गीता श्लोक 6/22….
ध्यान योगी विचलित नहीं होता..
भगवान कहते हैं कि जिस लाभ की प्राप्ति होने पर, उससे अधिक कोई दूसरा लाभ उसके मानने में भी नहीं आता और जिसमें स्थित होने पर वह साधक बड़े भारी दुख से भी विचलित भी नहीं किया जा सकता ।
ध्यान योगी क्यों नहीं विचलित किया जा सकता ? इसका कारण है कि जितने भी दुख आते हैं, वह सभी प्रकृति के राज्य में अर्थात शरीर, इंद्रियां, मन, बुद्धि में ही आते हैं । जावक अंदर के सुख स्वरूप सुख स्वरूप बौद्धिक प्रकृति से अतीत तत्व है । परंतु जब पुरुष प्रकृतिष्ठ अर्थात प्रकृति में स्थित हो जाता है अर्थात शरीर के साथ तालमेल कर लेता है, तब वह प्रकृति जन्य अनुकूल_ प्रतिकूल परिस्थिति में अपने को सुखी_ दुखी मानने लग जाता है । जब वह प्रकृति से संबंध विच्छेद करके अपने स्वरूप भूत सुख का अनुभव कर लेता है, उसमें स्थित हो जाता है, तो फिर यह प्राकृतिक दुख वहां तक पहुंच ही नहीं सकता ।
: गीता श्लोक 6/23…
साधक को एक निश्चय वाली बुद्धि बनानी चाहिए ।
भगवान कहते हैं कि जिसमें दुखों के सहयोग का ही वियोग है(अर्थात जिसके दुख दूर हट रहे हैं )उसी को योग नाम से जानना चाहिए। वह योग जिस ध्यानयोग का लक्ष्य है, उस ध्यानयोग का अभ्यास उकताए बिना चित्त से निश्चय पूर्वक करना चाहिए ।
जिसके साथ हमारा संबंध है ही नहीं, हुआ नहीं, होगा नहीं, और होना संभव नहीं । ऐसे दुख का स्वरूप संसार के साथ संबंध मान लिया यही दुख का सहयोग है । अगर यह योग होता है अर्थात संसार के साथ हमारा नित्य सहयोग होता है, तो इस दुख सहयोग का कभी वियोग अर्थात विच्छेद नहीं होता । परंतु बोध होने पर इसका वियोग हो जाता है । इससे सिद्ध होता है कि दुख का संयोग केवल हमारा माना हुआ या बनाया हुआ है ।
गीता श्लोक 6/24 ….
कामना तो जरासी भी शेष नहीं रहनी चाहिए ।
भगवान कहते हैं कि संकल्प से उत्पन्न होने वाली संपूर्ण कामनाओं का सर्वथा त्याग करके और मन से ही इंद्रिय समूह को सभी ओर से हटकर मन को परमात्मा में स्थित करके, परमात्मा के सिवाय और कुछ भी चिंतन नहीं करें ।
जो स्थिति कर्मफल का त्याग करने वाले कर्म योगी की होती है, वही स्थिति सगुण साकार भगवान का ध्यान करने वाले ध्यान योगी की भी होती है । अब निर्गुण निराकार का ध्यान करने वाले की भी वही स्थिति होती है । कामना का जरा सा भी भाग शेष नहीं रहना चाहिए । कामना का छोटा सा भाग भी शेष रहेगा तो वह बड़े रूप में परिवर्तित हो सकता है, जैसे वृक्ष का छोटा सा बीज पर उपयुक्त परिस्थितियों मिलने पर बड़े पौधे का रूप ले लेता है और समय अंतर में वह एक जंगल की स्थापना कर पाने में समर्थ होता है । कामना तो जरा सी भी नहीं रहनी चाहिए ।
गीता श्लोक 6/25….
कामनाओं का त्याग…..
भगवान कहते हैं कि धैर्य युक्त बुद्धि के द्वारा संसार से धीरे-धीरे उपराम हो जाए और मन बुद्धि को परमात्मा स्वरुप में पूरी तरह से स्थापन करके फिर कुछ भी चिंतन ना करें(इधर उधर की बातें ध्यान में न लाएं, केवल प्रभु का चिंतन करें ।
साधन करते-करते प्राय यह साधकों को उकताहट होती है, निराशा होती है, कि ध्यान लगाते, विचार करते, इतने दिन हो गए परंतु तत्व प्राप्त नहीं हुई, तो अब क्या होगी? अथवा कैसे होगी? इस बात को लेकर भगवान ध्यानयोग के साधन से कहते हैं कि सफलता होने पर भी वैसा ही धैर्य होना चाहिए कि वर्षों वर्ष बीत जाऐं , शरीर चला जाए, तो भी परवाह नहीं । परंतु ईश्वर को प्राप्त करना ही है । साधक उपराम (संसार से अलग होना)अर्थात अलग होने में जल्दी ना करें, किंतु धीरे-धीरे उपेक्षा करते-करते विषयों से उदासीन हो जाए और उदासीन होने पर उनसे पूर्णतया उपराम अर्थात अलग हो जाए ।
गीता श्लोक 6/26 ….
साधक चंचल मन को स्थिर करें..
भगवान कहते हैं कि यह अस्थिर और चंचल मन जहां विचरण करता है, वहां-वहां से हटकर इसको एक परमात्मा में ही भली भांति लगाएं ।
साधक ने जो ध्येय बनाया है, उसमें यह मन टिकता नहीं अर्थात ठहरता नहीं ।अतः इसको अस्थिर कहा गया है । यह मन तरह-तरह के सांसारिक भोगों का, पदार्थों का चिंतन करता है । इसको चंचल कहा गया है । यह मन न तो परमात्मा में स्थिर होता है और न संसार को ही छोड़ता है । इसलिए साधक को चाहिए कि यह मै
मन जहां जाए, जैसे जाए, जब जाए,तब _तब वहां से हटाकर परमात्मा में लगाना चाहिए ।
परमात्मा में मन लगाने के तरीके एक _मन जिस किसी इंद्रिय के विषय में चिंतन करने लग जाए इस समय उसे विषय से हटकर परमात्मा में लगाओ ।
दो _जहां-जहां मन जाए, वहां वहां परमात्मा को देखो।
तीन _ साधक जब परमात्मा में लगता है, तब संसार की बातें याद आती हैं, तब एकांत में बैठकर ईश्वर को बार-बार याद करें, चार_संसार का चिंतन स्वतः होता है, परंतु भगवान के चिंतन में मन लगाना पड़ता है अतः मन लगाओ।
पांच_ पलकों को पहले कई बार शीघ्रता से झटका यह फिर ईश्वर का नाम लेते हुए बंद करें और ईश्वर का स्मरण करते रहें ।
गीता श्लोक 6/27 ….
साधन का फल ……
भगवान कहते हैं कि जिसके सब पाप नष्ट हो गए हैं, जिसका रजोगुण शांत हो गया है तथा जिसका मन सर्वथा शांत और निर्मल हो गया है, ऐसे इस ब्रह्म रूप बने हुए योगी को निश्चित ही उत्तम अर्थात सात्विक सुख प्राप्त हो जाता है ।
जिसके संपूर्ण पाप नष्ट हो गए हैं, ऐसे योगी को अकल्मशम कहा गया है । जिसका रजोगुण शांत हो गया है, ऐसे योगी को शांतरजशम कहा गया है । तमोगुण, रजोगुण तथा उसकी वृत्ति शांत होने से जिसका मन स्वाभाविक शांत हो गया है, ऐसे स्वाभाविक शांत मन वाले को प्रशांतमनशम कहा गया है ।
ध्यान योगी जब तक मन को अपना मानता है, तब तक मन अभ्यास से शांत तो हो सकता है, परंतु प्रशांत अर्थात सर्वथाशांत नहीं हो सकता । परंतु जब ध्यानयोगी मन में भी आराम हो जाता है, तब मन में राग द्वेष न होने से उसका मन स्वाभाविक ही शांत हो जाता है । इसी अवस्था को प्रशांत अवस्था कहते हैं ।
गीता श्लोक 6 /28….
अत्यंत सुख ……..
भगवान कहते हैं कि इस प्रकार अपने आप को सदा परमात्मा में लगाता हुआ, पाप रहित योगी, सुखपूर्वक ब्रह्म प्राप्त रूप अत्यंत सुख का अनुभव कर लेता है ।
अपनी स्थिति के लिए जो अभ्यास किया जाता है, वह अभ्यास यहां नहीं है । यहां तो अहंता अर्थात “मै”पन का भाव और ममता से रहित होना और यही पापों से रहित होना है । साधक की ब्रह्म के साथ जो अभिन्नता होती है उसमें मैं पन का संस्कार भी नहीं रहता और सत्ता भी नहीं रहती । यही सुखपूर्वक ब्रह्म का संसर्प करना है । जिस सुख में अनुभव करने वाला और अनुभव में आने वाला यह दोनों ही रहते हैं, वह अत्यंत सुख है । इस सुख को योगी प्राप्त कर लेता है । यह अत्यंत सुख या अक्षय सुख और आत्यंतिक सुख यह एक ही परमात्मा तत्व स्वरूप आनंद के वाचक हैं ।
गीता श्लोक 6 /29…
सब जगह एक ही परमात्मा व्याप्त हैं..
भगवान कहते हैं कि सब जगह अपने स्वरूप को देखने वाला और ध्यान योग से युक्त अंतःकरण वाला सांख्य योगी अपने स्वरूप को संपूर्ण प्राणियों में स्थित देखता है और संपूर्ण प्राणियों को अपने स्वरूप में देखता है ।
सब जगह एक ही सच्चिदानंद घन परमात्मा ही परिपूर्ण हैं, ऐसे ही ध्यानयोगी तरह-तरह की वस्तु व्यक्ति आदि में समरूप से एक अपने स्वरूप को ही देखता है ।
योगयुक्तआत्मा __ इस पद का तात्पर्य है कि ध्यानयोग का अभ्यास करते-करते उस श्रेणी का अंतरण अपने स्वरूप में तल्लीन हो गया है । वह संपूर्ण प्राणियों में अपनी आत्मा को, अपने स्वरूप को देखा है। वह संपूर्ण प्राणियों को अपने अंतर्गत देखता है । उसको सब कुछ दिखाई देता है । वह सब में अपना स्वरूप ही देखता है ।
गीता श्लोक 6/30
मैं सब में हूं और सब मुझ में हैं….
भगवान कहते हैं कि जो भक्त सबमें मुझे यानी कि ईश्वर को देखता है और मुझमें सबको देखता है, उसके लिए मैं अदृश्य नहीं होता अर्थात उसको मैं सर्वत्र दिखाई देता रहता हूं और वह(साधक) मेरे लिए अदृश्य नहीं होता ।
जो भक्त सब देश, का, वस्तु पशु, पक्षी, देवता, यक्ष, राक्षस, पदार्थ, घटना आदि में मेरे को देखता है, ऐसे ही सिद्ध भक्त भगवान को सब जगह देखता है अर्थात उसकी दृष्टि में भगवान की सत्ता के सिवाय दूसरी किसी की सत्ता नहीं रहती ।
जब सब सब जगह मुझे ही देखता है, तो मैं उससे कैसे छिपूं और किसके पीछे छिपूं । इसलिए मैं उस भक्त के लिए अदृश्य नहीं रहता अर्थात मैं निरंतर उसके सामने रहता हूं, जो भगवान से अदृश्य रहता है । भगवान उसके लिए अदृश्य रहते हैं । वैसे तो भगवान कहते हैं कि मैं सब प्राणियों में समान हूं ।
गीता श्लोक 6/31 ….
भगवान हर प्राणी में स्थित हैं.. भगवान कहते हैं कि मुझ में एक ही भाव से स्थित जो भक्त योगी संपूर्ण प्राणियों में स्थित मेरा भजन करता है, वह सब कुछ वरताव करता हुआ भी मुझ में ही बर्ताव कर रहा है अर्थात वह नित्य निरंतर मुझ में ही स्थित है ।
भगवान केवल प्राणियों में ही स्थित है, ऐसी बात नहीं । भगवान तो संसार के कण कण में परिपूर्ण रूप से स्थित हैं । सृष्टि के पहले और सृष्टि के समय और सृष्टि के बाद एक परमात्मा ही परमात्मा है। परंतु लोगों की दृष्टि में प्राणियों और पदार्थ की सत्ता अलग प्रतीत होने के कारण उनको समझने के लिए कहा जाता है कि सब में एक ही परमात्मा है, दूसरा कोई नहीं । भगवान कहते हैं कि जो मेरे को सब में देखा है, उसके लिए मैं अदृश्य नहीं होता । संपूर्ण प्राणियों में स्थित मेरे साथ उसकी अभिन्नता हो गई है अर्थात मेरे साथ उसका अत्यधिक प्रेम हो गया है ।
गीता श्लोक 6/32…
भक्त का भगवान के साथ व्यवहार …….
भगवान कहते हैं कि है अर्जुन जो भक्त अपने शरीर की उपमा से सब जगह मुझे समान देखता है और सुख तथा दुख को भी सामान देखता है, वह परम योगी माना गया है ।
मनुष्य चाहता है कि उसके किसी अंग में किसी तरह की पीड़ा ना हो वैसे ही सब प्राणियों में भगवान को देखने वाला भक्त सभी प्राणियों का समान रूप से आराम चाहता है । उसके समान कोई दुखी प्राणी आ जाए तो अपने शरीर के किसी अंग का दुख दूर करने की स्वाभाविक चेष्टा होती है । जैसे साधारण मनुष्य अपने शरीर की पूरी चिंता रखता है, वैसे ही भक्त भी दूसरों के शरीर स्वस्थ रखने की स्वाभाविक चेष्टा करता है ।





