Saturday, April 18, 2026
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ग़ज़ल-शकूर अनवर

***********ग़ज़ल***********

शकूर अनवर

कोई मुझको बतलाये मेरी इक पहेली है।

पत्थरों की बस्ती में काॅंच की हवेली है।।

*

क्यूँ मेरे मुक़द्दर में इस क़दर ॲंधेरे हैं।

क्या मेरी ये क़िस्मत भी रात की सहेली है।।

*

फूल उसके उपवन के ख़ुशबुओं से ख़ाली हैं।

बेल उसके ऑंगन की नाम की चमेली है।।

 

ज़िंदगी की राहों में ख़ार* हैं बबूलों के।

पाॅंव में फफोले हैं ख़ूॅं-चकाॅं* हथेली है।।

*

रात के ॲंधेरे में नोचकर न खा जायें।

हर तरफ़ दरिन्दे* हैं ज़िंदगी अकेली है।।

*

जिसके दर-दरीचों* पर वहशतों* का मस्कन* हो।

बे-चराग़* ऑंगन हो वो मेरी हवेली है।।

*

इस बरस भी हम “अनवर” कब रहे ठिकाने से।

इस बरस की बारिश भी हमने सर पे झेली है।।

*

शब्दार्थ:-

ख़ार*काॅंटे

ख़ू चका*ख़ून से सनी हुई

दरिंदे*जंगली जानवर

दर दारीचों*दरवाज़े और खिड़की

वहशतों*डर भय

मस्कन* निवास

बे-चराग़*रोशनी विहीन

शकूर अनवर

9460851271

************* ग़ज़ल***********

शकूर अनवर

*

क्या अजब आन-बान थी उसकी।

कैसा रुतबा” था, शान थी उसकी।।

*

छोटी बस्ती में था मकाॅं अपना।

शहरे-दिल में दुकान थी उसकी।।

*

हर घड़ी इम्तेहान से गुज़रा।

कितनी ऊॅंची उड़ान थी उसकी।।

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उसकी तस्वीर बात करती थी।

ख़ामुशी भी ज़ुबान थी उसकी।।

*

या इशारों का वार था दिल पर।

या नज़र मेहरबान थी उसकी।।

*

उसकी जादूगरी का अंत न था।

एक तोते में जान थी उसकी।।

*

तीर साधे हुए था वो “अनवर”।

मेरी जानिब* कमान थी उसकी।।

*

शब्दार्थ:-

रुतबा*शान वैभव

जानिब*तरफ़

शकूर अनवर

9460851271

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