Wednesday, August 26, 2026
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मलाला दिवस विशेष

*मलाला दिवस*

बहुत कम उम्र में विश्व महिला एवं बाल विकास के लिये वचन बद्ध नोबेल शांति पुरस्कार प्राप्त “मलाला यूसुफ़ज़ई”,जिसको इस सेवा से रोकने के लिए सिर में कट्टरपंथियों ने गोलियाँ मारी थीं। वे चिकित्सकों के अथक प्रयास से बचा ली गईं। और अपनी जान की परवाह किए बिना आज तक फिर से अपना मिशन जारी रखा है। इनके सम्मान में पूरे विश्व में 12 जुलाई को हर साल *मलाला दिवस* मनाया जाता है।

मेरी ग़ज़ल जो मैंने *मलाला* के लिए लिखी, आपके सामने प्रस्तुत है —

*”हव्वा की बेटी”*

*किसी औरत की चीख़ें सिसकियाँ हैं,आलमे हू है।*

*न जलती तीलियां फेंको, फ़िज़ा में तेल की बू है।।*

 

*मुहल्ले की कुंआरी लड़कियां मेंहदी से डरती हैं।*

*हिना है?या किसी दुल्हन के ख़्वाबों का लहू है।।*

 

*किया इंसां को पैदा, परवरिश की, दिल से ख़िदमत की।*

*मगर हव्वा की बेटी, आज भी बे आबरू है।।*

 

*न जाने ब्याह कर लाते हुए, क्यों भूल जाते हैं।*

*किसी की लाडली बेटी है जो अपनी बहू है।।*

 

*ज़रा सा हक़ जो मांगा तो मिली गोली *मलाला* को।।*

*मगर फिर भी न घबराई, बला की जंगजू है।।*

 

*ख़ुदा तू है सभी का पर तेरा इंसाफ़ कैसा है।*

*तशद्दुद का ये औरत क्यों निशाना चार सू है।*

 

*”सलीम”*इक लाश पाई है, किसी बच्ची को नोंचा है।*

*सवेरे से गली कूचों में येही गुफ़्तगू है।।*

(सलीम आफ़रीदी)

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आलमें हू-भयानक सन्नाटा/फ़िज़ा-वातावरण/बू-गंध/हिना-मंहदी/लहू-रक्त/जंग जू-प्रतिरोध करने वाली, लड़ाका/तशद्दुद – हिंसा/चार सू-चारों ओर/गुफ़्तगू-चर्चा।

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