Tuesday, April 21, 2026
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ग़ज़ल-शकूर अनवर

ग़ज़ल

शकूर अनवर

बहुत गहरे हैं उन ऑंखों के मंज़र।

कहीं देखे नहीं ऐसे समन्दर।।

*

चराग़ों से चराग़ों को जलाकर।

बनालो रोशनी का एक लश्कर*।।

*

कहाँ जाऍंगी ये अपनों से कट कर।

रहेंगी मछलियाँ दरिया के अंदर।।

*

ज़रा सी ज़िंदगी में सुख समेटो।

मिला है ओस को फूलों का बिस्तर।।

 

तुम अपनी असलियत भी खो रहे हो।

मिलेगा क्या तुम्हें चेहरा बदलकर।।

*

तुम्हारी नफ़रतें तुम को मुबारक।

तुम अपने पास रक्खो अपने ख़ंजर।।

*

कोई रोके ज़रा इस चाॅंदनी को।

कोई देखे सितारों को बुझाकर।।

*

बहा ले जायेगा सैलाब* “अनवर”।

न रक्खो आप इतना घर सजा कर।।

*

शब्दार्थ:-

लश्कर*समूह,क़ाफ़िला

सैलाब* बाढ़

शकूर अनवर

9460851271

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