सब लेखनी के खेल है अब क्यों भुलाया मनुज ने
प्रेम मुंशी प्रेम या चंद का चंद था
सागर था मुंशी प्रेम का दिल का दिलेर था
चांदनी का चांद प्रेमी चांदनी चकोर था
प्रेम का दीवाना था तन का बीमार था
ज्ञान का भंडार था लालन का लाल था
गुड्डी का लाल प्रेमी धन का कंगाल था
लेखने का तीर संग तलवार थी ना भाल था
लेखनी का वीर प्रेमी वो भुलाई मनुज ने
धनपति इन नाम का धन का ना कोई काम था
झोपड़ी से प्यार का ऋषि प्यार संत था
संत तुलसी तूल था दुष्टॊं का शूल था
गांधी ज्यॊं त्याग प्रेमी मात भारत का लाल था
रचना सम्राट था ना दुख सुख से प्यार था
भारत का भरत मुंशी ले लखनी दहाड़ता
शासन का शाल था दुष्टॊं का काल था
लेखनी का तीर आज वॊ भुलाया मनुज ने
संत कवि मदनदास जी महाराज
रचना-मुंशी प्रेमचंद जयंती विशेष- संत कवि मदनदास जी महाराज






