मां को समर्पित रचना –
संस्मरण – हंसली का बलिदान
रघुराज सिंह कर्मयोगी
“पापा,मुझे पॉलिटेक्निक में प्रवेश के लिए प्राचार्य की स्वीकृति मिल गयी है। तीन दिन में फीस भरनी है।” चेहरे के भाव प्रसन्नता की कहानी कह रहे थे। यह 1972 की बात है। पिताजी खेती किसानी करते थे।
दादा जी द्वारा छोड़ी गई पुश्तैनी जमीन का मात्र
5 बीघा जमीन का टुकड़ा पिताजी के हिस्से में आया था।इसलिए घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। इसके अतिरिक्त मेरे तीन भाई और भी थे। जो सरकारी स्कूल में पढ़ते थे। उनका खर्चा था सो अलग।
“फीस के पैसे तो नहीं है”- पिता जी ने भारी मन से कहा। लगा जैसे चांदनी की रोशनी ही मध्दिम पड़ गई हो। दिमागी पारा ऊपर चढ़ गया। इससे पहले कि वह कुछ कह पाते, मैं गुस्से में तमतमा कर बोला-
“आपके पास फीस के पैसे नहीं थे तो मुझे पॉलिटेक्निक में दाखिले के लिए भेजा ही क्यों था? इससे तो अच्छा मैं अनपढ़ रह जाता”। पिता को मुझसे ऐसी प्रतिक्रिया की आशा नहीं थी। उन्हें बात चुभ गई। निर्णय के तराजू पर तोलने के थोड़ी देर बाद उनको लगा कि इस संबंध में कुछ न किया गया तो बेटे के सपने बिखर जाएंगे। उन्होंने तुरंत मां को आवाज दी।
“तुम्हारे गले में सोने की जो हसली है, वह निकाल कर बेटे को दे दो”।
“वह सोने की हंसली का क्या करेगा? आप मेरे धैर्य की इतनी कड़ी परीक्षा ना लें।”
“मेरे पास इतनी बचत नहीं है कि मैं कॉलेज की फीस भर सकूं। हंसली बेच कर यह पॉलिटेक्निक की फीस भर देगा। घर के जेवर ऐसे ही समय काम आते हैं-” पिताजी ने कहा तो चेहरे पर बिना कोई शिकन के मां ने गले से हंसली उतारी और मेरे हवाले कर दी।
मां के साथ मैं भारी मन से सुनार के पास जाकर हंसली बेच आया। फीस के पैसे मैंने अपने पास रखे। बाकी पिताजी को लौटा दिए। पिताजी के चेहरे पर जो संतोष के भाव मैंने देखे तो मन में उनके प्रति श्रद्धा का भाव उमड़ आया। मैं अगले दिन धन राशि ले कर डीएआई टेक्निकल कॉलेज दयालबाग पहुंचा और फीस भर दी। इसके बाद मैंने प्रतिज्ञा ली कि पिताजी का संबल बनूंगा। मैंने लगन से काफी अच्छी पढ़ाई की और वार्षिक परीक्षा प्रथम श्रेणी से पास कर रेलवे में इंजीनियर बन गया ।
मगर सोचता हूं कि मां ने हंसली का बलिदान मेरी फीस के लिए न किया होता तो शायद में रेलवे में ऑफिसर ना होता। उनके त्याग को याद कर मेरा सिर आज भी श्रद्धा से झुक जाता है। पिता में धरती सा धैर्य और आकाश की ऊंचाइयों को छूने के बुलंद इरादों की प्रेरणा मुझे सदैव याद रहती है।मेरे साथ मां ने त्याग की जो परिभाषा गढ़ी, वह अविस्मरणीय है। उसे मैंने अपने बच्चों के साथ भी अपनाया।






