Sunday, May 10, 2026
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श्रीमद्भगवद्गीता- कवि कालीचरण राजपूत

गीता श्लोक 2/64 और 2/65

स्थित प्रज्ञ जैसे चलता (व्यवहार करता) है?

हे अर्जुन! परंतु वशीभूत अंतः करण वाला कर्मयोगी साधक राग – द्वेष से रहित, अपने वश में की हुई इंद्रियों के द्वारा, विषयों का सेवन करता हुआ, अंतःकरण की निर्मलता को प्राप्त हो जाता है और उसके संपूर्ण दुखों का नाश हो जाता है तथा ऐसे शुद्ध चित्त वाले साधक की बुद्धि, निसंदेह बहुत जल्दी परमात्मा में स्थिर हो जाती है।

इससे पहले वाले श्लोक में भगवान ने कहा था कि आसक्त रहते हुए, विषयों का चिंतन करने मात्र से, पतन हो जाता है। यहां बुद्धि का नाश बताया है। भगवान कहते हैं कि आसक्त न रहने पर, विषयों का सेवन करने से, उत्थान हो जाता है । यहां बुद्धि का, परमात्मा में स्थित होना बताया गया है।

अतः पहले किए हुए विषय से यहां के विषय का अंतर बताने के लिए “तु ” (लेकिन)शब्द का प्रयोग किया गया है । साधक का अंतहकरण अपने वश में रहना चाहिए अंतः करण (कारण जिसकी वजह से घटना घटत होती हैं) को वशीभूत किए बिना कर्मयोग की सिद्धि नहीं होती और पतन की संभावना बढ़ जाती है। अंतहकरण को वश में रखना प्रत्येक साधक के लिए आवश्यक है। कर्म योगी के लिए तो इसकी विशेष आवश्यकता है।

गीता श्लोक 2/64 और 2/65

स्थित प्रज्ञ जैसे चलता (व्यवहार करता) है?

 

हे अर्जुन! परंतु वशीभूत अंतः करण वाला कर्मयोगी साधक राग – द्वेष से रहित, अपने वश में की हुई इंद्रियों के द्वारा, विषयों का सेवन करता हुआ, अंतःकरण की निर्मलता को प्राप्त हो जाता है और उसके संपूर्ण दुखों का नाश हो जाता है तथा ऐसे शुद्ध चित्त वाले साधक की बुद्धि, निसंदेह बहुत जल्दी परमात्मा में स्थिर हो जाती है।

इससे पहले वाले श्लोक में भगवान ने कहा था कि आसक्त रहते हुए, विषयों का चिंतन करने मात्र से, पतन हो जाता है। यहां बुद्धि का नाश बताया है। भगवान कहते हैं कि आसक्त न रहने पर, विषयों का सेवन करने से, उत्थान हो जाता है । यहां बुद्धि का, परमात्मा में स्थित होना बताया गया है।

अतः पहले किए हुए विषय से यहां के विषय का अंतर बताने के लिए “तु ” (लेकिन)शब्द का प्रयोग किया गया है । साधक का अंतहकरण अपने वश में रहना चाहिए अंतः करण (कारण जिसकी वजह से घटना घटत होती हैं) को वशीभूत किए बिना कर्मयोग की सिद्धि नहीं होती और पतन की संभावना बढ़ जाती है। अंतहकरण को वश में रखना प्रत्येक साधक के लिए आवश्यक है। कर्म योगी के लिए तो इसकी विशेष आवश्यकता है।

गीता श्लोक 2/66

जिसकी इन्द्रियाँ नियंत्रण में नहीं हैं…..

 

भगवान कहते हैं कि हे अर्जुन! जिसके मन में इंद्रियां संयमित नहीं है, ऐसे मनुष्य की व्यवसायातमिका बुद्धि नहीं होती और व्यवसायात्मिका बुद्धि न होने से उस अयुक्त/असंयमी मनुष्य में निष्काम भाव अथवा कर्तव्य परायणता का भाव नहीं होता। निष्काम भाव न होने से उसको शांति नहीं मिलती। फिर शांति रहित मनुष्यों को सुख कैसे मिल सकता है।

यहां कर्म योग का विषय है। कर्म योग में मन और इंद्रियों का संयम करना मुख्य होता है। विवेक पूर्वक संयम किए बिना कामना अर्थात इच्छा नष्ट नहीं होती। कामना के नष्ट हुए बिना बुद्धि की स्थिरता नहीं होती। अतः कर्म योगी साधक को पहले मन और इंद्रियों पर संयम अर्थात नियंत्रण रखना चाहिए।

जिसका मन और इंद्रियाँ संयमित अर्थात नियंत्रित नहीं है, ऐसे अयुक्त अर्थात असंयमी पुरुष की, मेरे को केवल परमात्मा प्राप्त ही करनी है, ऐसी निश्चय वाली बुद्धि नहीं होती। मन और इंद्रियाँ संयमित न होने से वह, कभी धन या सामान चाहता है, कभी सुख और आराम चाहता है, कभी धन चाहता है और कभी भोग चाहता है। इस प्रकार उसके भीतर अनेक तरह की कामना जन्म लेती रहती हैं, इसलिए उसकी बुद्धि एक निश्चय वाली नहीं होती है।

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