एक मिनट भी एक्स्ट्रा नहीं -लेखक: परमानन्द गोयल
समय की अनवरत धारा में हम सभी बहते चले जाते हैं, अक्सर यह भूलकर कि हर पल कितना अनमोल है। जीवन की यह दौड़ इतनी तेज है कि हम वर्तमान को पकड़ने की बजाय भविष्य की कल्पनाओं में खोए रहते हैं। यह बात तब समझ आती है, जब हम उसका उपयोग करने लायक़ नहीं रहते और फिर पछतावे के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता। यह ग्लानि पूरे जीवन सालती रहती है, कचोटती रहती है।
सकारात्मकता की दृष्टि से देखें तो, किसी के अच्छे कार्य की तारीफ करना, चाहे वह परिवार का सदस्य हो, मित्र हो या बाहरी व्यक्ति, यदि समय पर न किया जाए तो उसका अर्थ ही शेष नहीं रहता। हमने कई बार देखा है कि कई रस्मों की अदायगी में एक मिनट भी समय नहीं मिलता। ऐसी घटनाएँ हमें जीवन की कटु सच्चाई से रूबरू कराती हैं कि अंत समय में, जब हमें सबसे अधिक आवश्यकता होती है, तब हमें ‘एक मिनट भी एक्स्ट्रा नहीं’ मिलता।
हम अक्सर अपने प्रियजनों, विशेषकर माता-पिता को समय देने में कोताही बरतते हैं। व्यस्तता का बहाना बनाकर हम सोचते हैं कि ‘कल बात कर लेंगे’, ‘अगले हफ्ते मिल लेंगे’। लेकिन जब वे इस दुनिया से चले जाते हैं, तो हमारे पास केवल उनकी तस्वीरें और ढेर सारा पछतावा रह जाता है – काश थोड़ा और समय बिताया होता। जीवित रहते हुए उनकी सेवा करना और सम्मान देना कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। उनके साथ बिताया गया हर पल एक अनमोल उपहार है, और इसके लिए ‘एक मिनट भी एक्स्ट्रा नहीं’ मिलेगा।
परीक्षाओं और करियर में भी ‘एक मिनट भी एक्स्ट्रा नहीं’ का सिद्धांत उतना ही प्रासंगिक है। प्रतियोगी परीक्षाओं में एक-एक अंक और एक-एक मिनट का महत्व होता है। समय का सही प्रबंधन न करने से हम कई बार सफलता से चूक जाते हैं। एक मिनट की देरी या एक प्रश्न पर अधिक समय खर्च करना हमारे सपनों को तोड़ सकता है। जीवन के सपने भी ऐसे ही होते हैं। हम उन्हें ‘कल’ पर टालते रहते हैं, लेकिन समय किसी का इंतजार नहीं करता। आज का काम कल पर टालना, अपने सपनों को टालना है।
इसलिए, आइए हम आज से ही हर पल को पूरी जागरूकता और कृतज्ञता के साथ जीना सीखें। माता-पिता की सेवा हो, परीक्षा की तैयारी हो, या अपने जीवन के सपनों को पूरा करना हो – हर कार्य को प्राथमिकता दें। समय का सम्मान करें, क्योंकि यह हमें ‘एक मिनट भी एक्स्ट्रा नहीं’ देगा। जीवन एक अनमोल उपहार है, और इसका हर पल एक उत्सव होना चाहिए।






