Saturday, April 18, 2026
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ग़ज़ल – शकूर अनवर

ग़ज़ल

शकूर अनवर

हर कहीं ग़म का ख़रीदार कहाँ मिलता है।

भाव मिलता है तो बाज़ार कहाँ मिलता है।।

*

दोस्ती का कोई मैयार* कहाँ मिलता है।

दोस्त मिल जाते हैं ग़म-ख़्वार* कहाँ मिलता है।।

*

बात मेरी है तो मैं इतना बुरा भी तो नहीं।

आपके जैसा भी सरकार कहाँ मिलता है।।

*

जी बहुत ख़ुश है तेरे इश्क़ में खाया जो फ़रेब*।

ऐसा धोका मगर हर बार कहाँ मिलता है।।

*

चारागर* जान भी ले ले तो मैं तुझसे ख़ुश हूँ।

मेरे जैसा कोई बीमार कहाँ मिलता है।।

*

न ग़िज़ा * इनको मयस्सर* न मुहय्या है इलाज।

इन ग़रीबों को ये अधिकार कहाँ मिलता है।।

*

लोग गाॅंधी पे सियासत तो बहुत करते हैं।

गाॅंधी जैसा कोई किरदार* कहाँ मिलता है।।

*

प्यार तो खुद ही पनपता है दिलों के अन्दर।

प्यार बाज़ार में तैयार कहाँ मिलता है।।

*

जिसमें इक़रार* की लज़्ज़त भी हो शामिल “अनवर”।

उनकी नज़रों में वो इन्कार कहाँ मिलता है।।

*

शब्दार्थ;+

मैयार*स्तर

ग़म-ख़्वार*दुख का साथी

फ़रेब*धोका

चारागर*चिकत्सक डॉक्टर

ग़िज़ा *भोजन

मयस्सर*प्राप्त होना

मुहय्या यानी उपलब्ध

किरदार*चरित्र

इक़रार*स्वीकृति

9460851271

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