गीता श्लोक 4/34….
“तत्वज्ञान”
भगवान कहते हैं कि अर्जुन तुम उस तत्व ज्ञान को तत्वदर्शी ज्ञानी महापुरुषों के पास जाकर समझो । उनको साष्टांग प्रणाम करने से, उनकी सेवा करने से और सरलता पूर्वक प्रश्न करने से, वह तत्वदर्शी अर्थात अनुभवी, ज्ञानी, शास्त्रज्ञ महापुरुष तुझे उस तत्व ज्ञान का उपदेश देंगे ।
वैसे तो अर्जुन कह रहे थे कि….. 1_युद्ध में स्वजनों को मारकर मैं हित नहीं देखता ।
2_ इन आताताइयों को मांरने से तो पाप ही लगेगा ।
3_ युद्ध करने की अपेक्षा में भिक्षा मांग कर जीवन निर्वाह करना श्रेष्ठ समझता हूं ।
4_इस तरह अर्जुन युद्ध रूप कर्तव्य कर्म त्याग करना श्रेष्ठ समझते हैं ।
परंतु भगवान के मत के अनुसार ज्ञान प्राप्त के लिए कर्मों का त्याग करना आवश्यक नहीं । अतः यहां भगवान कह रहे हैं कि अगर तू कर्मों का स्वरूप से अर्थात शरीर से त्याग करके ज्ञान प्राप्त करने को ही श्रेष्ठ मानता है, तो तू किसी तत्वदर्शी ज्ञानी महापुरुष के पास जाकर विधिपूर्वक ज्ञान को प्राप्त कर । मैं तुझे इस तरह की सलाह नहीं दूंगा । वास्तव में भगवान अर्जुन को ज्ञानी महापुरुष के पास नहीं भेजना चाहते । वरन उसे चेतावनी देना चाहते हैं । वह कहते हैं कि यदि मेरी बात तेरे को उचित नहीं लग रही है, तो किसी ज्ञानी के पास जाकर क्रमानुसार ज्ञान प्राप्त कर ।
गीता श्लोक 4/35 ….
तत्वज्ञान का फल …..
हे अर्जुन! जिस तत्व ज्ञान का अनुभव करने के बाद तू फिर इस प्रकार मोह को नहीं प्राप्त होगा और हे अर्जुन जिस तत्व ज्ञान से तू संपूर्ण प्राणियों को विशेष भाव से पहले अपने में और उसके बाद मुझ सच्चिदानंद घन परमात्मा में देखेगा ।
भगवान ने अर्जुन से कहा कि वे महापुरुष तेरे को तत्वज्ञान का उपदेश देंगे । परंतु उपदेश सुनने से वास्तविक दिशा वोध का अनुभव नहीं होता । वास्तविक दिशा बोध स्वयं के द्वारा ही होता है और तब यह होता है, जब मनुष्य अपने विवेक को महत्व देता है । विवेक को महत्व देने से जब आज्ञान पूरी तरह मिट जाता है । तब वह विवेक ही वास्तविक दिशा बोध में परिणत हो जाता है वास्तविक दिशा बोध होने पर फिर कभी मोह नहीं रहता।
गीता के पहला अध्याय में अर्जुन का मोह प्रकट होता है कि युद्ध में सभी कुटुंबीजन, सगे संबंधी लोग, मर जाएंगे तो उन्हें पिंडदान और जल दान कौन देगा ? पिंडदान और जल न देने से वह नरको में जाएंगे । जो जीवित रह जाएंगे उनकी स्त्रियों का और बच्चों का निर्वाह और पालन कैसे होगा ? तत्वज्ञान होने के बाद ऐसा मोह नहीं रहता । बोध होने पर जब संसार से “मैं” और “मेरेपन” का संबंध नहीं रहता, तब पुनः मोह होने का प्रश्न ही नहीं उठाता ।
गीता श्लोक 4/36 ….
ज्ञान एक नौका है ……
हे अर्जुन अगर तू सब पापियों से भी अधिक पापी है, तो भी तू ज्ञान रूपी नौका के द्वारा निसंदेह संपूर्ण पाप समुद्र से अच्छी तरह तर जाएंगा ।
पाप करने की तीन श्रेणियां बताई गई है __
एक _पाप करने वाला
दो_ पापियों में एक से अधिक पाप करने वाला और
तीन _सारे पापियों में सबसे अधिक पाप करने वाला ।
इस श्लोक में एक पद पापकृतम आया है, इस पद के माध्यम से भगवान अर्जुन से कहते हैं कि अगर तू संपूर्ण पापियों में भी सबसे अधिक पाप करने वाला है, तब भी तत्वज्ञान से तू सभी पापों से तर जाएगा । इस तरह भगवान अर्जुन को आश्वासन दे रहे हैं कि जो पापों का त्याग करके साधन में लगा हुआ है, उसका तो कहना ही क्या ? परंतु जिसने पहले बहुत सारे पाप किए हैं, उसको भी जिज्ञासा जागृत होने के बाद अपने उद्धार के विषय में निराश नहीं होना चाहिए ।
गीता श्लोक 4/37 …..
ज्ञान रूप अग्नि पापों को नष्ट कर देती है ….
भगवान कहते हैं कि हे अर्जुन! जैसे प्रज्वलित अग्नि, ईंधन को सर्वथा भस्म कर देती है, ऐसे ही ज्ञान रूपी अग्नि, संपूर्ण भौतिक कर्मों के फलों को सर्वथा भस्म कर देती है ।
भगवान कहते हैं कि प्रज्वलित अग्नि कास्ठ संपूर्ण इंधनों को इस प्रकार भस्म कर देती है कि उनके किंचिन्मात्र भी अंश शेष नहीं रहता । ऐसे ही ज्ञान रूप अग्नि संपूर्ण पापों को इस प्रकार भस्म कर देती है कि उनके किंचिन्मात्र भी अंश शेष नहीं रहता । जैसे अग्नि कास्ठ को भस्म कर देती है वैसे ही तत्व ज्ञान रूपी अग्नि संचित, प्रारब्ध और क्रियामान तीनों कर्मों को भस्म कर देती है । वास्तव में क्रियाएं प्रकृति द्वारा होती है । उन क्रियायो से अपना संबंध मान लेने से कर्म होते हैं । तत्वज्ञान होने पर अनेक जन्मों के संचित कर्म सर्वथा नष्ट हो जाते हैं । क्योंकि सभी संचित कर्म अज्ञान के आश्रित रहते हैं । अतः ज्ञान होते ही अज्ञान नष्ट हो जाता है ।
गीता श्लोक 4/38 …..
ज्ञान मनुष्य को पवित्र करता है…
भगवान कहते हैं कि इस मनुष्य लोक में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला निसंदेह दूसरा कोई साधन नहीं है । जिसका योग भली- भांति सिद्ध हो गया है, वह कर्मयोगी उस तत्व ज्ञान को अवश्य ही स्वयं अपने आप में पा लेता है ।
मुख्यतः पवित्रता इस मनुष्य लोक में ही प्राप्त की जाती है । पवित्रता प्राप्त करने का अधिकार और अवसर मनुष्य शरीर में है । ऐसा अधिकार अन्य किसी शरीर में नहीं । अलग-अलग लोगों के अधिकार भी मनुष्य लोक से ही मिलते हैं । संसार में यज्ञ, दान, तप,पूजा, व्रत, उपवास, ध्यान, प्राणायाम जितने साधन हैं तथा गंगा, जमुना, गोदावरी आज जितने तीर्थ हैं, वे सभी मनुष्य के पापों का नाश करके उसे पवित्र करने वाले हैं । साधन, तीर्थ आदि पवित्र करने वाले हैं । परंतु तत्वज्ञान, उनमें सर्वप्रथम है । तत्वज्ञान उन सब का साध्य है । परमात्मा पवित्र से भी पवित्र हैं । उन्हें परम पवित्र परमात्मा का अनुभव करने वाला होने से तत्व ज्ञान भी अत्यंत पवित्र है ।
गीता श्लोक 4/39….
पुरुष ज्ञान प्राप्ति का पात्र है…
भगवान कहते हैं कि जो जितेंद्रिय तथा साधन परायण है, ऐसा श्रद्धावान मनुष्य ज्ञान को प्राप्त होता है और ज्ञान को प्राप्त होकर वह तत्काल परम शांति को प्राप्त हो जाता है ।
श्रद्धावान पुरुष को ज्ञान प्राप्त होता है ।अपने में श्रद्धा कम होने पर भी मनुष्य भूल से अपने को अधिक श्रद्धा वाला मान सकता है । इसलिए भगवान ने श्रद्धा की पहचान के लिए दो विशेषण दिए हैं_______
एक _ संयतेंद्रीय
दो _ तत्परह
संयतेंद्रीय_ जिसकी इंद्रियां पूर्णतया बस में है, वह संयतेद्रीय है ।
तत्पर _ जो अपने साधन में तत्परता पूर्वक लगा हुआ है वह तत्पर है ।
श्रद्धा परमात्मा में, महापुरुषों में, धर्म में और शास्त्रों में प्रत्यक्ष की तरह आदर पूर्वक विश्वास होना श्रद्धा कहलाती है ।
परमात्मा सर्वत्र रहते हुए भी अनुभव में नहीं आ रहे, इसलिए परमात्मा अपने में हैं, ऐसा मान लेने का नाम ही श्रद्धा है । अगर मनुष्य केवल परमात्मा को प्राप्त करना चाहता है, तो उसे अवश्य परमात्मा का ज्ञान हो जाता है ।
गीता श्लोक 4/40…
विवेकहीन पुरुष का पतन हो जाता है…..
भगवान कहते हैं कि विवेकहीन और श्रद्धा रहित संशय आत्मा मनुष्य का पतन हो जाता है । ऐसे संशय आत्मा मनुष्य का पतन हो जाता है ऐसे संशय आत्मा मनुष्य के लिए न तो यह लोक और परलोक हितकारक है और सुख ही है ।
जिस पुरुष का विवेक अभी जागृत नहीं हुआ है, उसमें जितना विवेक जागृत हुआ है, उसको महत्व नहीं देता और साथ ही जो अश्रिद्धालु है । ऐसे संशय युक्त पुरुष का परमार्थिक मार्ग से पतन हो जाता है । संशय नष्ट हुए बिना उन्नत कैसे हो सकती है? साधक का लक्षण है कि वह खोज करें यदि वह मन और इंद्रियों से अच्छी बात को ही सत्य मान लेता है, तो वहीं रुक जाता है । वह आगे नहीं बढ़ता । साधक को निरंतर आगे ही बढ़ता रहना चाहिए । संशय दूर करने वाला कोई न मिले तो भगवान कृपा से उसका संशय दूर हो जाता है ।
गीता श्लोक 4/41 …..
सिद्ध होने के लिए कर्मयोगी क्या करें ?…….
भगवान कहते हैं कि हे धनंजय! योग समता के द्वारा जिसका संपूर्ण कर्मों से संबंध विच्छेद हो गया है और विवेक ज्ञान के द्वारा इसके संपूर्ण संशयों का नाश हो गया है, ऐसे स्वरूप पारायण मनुष्य को कर्म ही बांधते हैं ।
शरीर, इंद्रियां, मन, बुद्धि, आदि जो वस्तुएं हमें मिली हैं और हमारी दिखाई देती हैं। वे सब दूसरों की सेवा के लिए ही हैं अपना अधिकार जमाने के लिए नहीं । इस दृष्टि से जब उन वस्तुओं को दूसरों की सेवा में उनका ही मानकर लगा दिया जाता है, तब कर्मों और अपने में स्वतह क्षमता का अनुभव हो जाता है । इस प्रकार योग या समता के द्वारा जिसने कर्मों से संबंध विच्छेद कर लिया है, वह पुरुष योगसन्यकर्मा अर्थात योग के द्वारा सारे कर्मों से संबंध विच्छेद करने वाला कहा जाता है । मनुष्य के अंदर कुछ संशय बने रहते हैं ।
एक __कर्म करते हुए ही कर्मों से अपना संबंध विच्छेद कैसे होगा? दो __अपने लिए कुछ न करें तो अपना कल्याण कैसे होगा?
गीता श्लोक 4/42 ….
अर्जुन! तुम अपने ज्ञान के द्वारा अपने संशय का नाश करो….
भगवान कहते हैं कि हे अर्जुन! हृदय में स्थित इस अज्ञान से उत्पन्न अपने संशय का, ज्ञान रूप तलवार से छेदन करके योग अर्थात समता में स्थित हो जा और युद्ध के लिए खड़ा हो जा ।
इस श्लोक के आरंभ में ही भगवान ने “तस्मात्” पद का प्रयोग किया है, जिसका अर्थ है कि अर्जुन तुम वैसा ही कर्तव्य कर्म करो, जैसा एक कर्मयोगी करता है और वह जन्म मरण के चक्कर से मुक्त हो जाता है । वास्तव में अर्जुन के मन में संशय था । इस युद्ध रूप घोर कर्म में मेरा कल्याण कैसे होगा और कल्याण के लिए मैं कर्मयोग का अनुष्ठान करूं अथवा ज्ञान योग का । श्लोक के माध्यम से भगवान अर्जुन का संशय दूर करने का प्रयास करते हैं । क्योंकि संसार के रहते हुए कर्तव्य का पालन ठीक प्रकार से नहीं हो सकता ।
भगवान बताते हैं कि सब संशय अज्ञान से ही उत्पन्न होते हैं क्रियायो और पदार्थों को अपना मानना ही अज्ञान है । यह अज्ञान जब तक रहता है,तब तक अंतःकरण में संशय रहते हैं क्योंकि क्रियाएं और पदार्थ विनाशी हैं । परंतु स्वरूप अविनाशी है । यहां भगवान अर्जुन को योग में स्थित होकर खड़े होने अर्थात युद्ध के लिए तैयार होने की आज्ञा देते हैं ।
गीता श्लोक 5/3….
कर्म योग श्रेष्ठ क्यों है ?….
भगवान कहते हैं कि हे महाबाहु अर्जुन! जो मनुष्य न किसी से द्वेष करता है और न किसी की आकांक्षा करता है, वह कर्मयोगी सदा सन्यासी समझने योग्य है । क्योंकि द्वंदों से रहित मनुष्य सुख पूर्वक संसार बंधन से मुक्त हो जाता है ।
यहां अर्जुन को महाबाहो कहकर संबोधित किया गया है । यहां मबाबाहो पद के दो अर्थ हैं..
एक _ महाबाहो अर्थात महान भुजाओं वाले,बलवान,शूरवीर ।
दो _ महाबाहो जिसके मित्र, भाई, सहयोगी, बड़े और बलवान पुरुष हों ।
अर्जुन मित्र हैं _ प्राणियों के ईश्वर श्री कृष्ण के और
अर्जुन के भाई हैं _ अजातशत्रु, जिनके जन्म से ही कोई शत्रु नहीं है अर्थात धर्मराज युधिष्ठिर ।
इसलिए अर्जुन के लिए महाबाहों संबोधन देकर भगवान अर्जुन से कह रहे हैं_ कि कर्मयोग के अनुसार सब की सेवा करने का बल तुम्हारे में है । तुम्हारी भुजाओ में परिपूर्ण बल है । अतः तुम सुगमता से कर्मयोग का पालन कर सकते हो । कर्मयोग वह होता है, जो किसी भी प्राणी पदार्थ, परिस्थिति,सिद्धांत आदि से द्वेष नहीं करता कर्मयोगी का काम है सब की सेवा करना । सबको सुख पहुंचाना । जिससे कुछ भी द्वेष हो उसकी सेवा कर्मयोगी को सर्वप्रथम करनी चाहिए ।





