Wednesday, April 22, 2026
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साहित्य रचना- हैं मयूर उपवन में…..कवि-के.सी.राजपूत✍

हैं मयूर उपवन में ….

फूलों वाले सुंदर उपवन में, अभी-अभी तो हुआ है भोर ।

पंख पखेरू सब ही खुश हैं, नृत्य दिखाने आए मोर ।।

कुदरत का अलग रूप रंग, खिला-खिला है जीवन ।

प्रकृति का उपहार निराला,यह कर देती है सजीवन ।।

तरु पल्लव सब ही प्रमुदित हैं, इसकी प्रीत निराली ।

कैसे कौन रंग भरता है इसमें? प्रभु ही इसका माली।।

बालाएं प्रमुदित हैं मन में, सब बातें करती है आली ।

जहां-तहां सब लदी हुई हैं,फल फूलों से डाली ।।

जहां कहीं भी दृष्टि जा रही, वहां खिले हुए हैं फूल ।

दृश्य मनोरम इस उपवन का, पादप नहीं पहनते शूल ।।

नाना भांति पखेरु आकर, इसकी सभी बढ़ाते शान ।

गाते हैं वह मधुर स्वरों में, मिला मिलकर अपनी तान ।।

मानव सब सहयोगी बनकर,नित्य करें इसका वर्धन ।

आओ मिल कुछ क्षण तो बताएं, चिंता का होगा मर्दन ।।

हां चित्त प्रसन्न खूब रहेगा, दिल की सुधरेगी धड़कन ।

आओ बैठें प्रकृति गोद में, गदगद होगा सबका मन ।।

के. सी. राजपूत, कोटा ।

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