गीता श्लोक 6/15….
मन पर अधिकार वाला नियत मानस है…..
भगवान कहते हैं कि वस में किए हुए मन वाला जोगी मन को इस तरह से सदा परमात्मा में लगाता हुआ, मुझ में सम्यक स्थिति वाली जो निर्वाण परम शांति है, उसको प्राप्त हो जाता है ।
जिस योगी का मन पर अधिकार है, वह नियत मानस कहलाता है । साधक नियत मानस तभी हो सकता है, जब उसके उद्देश्य में केवल परमात्मा ही रहते हैं परमात्मा के सिवाय उसका और किसी से संबंध नहीं रहता है । तब तक उसकी मन नियत नहीं हो सकता । ध्यानयोग का अभ्यास करना चाहिए । ध्यानयोग का अभ्यास कभी किया, कभी नहीं किया, ऐसा करने से योग सिद्ध नहीं हो सकता । योगी को प्रतिदिन नियमित रूप से परमात्मा प्राप्ति का लक्ष्य एकांत में अथवा व्यवहार निरंतर रहना चाहिए । शांति दो तरह की होती है
एक _शांति और
दो _परमशांति
परमात्मा तत्व की प्राप्ति होने पर परम शांति होती है, इसी परम शांति को गीता में नेष्ठिकी शांति नाम से कहा गया है ।
गीता श्लोक 6/16….
उचित मात्रा में भोजन लेने वाला ही योग सिद्ध कर सकता है…
भगवान कहते हैं कि हे अर्जुन! यह योग न तो अधिक खाने वाले का और न बिल्कुल न खाने वाले का तथा न अधिक सोने वाले का और न सदा जागने वाले का ही सिद्ध होता है ।
अधिक खाने वाले का योग सिद्ध नहीं होता । अधिक खाने से या फिर भूख से कम खाने से या भूख से ज्यादा खाने से भी योग सिद्ध नहीं होता क्योंकि अधिक अन्न खाने से प्यास अधिक लगती है और पानी ज्यादा पीना पड़ता है ज्यादा न खाने और ज्यादा पानी पीने से पेट भारी हो जाता है शरीर में आलस आ जाता है । योग करते समय बार-बार पेट का आलस याद आता है और योग में बाधा आती है । भजन, तप, ध्यान आदि कुछ भी करने का मन नहीं करता । वह न सुख पूर्वक बैठ पाता है और न सुखपूर्वक लेट पता है । फिर चलने _फिरने का तो मन ही नहीं करता । अजीर्ण होने से रोग हो जाते हैं । इसलिए अधिक खाना खाने वाले का योग सिद्ध नहीं होता । बिल्कुल खाना न खाने से भी योग सिद्ध नहीं होता । भोजन न करने से मन में बार-बार भोजन का चिंतन होता है । शरीर में शक्ति कम हो जाती है । शरीर शिथिल हो जाता है । मन भारी हो जाता है । चित्त, भगवान में नहीं लगता । ऐसे पुरुष का योग कैसे सिद्ध होगा ।
गीता श्लोक 6/17 ….
यथा योग्य व्यवहार करने वाले का ही योग सिद्ध होता है…
भगवान कहते हैं कि दुखों का नाश करने वाला योग तो, यथायोग्य आहार और बिहार करने वाले का, कर्मों में यथा योग्य चेष्टा करने वाले का, तथा यथा योग्य सोने और जागने वाले का ही सिद्ध होता है ।
भोजन सात्विक हो, अपवित्र न हो और न्याय पूर्ण कमाए हुए धन का हो, भोजन स्वादबुद्धि और पुष्टबुद्धि से न किया जाए । वरन भोजन सावधान बुद्धि से किया जाए । भोजन धर्मशास्त्र और आयुर्वेद की दृष्टि से किया जाए तथा उतना ही किया जाए, जितना आसानी से पचाया जा सके । भोजन शरीर के अनुकूल हो तथा वह हल्का और थोड़ी मात्रा में, खुराक से थोड़ा कम हो । ऐसा भोजन करने वाला बहुत ही युक्त आहार करने वाला है । बिहार भी यथा योग्य हो, न अधिक घूमने और न अधिक बैठना हो । बिहार स्वास्थ्य के लिए हितकर हो, वैसा ही होना चाहिए । व्यायाम, योगासन अधिक मात्रा में न किए जाएं और न कम मात्रा में किए जाएं । बिहार भी यथायोग्य ही होना चाहिए ।
गीता श्लोक 6 /18 …
योगी समस्त भौतिक इच्छाओं से मुक्त रहता है ….
भगवान कहते हैं कि वश में किया हुआ चित्त जिस काल में अपने स्वरूप में ही स्थित हो जाता है और स्वयं संपूर्ण पदार्थ से निष्प्रभ(प्रभावित नहीं होता) हो जाता है । उस काल में वह योगी है, ऐसा कहा जाता है ।
अच्छी तरह से बस में किया हुआ चित्त अर्थात संसार के चिंतन से रहित जब अपने स्वतः सिद्ध स्वरूप में स्थित हो जाता है । अपने स्वरूप में जो रस आनंद है, वह इस मन को कहीं भी और कभी भी नहीं मिला । साधारण मनुष्य की तुलना में योगी के कार्यों में यह विशेषता होती है कि वह समस्त भौतिक इच्छाओं से मुक्त रहता है । एक पूर्ण योगी अपने मानसिक कार्यों में इतना अनुशासित होता है कि उसे कोई भी भौतिक इच्छा विचलित नहीं कर सकती यह सिद्ध अवस्था कृष्ण भक्ति के व्यक्तियों द्वारा स्वतः प्राप्त हो जाती है ।
गीता श्लोक 6 /19…
योगी का मन चिंतन में लगा रहता है ….
भगवान कहते हैं कि जैसे स्पंदन रहित वायु के स्थान में स्थित दीपक की लौ चेष्टा रहित (हिलती डुलाती नहीं)हो जाती है,योगी का अभ्यास करते हुए बस में किए हुए चित्त वाले योगी के चित्त की वैसे ही उपमा कही गई है ।
जिस प्रकार सर्वथा स्पंदन, झोंके रहित वायु के स्थान में रखे हुए दीपक की लौ, थोड़ी भी हिलती डुलती नहीं है,ऐसे ही जो योग का अभ्यास करता है, जिसका मन स्वरूप के चिंतन में लगता है और जिसने चित्त को अपने वश में कर रखा है, उस ध्यान योगी के चित्त के लिए भी दीपक की लौ की तरह उपमा दी गई है । तात्पर्य यह है कि उस योगी का चिंतन, स्वरूप में ऐसा लगा हुआ है । उसमें एक स्वरूप के सिवाय दूसरा कुछ भी चिंतन नहीं होता । कोई भी स्थान वायु से सर्वथा रहित नहीं हो सकता । वायु सर्वत्र रहती है । कहीं पर वायु स्पंदन अर्थात झोंकों के साथ रहती है, और कहीं पर निष्पंदन रहित अर्थात झोंकों से रहित रूप में रहती है । दीपक के प्रकाश की विशेषता है कि वह आसपास की समस्त वस्तुओं को दृश्यमान बना देता है । ऐसे ही योगी के चित्त को परमात्मा तत्व में जागृति रहती है ।
गीता श्लोक 6/ 20 ….
योगी अपने आप में संतुष्ट रहता है
भगवान कहते हैं कि योग का सेवन करने से जिस अवस्था में निरोध चित्त उपराम हो जाता है (अलग हो जाता है , भटक जाता है ) तथा जिस अवस्था में स्वयं अपने _आप से अपने_ आप को देखता हुआ अपने आप में ही संतुष्ट हो जाता है ।
ध्यान में संसार के संबंध से विमुख होने पर एक शांति, एक सुख मिलता है, जो कि संसार का बंधन या संबंध रहने पर कभी नहीं मिलता । योग का अभ्यास करते-करते चित्त निरुद्ध अवस्था से भी अलग हो जाता है । उसे समय वह अपने_ आप का अनुभव करता हुआ अपने _आप में संतुष्ट रहता है । योगाभ्यास से मनुष्य भौतिक धारणाओं से क्रमशः(धीरे _धीरे) विरक्त हो जाता है । यह योग का प्रमुख लक्षण है । इसके बाद वह समझ (समझने लगता है ) में स्थित हो जाता है, जिसका अर्थ यह होता है कि दिव्य मन तथा बुद्धि के द्वारा योगी अपने को परमात्मा समझने का भ्रम न करके, ऐसा योगी परमात्मा की अनुभूति करता है ।
गीता श्लोक 6 /21…
संपूर्ण योगी अक्षय सुख का अनुभव करता है..
भगवान कहते हैं कि जो सुख आत्यंतिक और बुद्धि ग्राही है उसी सुख का जिस अवस्था में अनुभव करता है और जिस सुख में स्थित हुआ, ध्यान योगी तत्वों से फिर कभी विचलित नहीं होता ।
ध्यान योगी अपने द्वारा अपने_ आप में जिस सुख का अनुभव करता है, प्राकृत संसार में उस सुख से बढ़कर दूसरा कोई सुख है ही नहीं । यह संपूर्ण सुखों की आखिरी हद है(इसके आगे और कोई सुख नहीं, इस सुख से बड़ा और कोई सुख नहीं) । यह सुख सभी सुखों से उत्तम है । इस सुख को अक्षय सुख, आत्यंतिक सुख एवं एकांतिक सुख कहा गया है ।
के.सी.राजपूत





