Saturday, April 18, 2026
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श्रीमद् भागवद् गीता-के.सी.राजपूत

 गीता श्लोक 6/ 9

समबुद्धि मनुष्य श्रेष्ठ है….

भगवान कहते हैं कि सुहृदय, मित्र, बैरी,उदासीन, मध्यस्थ, द्वेश्य और संबंधियों में तथा साधु आचरण करने वालों में और पाप आचरण करने वालों में भी सम बुद्धि वाला मनुष्य श्रेष्ठ है ।

जो माता की तरह ही ममता रहित होकर बिना किसी कारण के सब का हित चाहने वाले और हित करने के स्वभाव वाला होता है, उसे सुहृदय कहते हैं । जो उपकार के बदले उपकार करें, उसे मित्र कहते हैं । अगर कोई दो व्यक्ति विवाद कर रहे हों, तो उनको देखकर जो भी तटस्थ अर्थात उदासीन रहता है, किसी का जरा भी पक्षपात नहीं करता और अपनी तरफ से कुछ कहता भी नहीं, वह उदासीन कहलाता है। परंतु दोनों की लड़ाई मिटाने का प्रयास करने वाला मध्यस्थ कहलाता है ।

गीता श्लोक 6/10….

साधक परमात्मा में ध्यान लगाए..

भगवान कहते हैं कि भोग बुद्धि से संग्रह न करने वाला इच्छा रहित और अंतःकरण तथा शरीर को वश में रखने वाला जो अकेला एकांत में स्थित होकर मन को निरंतर परमात्मा में लगाए।

अपरिग्रह_अपने लिए सुख बुद्धि से अर्थात सुख पाने की आकांक्षा से कुछ भी संग्रह न करने वाला अपरिग्रह कहलाता है । अपने सुख के लिए भोग और संग्रह करने में उसमें मन का खिंचाव रहेगा जिससे साधक का मन ध्यान में नहीं लगेगा । अतः ध्यान योग के साधन के लिए अपरिग्रह होना जरूरी है ।

एकाकी_ ध्यान योग का साधक अकेला हो साथ में कोई सहायक न हो, क्योंकि दो साधक होंगे तो बातचीत होने लग जाएगी और साथ में कोई सहायक होगा तो राग के कारण याद आती रहेगी, जिससे मन भगवान में नहीं लगेगा । अकेले साधना करने वाले को एकाकी कहते हैं।

गीता श्लोक 6/ 11 …

योगी का आसन कैसा हो ?भगवान कहते हैं की शुद्ध भूमि पर क्रमशः कुछ मृगछाला और वस्त्र विछा हो, जो न अत्यंत नीचा हो और ना अत्यंत ऊंचा हो । आसन पवित्र स्थान पर हो, ऐसे अपने आसन को स्थिर स्थापना करके….

शुचौ देशे __ इस पद का तात्पर्य होता है, शुद्ध स्थान, शुद्ध जमीन, शुद्ध आसन, आदि जहां बैठकर भगवान का नाम लिया जाता है अथवा प्रभु का जाप किया जाता है । वह स्थान शुद्ध होना चाहिए । शुद्ध जमीन या स्थान दो प्रकार का होता है__

एक_ स्वाभाविक शुद्ध स्थान जैसे पवित्र नदियों के किनारे की जगह, तुलसी, आम, पीपल, आदि वृक्षों के पास का स्थान ।

दो __ शुद्ध किया हुआ स्थान जैसे भूमि को गाय के गोबर से लीप कर अथवा जल छिड़क कर शुद्ध किया गया स्थान ।

भजन करने वाले योगी, जप करने वाले साधक, संत का आसन निम्न प्रकार होना चाहिए

साफ किए हुए स्थान पर पहले कुश अर्थात दाब घास बिछा दें फिर उसके ऊपर बिना मारे हुए (प्राकृतिक मृत्यु पाए हुए मृग की छाल) अर्थात प्राकृतिक मौत से मारे हुए, उस मृग की छाल बिछाऐं क्योंकि प्राकृतिक रूप से मरे हुए मृग का चर्म शुद्ध माना जाता है । अगर ऐसी मृगछाला न मिले तो कुश घास(दाब घास) पर टाट का बोरा अथवा ऊन का कंबल बिछा लें । उसके ऊपर सूती कपड़ा बिछाऐं । कुश घास अर्थात दाब घास बहुत पवित्र माना गया है, इसलिए उससे बना आसन काम में लाते हैं । अतः भगवान ने कुश घास बिछाने या उसका आसन बिछाने के लिए कहा है ।

(कहा जाता है कि भगवान वाराह अर्थात शूकर के रोम से कुश या कुशा या दाब घास उत्पन्न हुई है, इसलिए दाब या कुश या कुशा घास को पवित्र माना जाता है ।)

गीता श्लोक 6 /12 …

मन को एकाग्र करके योग का अभ्यास करे….

योगी उस आसन पर बैठकर चित्त और इंद्रियों की क्रियायों को वश में रखते हुए मन को एकाग्र करके अंतःकरण की शुद्धि के लिए योग का अभ्यास करे ।

योगी या साधक उस कुश के बने हुए आसन पर बैठकर सिद्धासन, पद्मासन, सुखासन, आदि जिस किसी आसन से सुखपूर्वक बैठ सके उस आसान में बैठ जाए । साधक जिस आसन पर बैठे, इस आसन पर कम से कम 3 घंटे तक बैठा रहे और साधना करता रहे । उतने समय तक इधर-उधर नहीं हिले डुले । ऐसा अभ्यास सिद्ध होने से मन और प्राण स्वत स्वाभाविक शांत हो जाते हैं । ज्ञान के समय शरीर का स्थिर रहना आवश्यक है । आसन पर बैठकर चित्त और इंद्रियों की क्रियाएं बस में रहनी चाहिए । साधक का मन एकाग्र रहे और केवल प्रभु का ही चिंतन करे । अंतःकरण की शुद्ध के लिए ही ध्यान योग का अभ्यास करे ।

गीता श्लोक 6 /13 …

साधक आसन पर स्थिर होकर बैठे…

भगवान कहते हैं कि “काय” अर्थात शरीर, सिर और गले को सीधा अचल धारण करके तथा दिशाओं को न देखकर केवल अपनी नासिका के अग्रभाग को देखते हुए साधक स्थिर होकर बैठे ।

काय अर्थ शरीर है । आसन पर बैठने के बाद कमर से लेकर गले तक के भाग को “काय” कहते हैं ऊपर के भाग का नाम सिर अथवा मस्तिष्क है सिर और काय के बीच के भाग को “ग्रीवा” अथवा गर्दन कहते हैं । ध्यान के समय काय और ग्रीवा सीधे रहने चाहिए । सिर, काय, ग्रीवा के आगे झुकने से नींद आती है तथा पीछे झुकने से जड़ता आती है । इसलिए योगी न आगे झुके और न पीछे झुके । दंड की तरह सीधा और सरल बैठा रहे । सिद्धासन, पद्मासन आदि जितने भी आसन हैं, आरोग्य की दृष्टि से सभी ध्यान योग में सहायक हैं । परंतु सिर, ग्रीवा और काय अर्थात शरीर को सीधा रखना अत्यंत आवश्यक है ।

गीता श्लोक 6 /14…

योगी मेरे परायण होकर बैठे….

भगवान कहते हैं कि जिसका अंतहकरण शांत है, जो भय रहित है और जो ब्रह्मचारी व्रत में स्थित है, ऐसा सावधान ध्यान योगी मन का संयम अर्थात मन को नियंत्रित करके मेरे में चित्त लगाता हुआ मेरे पारायण होकर बैठे ।

जिसका अंतहकरण राग द्वेष से रहित है, वह प्रशांत आत्मा है, जिसका सांसारिक विशेषता प्राप्त करने का रिद्धि_ सिद्धि आदि प्राप्त करने का उद्देश्य न होकर केवल परमात्मा प्राप्त का ही दृढ़ उद्देश्य होता है, उसके राग द्वेष शिथिल होकर मिट जाते हैं । राग द्वेष मिटने पर स्वत शांति आ जाती है । अतः स्वत सिद्ध शांति को प्राप्त करने वाला ही प्रशांत आत्मा है ।

ब्रह्मचारी व्रत का तात्पर्य केवल वीर्य रक्षा से नहीं है, वरन ब्रह्मचारी के व्रत से है । जैसे ब्रह्मचारी का जीवन गुरु की आज्ञा के अनुसार संयुक्त और नियत होता है l, ऐसे ही ध्यानयोगी को अपना जीवन संयुक्त और नियत रखना चाहिए । मन से किसी वस्तु का बार-बार मनन किया जाता है और चित्त से किसी वस्तु का चिंतन किया जाता है । योगी संसार का मनन नहीं करें वरन वह केवल भगवान का ही चिंतन करें अपने चित्त को केवल भगवान में लगा ले।

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