ग़ज़ल
शकूर अनवर
हर कहीं ग़म का ख़रीदार कहाँ मिलता है।
भाव मिलता है तो बाज़ार कहाँ मिलता है।।
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दोस्ती का कोई मैयार* कहाँ मिलता है।
दोस्त मिल जाते हैं ग़म-ख़्वार* कहाँ मिलता है।।
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बात मेरी है तो मैं इतना बुरा भी तो नहीं।
आपके जैसा भी सरकार कहाँ मिलता है।।
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जी बहुत ख़ुश है तेरे इश्क़ में खाया जो फ़रेब*।
ऐसा धोका मगर हर बार कहाँ मिलता है।।
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चारागर* जान भी ले ले तो मैं तुझसे ख़ुश हूँ।
मेरे जैसा कोई बीमार कहाँ मिलता है।।
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न ग़िज़ा * इनको मयस्सर* न मुहय्या है इलाज।
इन ग़रीबों को ये अधिकार कहाँ मिलता है।।
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लोग गाॅंधी पे सियासत तो बहुत करते हैं।
गाॅंधी जैसा कोई किरदार* कहाँ मिलता है।।
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प्यार तो खुद ही पनपता है दिलों के अन्दर।
प्यार बाज़ार में तैयार कहाँ मिलता है।।
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जिसमें इक़रार* की लज़्ज़त भी हो शामिल “अनवर”।
उनकी नज़रों में वो इन्कार कहाँ मिलता है।।
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शब्दार्थ;+
मैयार*स्तर
ग़म-ख़्वार*दुख का साथी
फ़रेब*धोका
चारागर*चिकत्सक डॉक्टर
ग़िज़ा *भोजन
मयस्सर*प्राप्त होना
मुहय्या यानी उपलब्ध
किरदार*चरित्र
इक़रार*स्वीकृति
9460851271






