हैं मयूर उपवन में ….
फूलों वाले सुंदर उपवन में, अभी-अभी तो हुआ है भोर ।
पंख पखेरू सब ही खुश हैं, नृत्य दिखाने आए मोर ।।
कुदरत का अलग रूप रंग, खिला-खिला है जीवन ।
प्रकृति का उपहार निराला,यह कर देती है सजीवन ।।
तरु पल्लव सब ही प्रमुदित हैं, इसकी प्रीत निराली ।
कैसे कौन रंग भरता है इसमें? प्रभु ही इसका माली।।
बालाएं प्रमुदित हैं मन में, सब बातें करती है आली ।
जहां-तहां सब लदी हुई हैं,फल फूलों से डाली ।।
जहां कहीं भी दृष्टि जा रही, वहां खिले हुए हैं फूल ।
दृश्य मनोरम इस उपवन का, पादप नहीं पहनते शूल ।।
नाना भांति पखेरु आकर, इसकी सभी बढ़ाते शान ।
गाते हैं वह मधुर स्वरों में, मिला मिलकर अपनी तान ।।
मानव सब सहयोगी बनकर,नित्य करें इसका वर्धन ।
आओ मिल कुछ क्षण तो बताएं, चिंता का होगा मर्दन ।।
हां चित्त प्रसन्न खूब रहेगा, दिल की सुधरेगी धड़कन ।
आओ बैठें प्रकृति गोद में, गदगद होगा सबका मन ।।
के. सी. राजपूत, कोटा ।
साहित्य रचना- हैं मयूर उपवन में…..कवि-के.सी.राजपूत✍





