***********ग़ज़ल***********
शकूर अनवर
कोई मुझको बतलाये मेरी इक पहेली है।
पत्थरों की बस्ती में काॅंच की हवेली है।।
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क्यूँ मेरे मुक़द्दर में इस क़दर ॲंधेरे हैं।
क्या मेरी ये क़िस्मत भी रात की सहेली है।।
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फूल उसके उपवन के ख़ुशबुओं से ख़ाली हैं।
बेल उसके ऑंगन की नाम की चमेली है।।
ज़िंदगी की राहों में ख़ार* हैं बबूलों के।
पाॅंव में फफोले हैं ख़ूॅं-चकाॅं* हथेली है।।
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रात के ॲंधेरे में नोचकर न खा जायें।
हर तरफ़ दरिन्दे* हैं ज़िंदगी अकेली है।।
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जिसके दर-दरीचों* पर वहशतों* का मस्कन* हो।
बे-चराग़* ऑंगन हो वो मेरी हवेली है।।
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इस बरस भी हम “अनवर” कब रहे ठिकाने से।
इस बरस की बारिश भी हमने सर पे झेली है।।
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शब्दार्थ:-
ख़ार*काॅंटे
ख़ू चका*ख़ून से सनी हुई
दरिंदे*जंगली जानवर
दर दारीचों*दरवाज़े और खिड़की
वहशतों*डर भय
मस्कन* निवास
बे-चराग़*रोशनी विहीन
शकूर अनवर
9460851271
************* ग़ज़ल***********
शकूर अनवर
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क्या अजब आन-बान थी उसकी।
कैसा रुतबा” था, शान थी उसकी।।
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छोटी बस्ती में था मकाॅं अपना।
शहरे-दिल में दुकान थी उसकी।।
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हर घड़ी इम्तेहान से गुज़रा।
कितनी ऊॅंची उड़ान थी उसकी।।
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उसकी तस्वीर बात करती थी।
ख़ामुशी भी ज़ुबान थी उसकी।।
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या इशारों का वार था दिल पर।
या नज़र मेहरबान थी उसकी।।
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उसकी जादूगरी का अंत न था।
एक तोते में जान थी उसकी।।
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तीर साधे हुए था वो “अनवर”।
मेरी जानिब* कमान थी उसकी।।
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शब्दार्थ:-
रुतबा*शान वैभव
जानिब*तरफ़
शकूर अनवर
9460851271






