कोई मेरी आवाज सुनता नहीं…
मेरी आवाज जहां में कोई सुनता नहीं,
लोग गुनगुनाऐं ऐसे गीत कोई गुनता नहीं ।।
बिजलियां रोकें अनेकों आशियानों की,
ऐसे सुरक्षित आशियाने कोई बुनता नहीं ।।
हम अकेले ही वहां पुरजोर चिल्लाते रहे,
सुनसान में कोई हमारी नाद सुनता नहीं ।
गर गिरेंगीं बिजलियां इस वीरानगी में,
जो बचे हैं शेष वह भी तो सुनते नहीं ।।
यहां उम्मीद कम है हमें जहां में बचे रहने की,
कोई सबके मुताबिक घोंसले बुनता नहीं ।
जिंदगी सबकी संभालोगे तो होगा अम्नो चमन,
मिल बैठेंगे दरख़्त तले ऐसा अमन बनता नहीं ।।
ये वीरानियां हमारी हैं और ना ही तुम्हारी हैं,
आते वक्त सोचेंगे कब कहां बहार लानी है ?
हम कैसे रोकें इस क्रूर और बेजान मंजर को,
बस ऐसे ही चलेगी यह दुनिया दारे फानी है ।।
(दारे फानी = अस्थाई, क्षणिक)
K.c. Rajput






