Saturday, April 18, 2026
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श्री कृष्ण जन्माष्टमी विशेष*भगवान् कृष्ण के जन्म की काल गणना*

 

 

 

*भगवान् कृष्ण के जन्म की काल गणना*

 

अजन्मा भगवान् श्रीकृष्ण जन्म यानी अवतार ग्रहण किए हुए ५२५१ वर्ष पूर्ण हो चुके हैं और ५२५२ वाँ वर्ष प्रारम्भ हुआ है। प्रश्न उठता है कि यह कालगणना कैसे की गई?

लीलापुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण का जीवन-चरित्र अनेक प्राचीन ग्रन्थों में भरा पड़ा है। भागवतपुराण, विष्णुपुराण, ब्रह्मपुराण, ब्रह्मवैवर्तपुराण, हरिवंशपुराण, देवीभागवतपुराण, आदिपुराण, गर्गसंहिता, महाभारत और जैमिनीयमहाभारत, आदि में भगवान् श्रीकृष्ण का विस्तृत जीवन-चरित्र प्राप्त होता है। इन ग्रन्थों ने भगवान् श्रीकृष्ण के जीवन की प्रमुख घटनाओं का समय कहीं तिथि, कहीं नक्षत्र तो कहीं ऋतु में दिया है। इनके सहारे श्रीकृष्ण जन्म से लेकर उनके स्वर्गारोहण तक की समयावली प्रस्तुत हो जाती है। इसके अतिरिक्त इन ग्रन्थों में कई मुहूर्तों के नाम भी आए हैंI

 

🌺 विष्णुपुराण (५.१.७८) एवं ब्रह्मपुराण (१८१.४४) के अनुसार वर्षा ऋतु में भाद्रपद कृष्ण अष्टमी को रात्रि में भगवान् श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था।

प्रावृट्काले च नभसि कृष्णाष्टम्यामहं निशि।

उत्पत्यामि नवम्यां तु प्रसूतिं त्वमवाप्स्यसि।।

 

🌺 देवीपुराण (५०.६५) के अनुसार भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि, रोहिणी नक्षत्र, वृष लग्न में अर्द्धरात्रि की वेला में भगवती ने देवकी के गर्भ से परम पुरुष के रूप में जन्म लिया था।

ततः समभवद्देवी देवक्याः परमः पुमान्।

अष्टम्यामधर्द्धरात्रे तु रोहिण्यामसिते वृषे।।

 

🌺 भविष्यपुराण (उत्तरपर्व, ५५.१४) के अनुसार जिस समय सिंह राशि पर सूर्य और वृष राशि पर चन्द्रमा था, उस भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्मी तिथि को अर्द्धरात्रि में रोहिणी नक्षत्र में श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था।

सिंहराशिगते सूर्ये गगने जलदाकुले।

मासि भाद्रपदेष्टम्यां कृष्णपक्षेऽर्धरात्रके।

वृषराशिस्थिते चन्द्रे नक्षत्रे रोहिणीयुते।।

 

🌺 हरिवंशपुराण (२.४.१७) के अनुसार भगवान् श्रीकृष्ण के जन्म के समय अभिजित् नक्षत्र, जयन्ती नामक रात्रि और विजय नामक मुहूर्त था।

अभिजिन्नाम नक्षत्रं जायन्तीनाम शर्बरी।

मुहूर्तो विजयो नाम यत्र जातो जनार्दनः।।

 

🌺 भविष्यपुराण (प्रतिसर्गपर्व, १.३.८२) के अनुसार द्वापर के चतुर्थ चरण के अन्त में श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था।

चतुर्थे चरणान्ते च हरेर्जन्म स्मृतं बुधैः।

हस्तिनापुरमध्यस्याभिमन्योस्तनयस्ततः।।

 

🌺 आदिपुराण (१५.१५-१६) के अनुसार द्वापरयुग के अन्त में और कलियुग के प्रारम्भ में भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्मी तिथि को अर्द्धरात्रि में, रोहिणी नक्षत्र में जब लग्न का स्वामी उच्च स्थान में स्थित था, श्रीकृष्ण का जन्म हुआ।

द्वापरान्ते कलोरादौ व्यतीते तु शरच्छते।

प्रौष्मद्यामथाष्टम्यां कृष्णायामर्द्धरात्रकेII

रोहिणीस्थे चन्द्रमासि स्वोच्चगेऽभूज्जनिर्मम।।

 

🌺 महाभारत (शान्तिपर्व, ३३९.८-९०) के अनुसार द्वापर और कलि की सन्धि के समय के आसपास कंस का वध करने के लिए मथुरा में विष्णु का अवतार हुआ था।

द्वापरस्य कलेश्चैव संधै पार्यवसानिके।

प्रादुर्भाव कंसहेतेार्मथुरायां भविष्यति।।

 

🌺 ब्रह्मवैवर्तमहापुराण और भागवतमहापुराण के अनुसार भगवान् श्रीकृष्ण इस धरातल पर १२५ वर्षों से अधिक समय तक विराजमान रहे थे।

यत् पंचविंशत्यधिकं वर्षाणां शतकं गतम्।

व्यक्तवेमां स्वपदं यासि रुदन्तीं विरहातुरम्।।

(ब्रह्मवैवर्तमहापुराण, ४.१०९.१८)

 

यदुवंशेऽवतीर्णस्य भवतः पुरुषोत्तम।

शरच्छतं व्यतीयाय पंचविंशाधिकं प्रभो।।

(भागवतमहापुराण, ११.१६.२५)

 

🌺विष्णु, वायु, ब्रह्म, ब्रह्माण्ड और भागवतपुराण के अनुसार जिस दिन भगवान् श्रीकृष्ण परमधाम को पधारे थे, उसी दिन, उसी समय पृथिवी पर कलियुग प्रारम्भ हो गया था।

यदैव भगवान्विष्णोरंशो यातोदिवं द्विज।

वसुदेववुफलोद्भूतस्दैवात्रागतः कलि।।

(विष्णुपुराण, ४.२४.१०८)

 

यस्मिन कृष्णो दिवं यातस्तस्मिन्नेव तदाहनि।

प्रतिपन्नं कलियुगं तस्य संख्यां निबोध मे।।

(विष्णुपुराण, ४.२४.११३; ब्रह्माण्डपुराण, २.७४.२४१; वायुपुराण, १९.४२८.४२९)

 

यस्मिन्दिने हरिर्यातो दिनं सन्त्याज्य मेदिनीम्।

यस्मिन्नेवावतीर्णोऽयं कालक्रायो बली कलिः।।

(विष्णुपुराण, ५.३८.८; ब्रह्मपुराण, २१२.८)

 

यदा मुकुन्दो भगवानिमां महीं जहौ स्वतन्वा श्रवणीयसत्कथः।

तदाहरेवाप्रति बुद्धचेतसामधर्महेतुः कलिरन्ववर्ततः।।

(भागवतपुराण, १.१६.३६)

 

हिंदू-कालगणनानुसार द्वापरयुग २,४०० दिव्य वर्षों का एवं ८,६४,००० मानव-वर्षों का होता है। वर्तमान समय में ब्रह्मा के द्वितीय परार्ध के ७वें वैवस्वत मन्वन्तर के २८वें चतुर्युग के कलियुग के प्रथम चरण का ५१२३वाँ वर्ष चल रहा है। भगवान् श्रीकृष्ण का जन्म वैवस्वत मन्वन्तर के २८वें चतुर्युग के द्वापर के अन्त होने के लगभग १२६ (१२५ वर्षों से कुछ अधिक) वर्ष पूर्व हुआ था जो द्वापरयुग का अन्तिम चरण है। भविष्यमहापुराण (उत्तरपर्व, १०१.६) के अनुसार कलियुग का प्रारम्भ माघ शुक्ल पूर्णिमा को हुआ था।

 

माघे पंचदशी राजन्कलिकालदिरुच्यते।

 

आर्यभट (४७६-५५०) के अनुसार २८वें कलियुग का प्रारम्भ ३१०२ ई.पू. में हुआ था। उन्होंने स्पष्ट लिखा है तीन युग (सत्ययुग, त्रेतायुग और द्वापरयुग) और कलियुग के ६०x६० (=३६००) वर्ष बीत चुके हैं और इस समय उन्हें जन्मे २३ वर्ष हुए हैं।

 

षष्टब्दानां षष्ठियादाव्यतीतास्त्रयश्य युगपादाः।

त्रयधिकविंशति रब्दास्तदेह मम जन्मनोऽतीताः।।

(आर्यभटीयम्, कालक्रियापाद, १०)

 

उपर्युक्त श्लोक का तात्पर्य यह है कि आर्यभट्ट ने २३ वर्ष की आयु में उपर्युक्त श्लोक की रचना की है। आर्यभट्ट का जन्म मेष-संक्रांति, ४७६ ई. में हुआ था। इस प्रकार उपर्युक्त रचना ४७६+२३=४९९ ई. की है। तब कलियुग का ३६०१ वाँ वर्ष चल रहा था। इस प्रकार कलियुग का प्रारम्भ ३६०१-४९९=३१०२ ई.पू. में हुआ था।

 

भास्कराचार्य द्वितीय (१११४-११८५) के अनुसार छः मन्वन्तर और मन्वन्तर वें मन्वन्तर के २७ चतुर्युग बीत चुके हैं, जो २८वाँ चतुर्युग चल रहा है, उसके भी तीन युग बीत चुके हैं और चौथा कलियुग चल रहा है, उसके भी शालिवाहन-संवत् तक ३,१७९3 वर्ष गुजर चुके हैं।

 

याताः षण्मन्वो युगानि भमितान्यन्यद्युगांधि त्रयं।

नन्दाद्रीन्दुगुणास्तथा शकनृपस्यान्ते कलेर्वत्सराः।।

 

(सिद्धान्तशिरोमणि, मध्यमाधिकार, कालमानाध्याय २८)

 

शालिवाहन संवत् का प्रारम्भ ७८ ई. में उज्जयिनी-नरेश शालिवाहन (शासनकाल : ४६-१०६ ई.) ने किया था और वर्तमान में शालिवाहन संवत् (२०२४-७८ = १९४६) चल रहा है। अतः (१९४६+३१७९) ५१२५ वर्ष कलियुग के बीत चुके हैं (और ५१२६वाँ वर्ष चल रहा है)। इस दृष्टि से भी कलियुग का प्रारम्भ (५१२६-२०२४) = ३१०२ ई.पू. में सिद्ध होता है।

 

इस प्रकार (२८वें) कलियुग का प्रारम्भ बहुधान्य संवत्सर में माघ शुक्ल पूर्णिमा, तदनुसार १८ फरवरी, शुक्रवार, ३१०२ ई.पू. को दोपहर ०२ बजकर २७ मिनट और ३० सैकंड पर हुआ था, जब सात नक्षत्र एक ही राशि में एकत्र हो गए थे— यह तथ्य पुराणसम्मत, इतिहाससम्मत, ज्योतिर्विज्ञानसम्मत है।

 

भारतवर्ष में प्रकाशित होनेवाले सारे पञ्चाङ्गों में ‘कलि संवत्’ लिखा होता है, जिसे गणना करके देखा जा सकता है। ग्रामण (दक्षिणी अर्काट) से प्राप्त एक चोल-अभिलेख पर कलि-वर्ष ४०४४ और कलि-दिन १४,७७,०३७ अंकित है, जिसकी संगति १४ जनवरी, ९४३ ई. के साथ स्थापित होती है। इससे १२५ वर्ष पीछे जाने पर ३२२७ ई.पू. प्राप्त होता है, लेकिन चूँकि भगवान् श्रीकृष्ण १२५ वर्षों से अधिक समय तक जीवित रहे थे और उनका जन्म भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को हुआ था जो पांच मास, चार दिन और पीछे पड़ता है, इसलिए अंग्रेज़ी महीने के हिसाब से यह समय २१ जुलाई निकलता है।

 

इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण का जन्मदिवस श्रीमुख संवत्सर, भाद्रपद कृष्ण अष्टमी, रोहिणी नक्षत्र, तदनुसार २१ जुलाई, बुधवार और वर्ष ३२२८ ई.पू. निश्चित होता है। भगवान् श्रीकृष्ण के जन्म से ही ‘श्रीकृष्ण संवत्’ प्रचलित है जिसका आजकल ३२२८+२०२४ = ५२५२वाँ वर्ष चल रहा है। अर्थात भगवान् श्रीकृष्ण को अवतार ग्रहण किए हुए आज जन्माष्टमी को ५२५१ वर्ष पूर्ण हो चुके हैं और ५२५२वाँ वर्ष प्रारम्भ हुआ है।

 

२८वें कलियुग के प्रारम्भ होने की तिथि माघ शुक्ल पूर्णिमा, तदनुसार १८ फरवरी, शुक्रवार और वर्ष ३१०२ ई.पू. (युधिष्ठिर संवत् ३७) ही भगवान् श्रीकृष्ण के स्वर्गारोहण की भी तिथि है।

 

साभार…

संकलन…

डाँ० शिव कुमार

दरभंगा बिहार

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