Wednesday, July 22, 2026
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ग़ज़ल -शकूर अनवर

ग़ज़ल

शकूर अनवर

थपेड़े तेज़ हवाओं के बार-बार लगे।

न डूब पाये कभी हम कभी न पार लगे।।

*

हम अपने घर की लगी आग ही में ख़ाक हुए।

ज़माने भर को बड़े चुस्त होशियार लगे।।

*

किसी नज़र में कभी तो रहें-बसें हम भी।

ख़ुदारा* दिल की ये कश्ती कहीं तो पार लगे।।

*

अब उसका बात न करना भी इक अदा समझूँ।

अब उसकी तल्ख़-कलामी*भी ख़ुशगवार* लगे।।

ग़ज़ल में लाओ कहीं से भी कोई बात नई।

अलग हो अपना तसव्वुर* अलग विचार लगे।।

*

कहाँ तलक तेरे ज़ुल्मो-सितम* का ज़िक्र करूँ।

सितारे गिनने का “अनवर” कहीं शुमार* लगे।।

*

शब्दार्थ:-

ख़ुदारा*ख़ुदा के वास्ते

तल्ख़-कलामी*कड़वाहट भरी बात चीत

ख़ुशगवार*आनंदित

तसव्वुर*कल्पना

ज़ुल्मो-सितम*अत्याचार

शुमार*गिनती

शकूर अनवर

9460851271

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