गीता श्लोक 6 /4 …
साधक के उद्धार की प्रेरणा…
भगवान कहते हैं कि जिस समय इंद्रियों के भोगों में तथा इन कर्मों में ही आसक्त होता है, वह समय, वह संपूर्ण संकल्पना का त्यागी मनुष्य, योगा रूढ़ कहा जाता है ।
इंद्रियों के भोगों में आसक्त न होने का साधन है_ इच्छा पूर्ति का सुख न लेना । सुख लेने पर इंद्रियों की भोगों में आवश्यकता बढ़ती है अतः साधक को चाहिए कि अनुकूल वस्तु पदार्थ आदि के मिलने की इच्छा ना करें और बिना इच्छा के अनुकूल वस्तु आदि मिल जाए, तो भी उसमें राजी ना हो ऐसा होने से इंद्रियों की भोगों में आवश्यकता नहीं रहेगी ।
हमारे पास निर्वाह के सिवाय जितनी अनुकूल वस्तुएं हैं ।सब अपनी नहीं है । वह किसकी हैं_ हमें पता नहीं । परंतु जब कोई अभावग्रस्त प्राणी मिल जाए तो उस सामग्री को उसी की समझ कर, उसको अर्पण कर देनी चाहिए और उसे देखकर यह मानना चाहिए कि निर्वाह से अतिरिक्त जो वस्तु है, मेरे पास पड़ी है या थी, उनसे मैं मुक्त हो गया हूं । जरूरत के अतिरिक्त वाली वस्तुओं को जरूरतमंद को सौंप दें । इससे भोग में आसक्त नहीं होगी ।
विचार करना चाहिए कि मैं शरीर नहीं हूं क्योंकि शरीर बदलता रहता है और मैं यानी कि आत्मा वही रहता हूं । यह शरीर मेरा भी नहीं है क्योंकि शरीर पर मेरा वश में नहीं रहता यह शरीर मेरे लिए भी नहीं है क्योंकि यदि यह शरीर मेरे लिए होता तो इसके मिलने पर मेरी कोई इच्छा बाकी नहीं रहती । यह शरीर परिवर्तनशील है और मैं अपरिवर्तनशील हूं ।
गीता श्लोक 6/5…
साधक के उद्धार की प्रेरणा.. भगवान कहते हैं कि अपने द्वारा अपना उद्धार करें,अपना पालन करें, तो क्योंकि आप ही अपना मित्र है और आप ही अपना शत्रु है ।
मनुष्य मात्र एक ऐसी विचार शक्ति है, जिसको काम में लाने से वह अपना उद्धार कर सकता है । ज्ञानयोग का साधन विचार शक्ति से जड़ चेतन का अलगाव करके चेतन में स्थित हो जाता है और जड़ से संबंध विच्छेद कर लेता है । भक्तियोग का साधन इस विचार शक्ति से, मैं भगवान का हूं और भगवान मेरे हैं, इस प्रकार भगवान से आत्मीयता करके अपना उद्धार कर लेता है ।
गीता श्लोक 6/6…. मनुष्य स्वयं अपना मित्र और शत्रु है…
भगवान कहते हैं कि जिसने अपने आप से, अपने आप को जीत लिया है, उसके लिए आप ही अपना बंधु है और जिसने अपने आप को नहीं जीता है, ऐसे अनात्मा का आत्मा ही शत्रुता में शत्रु की तरह बर्ताव करता है।
संसार में दूसरों की सहायता के बिना कोई किसी पर विजय प्राप्त नहीं कर सकता और दूसरों की सहायता लेना ही स्वयं को पराजित करना है। इस दृष्टि से स्वयं पहले पराजित होकर ही दूसरों पर विजय प्राप्त करता है । तात्पर्य यह हुआ कि जो किसी साधन से जिस किसी पर भी विजय प्राप्त करता है, स्वयं पराजित हुए बिना दूसरों पर कभी कोई विजय नहीं कर सकता । जो अपने आप पर विजय प्राप्त करता है, वही स्वयं अपना बंधु है कोई भी मनुष्य अपनी दृष्टि से अपने साथ शत्रुता का बर्ताव नहीं करता परंतु असत्य वस्तु का आश्रय लेकर मनुष्य अपने हित की दृष्टि से जो कुछ बर्ताव करता है वह बताओ वास्तव में अपने साथ शत्रु की तरह ही होता है ।
गीता श्लोक 6/7…
स्व _ विजयी के लिए भगवान नित्य प्राप्त हैं…
भगवान कहते हैं कि जिसने अपने आप पर विजय प्राप्त कर ली है, उस शीत उष्ण अर्थात अनुकूलता _ प्रतिकूलता सुख-दुख तथा मान अपमान में निर्विकार परमात्मा नित्य प्राप्त है ।
शीत अर्थात अनुकूलता की प्राप्त होने पर भीतर, मन में एक तरह की शीतलता मालूम होती है और उष्ण अर्थात प्रतिकूलता की प्राप्ति होने पर भीतर एक तरह का संताप मालूम देता है, तात्पर्य यह है कि भीतर में शीतलता हो और उष्णता हो, वरन एक समान शांति बनी रहे । अतः शीत में शांत रहने का तात्पर्य हुआ कि बाहर से होने वाले संयोग_ वियोग का भीतर असर न पड़े ।
जिनकी आत्मा मित्र की तरह है अर्थात जिसके शरीर में मैं और मेरापन नहीं है, वह अनुकूलता_ प्रतिकूलता,सुख_ दुख और मान_ अपमान प्राप्त होने पर भी सम अर्थात निर्विकार रहता है । ऐसा पुरुष सिद्ध कर्म योगी है अर्थात उसको परमात्मा का अनुभव हो चुका है, ऐसा मानना चाहिए सुख-दुख, मान _अपमान तो आते_ जाते रहते हैं, परंतु परमात्म तत्व वही रहता है ।





