Tuesday, April 21, 2026
IMG-20260122-WA0067
previous arrow
next arrow

Top 5 This Week

Related Posts

ग़ज़ल- शकूर अनवर

********** ग़ज़ल**********

शकूर अनवर

अपना ही बोझ काॅंधों पे ढोते हुए से हम।

जीवन की बैलगाड़ी में जोते हुए से हम।।

*

अपने दुखों के गहरे समन्दर के दरमियाँ।

ख़ुशियों की अपनी नाव डुबोते हुए से हम।।

*

साज़िश* कहें इसे या मुक़द्दर को दोष दें।

बेदार* है ज़माना तो सोते हुए से हम।।

*

मस्जिद की सीढियाँ हों कि मन्दिर का द्वार हो।

सदभावना के फूल पिरोते हुए से हम।।

*

ज़ुल्मो-सितम* की फ़स्ल गले काटती हुई।

अम्नो-अमाॅं* के बीज ही बोते हुए से हम।।

*

मस्ती में चूर तुम कहीं बज़्मे-निशात* में।

दुनिया के ग़म में पलकें भिगोते हुए से हम।।

*

अपना ही क़िस्मतों का सितारा नहीं बना।

“अनवर” जमीं पे ख़ाक ही होते हुए से हम।।

*

शब्दार्थ:-

साज़िश*षडयंत्र

बेदार*जागृत जगा हुआ

ज़ुल्मो-सितम*जुल्म अत्याचार

अम्नो-अमाॅं*अमन शांति

बज़्मे-निशात*खुशियों की महफ़िल

शकूर अनवर

9460851271

********** ग़ज़ल**********

शकूर अनवर

देखता कौन हौसला मेरा।

सबने देखा है डूबना मेरा।।

*

मैं किसी के भी साथ क्या चलता।

था अलग सब से रास्ता मेरा।।

*

ज़ीस्त* गुज़री सनम परस्ती* में।

फिर भी रूठा है देवता मेरा।।

*

ये ज़माना तो ख़त्म कर देता।

आगे आया लिया-दिया मेरा।।

*

मैं ये समझा कहीं पे रख आया।

वो तो दिल में ही था ख़ुदा मेरा।।

*

याद रखना मेरी मुहब्बत को।

भूल जाना कहा-सुना मेरा।।

*

क्या डराता है ऐ ज़माने सुन।

जो भी होना था हो चुका मेरा।।

*

जो नहीं हूँ मैं वो दिखाता है।

है ख़फ़ा* मुझसे आईना मेरा।।

*

कितना बिखरा हुआ हूँ अब “अनवर”।

कितना मुश्किल था टूटना मेरा।।

*

शब्दार्थ:-

ज़ीस्त*जीवन ज़िंदगी

सनम परस्ती*मूर्ति पूजा करना

ख़फ़ा*नाराज़

शकूर अनवर

9460851271

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Popular Articles