Saturday, April 18, 2026
IMG-20260122-WA0067
previous arrow
next arrow

Top 5 This Week

Related Posts

ग़ज़ल-शकूर अनवर

एक नज़्म

शकूर अनवर

*

लहू रंग

—————–

क्या हमें याद है

दूसरे ही ख़लीफ़ा थे हज़रत उमर

शहर में गश्त करते थे जो रात भर

जो मसाइल* भी दरपेश आये उन्हें

हल निकाले गये हुस्ने-तदबीर* से

फ़र्क़ अच्छे बुरे में किया सोचकर

और फ़ारूक़े आज़म लक़ब* पा गये

क्या हमें याद है

और तुम भी सुनो

क्या तुम्हें याद है

क़ुफ़्ल* तुम भी घरों में लगाते न थे

कोई मेहमाॅं न हो ख़ुद भी खाते न थे

कर्म ही सार था ज़िंदगी का यहाँ

फल की इच्छा कहीं कोई रखता न था

वस्फ़* था ये तुम्हारे ही किरदार* का

जो वचन दे दिया उसको पूरा किया

क्या तुम्हें याद है

जब तुम्हें याद है जब हमें याद है

फिर ये कैसे हुआ

ये भी सोचें ज़रा

हमको अपनी विरासत पे जब नाज़ है

मुज़महिल* क्यूँ यहाँ ज़ीस्त का साज़* है

सहमी-सहमी सी क्यूँ दिल की आवाज़ है

कैसी परवाज़* है

क्या तगो-ताज़* है

मज़हबों की किताबों में क्यूँ जंग है

ज़िंदगी तंग है

क्यूँ ज़मीं सब्ज़ो-शादाब* होने के बदले

लहू रंग है, लहू रंग है

क्या तुम्हें याद है

क्या हमें याद है

*

शब्दार्थ:-

मसाइल*समस्याऍं

हुस्ने-तदबीर*अच्छे मशवरे के साथ

लकब*पहचान का नाम

कुफ्ल*ताला

वस्फ़*गुण विशेषता

किरदार*चरित्र

मुजमहिल*उदास ग़मगीन

ज़ीस्त का साज़*जीवन का संगीत

परवाज़*उफान

तगो-ताज़*जुस्तजू तलाश

सब्ज़ो-शादाब*हरा भरा, तरो ताज़ा

शकूर अनवर

9460851271

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Popular Articles