ग़ज़ल
शकूर अनवर
जो भी शिकवा* किया बेअसर ही रहा।
बेख़बर था सनम* बेख़बर ही रहा।।
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तुझसे मिलने के दिन भी मयस्सर* हुए।
वो ज़माना मगर मुख़्तसर* ही रहा।।
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मौसमे-गुल* भी आया तो क्या फ़ायदा।
हसरतों का शजर* बेसमर* ही रहा।।
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पुरख़तर रास्तों से गुज़रते रहे।
मुश्किलों में हमारा सफ़र ही रहा।।
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शग़्ले-शेरो-सुख़न* हमसे छूटा नहीं।
रोग इसका हमें उम्र भर ही रहा।।
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एक दिन मैं भी तुझ से बिछड़ जाऊॅंगा।
ज़िंदगी भर मुझे इसका डर ही रहा।।
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इश्क़ के मरहलों* का सलीक़ा* न था।
इस हुनर में भी मैं बेहुनर ही रहा।।
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जिसकी आंखों में “अनवर” मैं चुभता रहा।
मेरी नज़रों में वो मोतबर* ही रहा।।
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शब्दार्थ:-
शिकवा*शिकायत
सनम*मूर्ति प्रेमिका
मयस्सर हुए*प्राप्त हुए
मुख़्तसर*संक्षिप्त
कठिन
मौसमे-गुल*बहार बसंत ऋतु
शजर*पेड़
बेसमर*फल विहीन
शग़्ल-ए-शेरो सुख़न*काव्य कर्म
मरहलों*पड़ावों
सलीका*ज्ञान तरीका
मोतबर*सम्मानित
✍शकूर अनवर
📞9460851271






