ग़ज़ल
शकूर अनवर
दिल तबीयत* की रवानी* पे मचलता ही न था।
कोई मौसम हो किसी तौर* बहलता ही न था।।
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मेरी क़िस्मत का कोई चाॅंद निकलता ही न था।
आसमाॅं मेरे सितारों को बदलता ही न था।।
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उस सितमगर* की इसी बात ने दिल जीत लिया!
साॅंप था साॅंप मगर ज़हर उगलता ही न था।।
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ग़म की इफ़रात* से हर रात मेरी रोशन* थी।
गोया सूरज मेरी तक़़दीर का ढलता ही न था।।
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मैं भी किस राह से मंज़िल की तरफ़ निकला हूँ।
मुझसे पहले कोई जिस राह पे चलता ही न था।।
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शायरी अहदे-गुज़िश्ता* से निकल आई है।
जिसमें नग़मा कोई हालात का ढलता ही न था।।
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क्यूँ हवाऍं चली आती हैं बुझाने “अनवर’।
ये मेरे घर का दीया तो कभी जलता ही न था।।
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शब्दार्थ:-
तबीयत*स्वभाव
रवानी* तेज़ी तीव्रता
किसी तौर* किसी तरह
सितमगर*ज़ालिम प्रेमिका
इफ़रात*अधिकता
रोशन*चमकदार
अहदे-गुज़िश्ता*भूतकाल पुराना ज़माना
शकूर अनवर
9460851271






