Wednesday, April 29, 2026
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ग़ज़ल-शकूर अनवर

ग़ज़ल

शकूर अनवर

दिल तबीयत* की रवानी* पे मचलता ही न था।

कोई मौसम हो किसी तौर* बहलता ही न था।।

*

मेरी क़िस्मत का कोई चाॅंद निकलता ही न था।

आसमाॅं मेरे सितारों को बदलता ही न था।।

*

उस सितमगर* की इसी बात ने दिल जीत लिया!

साॅंप था साॅंप मगर ज़हर उगलता ही न था।।

*

ग़म की इफ़रात* से हर रात मेरी रोशन* थी।

गोया सूरज मेरी तक़़दीर का ढलता ही न था।।

*

मैं भी किस राह से मंज़िल की तरफ़ निकला हूँ।

मुझसे पहले कोई जिस राह पे चलता ही न था।।

*

शायरी अहदे-गुज़िश्ता* से निकल आई है।

जिसमें नग़मा कोई हालात का ढलता ही न था।।

*

क्यूँ हवाऍं चली आती हैं बुझाने “अनवर’।

ये मेरे घर का दीया तो कभी जलता ही न था।।

*

शब्दार्थ:-

तबीयत*स्वभाव

रवानी* तेज़ी तीव्रता

किसी तौर* किसी तरह

सितमगर*ज़ालिम प्रेमिका

इफ़रात*अधिकता

रोशन*चमकदार

अहदे-गुज़िश्ता*भूतकाल पुराना ज़माना

शकूर अनवर

9460851271

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