए । मन बस में होने पर वह मन को जहां लगाना है, वहां लगा सकता है । जितनी देर लगाना चाहे, उतनी देर लगा सकता है । इसके अलावा जहां से हटाना चाहता वहां से हटा सकता है ।

गीता श्लोक 6/37 ….

अर्जुन का प्रश्न………..

अर्जुन कहते हैं कि हे कृष्ण ! जिसकी साधन में श्रद्धा है, परंतु जिसका साधन शिथिल है, वह अंत समय में अगर योग से विचलित मन अर्थात जिसका मन योग से विचलित हो जाए, तो वह योग सिद्ध को प्राप्त न करके किस गति को चला जाता है ? अर्थात उसकी क्या गति होती है?

जिसकी साधन में अर्थात जप, ध्यान, सत्संग,स्वाध्याय आदि में रुचि है, श्रद्धा है और उसको करता भी है, परंतु अंतहकरण और वहिकरण बस में न होने से, साधन में शिथिलता है अर्थात तत्परता नहीं है । ऐसा साधक अंत समय में संसार में राग रहने से, विषयों में राग रहने से,अपने साधन से विचलित हो जाए अर्थात अपने स्वाध्याय पर स्थिर न रहे तो फिर उसकी क्या गति होगी?

गीता श्लोक 6/38 ….

क्या साधक कभी छिन्न _भिन्न हो जाता है?

अर्जुन कहते हैं कि हे महाबाहो संसार के आश्रय से रहित और परमात्मा प्राप्ति के मार्ग में मोहित अर्थात विचलित, इस तरह दोनों और से भ्रष्ट हुआ साधक क्या छिन्न_ भिन्न बादल की तरह नष्ट तो नहीं हो जाता?

 

वह साधक सांसारिक प्रतिष्ठा से तो रहित हुआ है अर्थात उसने संसार की सुख आराम आदर सत्कार यश प्रतिष्ठा आदि की कामना छोड़ दी है । इनको प्राप्त करने का उसका उद्देश्य है ही नहीं। इस तरह संसार का आश्रय छोड़कर वह परमात्मा प्राप्ति के मार्ग पर चला, पर जीवित अवस्था में साधन से विचलित हो गया अर्थात् परमात्मा की स्मृति नहीं रही । ऐसा वह दोनों ओर से भ्रष्ट हुआ अर्थात सांसारिक और परमार्थिक दोनों उन्नतियों से रहित हुआ सड़क छिन्न-भिन्न बादल की तरह नष्ट तो नहीं हो जाता ? यदि साधक ने संसार के आश्रय को छोड़ दिया,फिर वह साधक नष्ट तो नहीं हो जाता? उसका पतन तो नहीं हो जाता? जिस सड़क ने संसार छोड़ा है, वह संसार और जिसकी प्राप्ति के लिए चला, वह परमात्मा तथा साधक स्वयं चेतन है, उसने संसार छोड़ दिया और ईश्वर प्राप्त नहीं हुआ, तब साधक का क्या होगा?

गीता श्लोक 6/40 ….

कल्याणकारी कार्य से दुर्गति नहीं होती….

भगवान भोले है प्रथम नंदन अर्जुन उसका ना तो इस श्लोक में और न परलोक में ही विनाश होता है क्योंकि है अर्जुन कल्याणकारी काम करने वाला कोई भी मनुष्य दुर्गति को नहीं प्राप्त होता ।

जिसको अंत काल में परमात्मा का स्मरण नहीं होता, उसका कहीं पतन तो नहीं हो जाता? इस बात को लेकर अर्जुन के हृदय में बहुत व्याकुलता है और यह व्याकुलता भगवान से छुपी नहीं है । अतः भगवान अर्जुन के इस प्रश्न का उत्तर देने से पहले ही अर्जुन के प्रश्न ” क्या गति होगी ” के द्वारा हृदय की व्याकुलता दूर करते हैं ।

भगवान कहते हैं कि हे प्रथा नंदन ! सच्चे हृदय से साधन करने वाले मनुष्य का न तो इस जन्म में पतन होता है और न मरने के बाद ही पतन होता है। तात्पर्य यह है कि योग में उसकी स्थिति इतनी बन चुकी है कि उससे नीचे वह नहीं गिरता । उसकी साधन सामग्री नष्ट नहीं होती । उसका परमार्थिक उद्देश्य नहीं बदलता । इस श्लोक में भगवान ने अर्जुन को पार्थ कहा है । जो आत्मीय संबंध का द्योतक है । अर्जुन के सब नाम में श्री कृष्ण को “पार्थ” नाम अत्यंत प्रिय था । यहां पर आया हुआ पद तात भी अत्यंत प्यार का द्योतक है ।

गीता श्लोक 6/39….

संसार का छेदन आप ही कर सकते हो केशव ….

अर्जुन कहते हैं कि हे कृष्ण ! मेरे इस संदेह का सर्वथा छेदन करने के लिए आप ही योग्य हैं । क्योंकि इस संसार का छेदन करने वाला आपके सिवाय दूसरा कोई है ही नहीं और हो ही नहीं सकता ।

परमात्मा प्राप्ति का उद्देश्य होने से साधक पाप कर्मों से तो सर्वथा रहित हो गया, इसलिए वह नरक में तो जा ही नहीं सकता । मनुष्य योनि में आने का उसका उद्देश्य नहीं । इसलिए वह उसमें भी नहीं आ सकता और परमात्मा प्राप्ति के साधन से भी विचलित हो गया । ऐसा साधक क्या छिन्न-भिन्न बादल की तरह नष्ट तो नहीं हो जाता ? प्रभु ऐसा मेरा संशय है । अर्जुन भगवान से यही कहना चाहते हैं कि वह योगी जो अभ्यास करके बना है अर्थात युंजान योगी है, वहीं तक जान सकता है, जहां तक उसके जाने की हद है । अर्जुन कहते हैं कि भगवान आप तो युक्त योगी हैं और आप तो बिना अभ्यास के बिना परिश्रम के सब कुछ जानने वाले हैं । आपके समान अन्य कोई जानकार नहीं है । आप तो साक्षात भगवान हैं और संपूर्ण प्राणियों की गति को जानने वाले हैं अतः इस योग भ्रष्ट के गति विषयक प्रश्न का उत्तर केवल आप ही दे सकते हैं । आप ही मेरे संदेह को दूर कर सकते हैं ।

गीता श्लोक 6/41….

योग भ्रष्ट पुरुष की दुर्गति तो नहीं हो जाती…….

ज्ञान योग, भक्ति योग, ध्यान योग और कर्म योग आदि का साधन करने वाले जिस पुरुष का मन विक्षेप आदि विषयों से या रोग आदि के कारण अंत काल में लक्ष्य से विचलित हो जाता है, उसे योग भ्रष्ट कहा गया है ।

मृत्यु लोक से ऊपर ब्रह्म लोकतक जितने भी लोक हैं, सभी पुण्यवानों के लोक हैं, उनमें से योग भ्रष्ट पुरुष, योग रूपी महान पुण्य से प्रभाव से ऐसे लोकों में नहीं जाते, जहां वे भोगों में फंसकर दुर्गति को प्राप्त हो जाएं और न ऐसे अपवित्र धनवानों के घरों में ही जन्म लेते हैं, जो उनकी दुर्गति में हेतु बन सकें । वे पुण्यवाणों के घरों में जन्म लेते हैं । ताकि उनका जीवन वहीं से शुरू हो, जहां उन्होंने मृत्यु के समय छोड़ा था ।

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