ग़ज़ल
शकूर अनवर
बहुत गहरे हैं उन ऑंखों के मंज़र।
कहीं देखे नहीं ऐसे समन्दर।।
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चराग़ों से चराग़ों को जलाकर।
बनालो रोशनी का एक लश्कर*।।
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कहाँ जाऍंगी ये अपनों से कट कर।
रहेंगी मछलियाँ दरिया के अंदर।।
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ज़रा सी ज़िंदगी में सुख समेटो।
मिला है ओस को फूलों का बिस्तर।।
तुम अपनी असलियत भी खो रहे हो।
मिलेगा क्या तुम्हें चेहरा बदलकर।।
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तुम्हारी नफ़रतें तुम को मुबारक।
तुम अपने पास रक्खो अपने ख़ंजर।।
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कोई रोके ज़रा इस चाॅंदनी को।
कोई देखे सितारों को बुझाकर।।
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बहा ले जायेगा सैलाब* “अनवर”।
न रक्खो आप इतना घर सजा कर।।
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शब्दार्थ:-
लश्कर*समूह,क़ाफ़िला
सैलाब* बाढ़
शकूर अनवर
9460851271






