गीता श्लोक 3/28
गुणों से ही गुण उत्पन्न होते हैं …
भगवान कहते हैं कि हे महाबाहो (अर्जुन) ! गुण विभाग और कर्म विभाग को तत्व से जानने वाला महापुरुष, संपूर्ण गुण ही गुणों में वरत रहे हैं अर्थात गुणों से ही गुण उत्पन्न हो रहे हैं, ऐसा मानकर उसमें आसक्त नहीं होता ।
सत्व, रज और तम, यह तीनों गुण प्रकृतिजन्य हैं । इन तीनों गुणों का कार्य होने से संपूर्ण सृष्टि त्रुगुणात्मिक अर्थात तीन गुणों वाली है । अतः शरीर, इंद्रियां, मन, बुद्धि, प्राणी, पदार्थ आदि सर्व गुणमई हैं । यही गुण विभाग कहलाता है । शरीर आदि से होने वाली क्रियाएं कर्म विभाग कहलाती हैं । अज्ञानी पुरुष जब इन गुनविभाग और कर्मविभाग से अपना संबंध मान लेता है, तब वह बंध (बंधन में पड़) जाता है । शास्त्र की दृष्टि से तो इस बंधन का मुख्य कारण राग/आकर्षण ही है । परंतु साधक की दृष्टि से राग ही मुख्य आकर्षण है या कारण है । राग अभिव्यक्ति से होता है । विवेक जागृत होने पर राग नष्ट हो जाता है । यह विवेक विशेष रूप से मनुष्य में है । आवश्यकता केवल इस विवेक को जागृत करने की है ।
[ गीता श्लोक 3/29
अज्ञानी मनुष्य गुणों और कर्मों में आसक्त रहते हैं ….
हे अर्जुन ! प्रकृति जन्य गुणों से अत्यंत मोहित हुए, अज्ञानी मनुष्य गुणों और कर्मों में आसक्त रहते हैं। उन पूर्णतया न समझने वाले मूढ़ बुद्धि अज्ञानियों को पूर्णतया जानने वाला ज्ञानी मनुष्य विचलित न करें।
सत्यगुण, रजोगुण और तमोगुण, यह तीनों प्रकृति जन्य गुण मनुष्य को बंधन में डालने वाले हैं…
एक – सतोगुण सुख और ज्ञान की आसक्ति से होता है
दो – रजोगुण कर्म की आसक्ति से होता है और
तीन _ तमोगुण प्रमाद, आलस तथा निद्रा से मनुष्य को बांधता है।
अज्ञानी मनुष्य शुभ कर्म तो करते हैं, परंतु वह नित्य – निरंतर रहने वाले अर्थात नाशवान पदार्थों के लिए शुभ कर्म करते हैं। धन आदि प्राप्त पदार्थ में, वे ममता रखते हैं और प्राप्त पदार्थ की कामना करते हैं। इस प्रकार ममता और कामना से बंधे रहने के कारण वे गुन और कर्मों के तत्वों को पूर्ण रूप से नहीं जान सकते। अर्जुन ने कहा था प्रभु मुझे घोर कर्म में क्यों लगाते हो? उस प्रश्न का उत्तर भगवान ने कई तरह से दिया । इसका आशय था कि मेरा उद्देश्य तुझे घोर कर्म में लगाना नहीं है, वरन कर्मों से संबंध विच्छेद करने के लिए ही कर्म योग है ।
-कवि कालीचरण राजपूत






