ग़ज़ल
खाई हैं इतनी ठोकरें राहे हयात* में।
अब जीना आ गया है मुझे मुश्किलात* में।।
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निकलीं हज़ार ख़्वाहिशें दिल की मिरे मगर।
फिर भी कमी न आई कभी ख़्वाहिशात* में।
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तुम हो जफ़ा सरिश्त* तो मैं हूँ वफ़ा परस्त*।
दोनों का है जवाब कहीं कायनात* में।।
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दिल तोड़ना भी कुफ़्र* है दैरो-हरम* तो क्या।
कितना असर था एक क़लंदर* की बात में।।
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किसकी सदा* सफ़र में ये देती है हौसला।
लग़जिश* न आये देखना पाए सबात* में।।
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किसने मिरी वफ़ा का किया ख़ून क्या कहूॅ॑।
है किस का हाथ क़त्ल की इस वारदात में।।
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बातें बनाना सीख ले उस शोख़* से कोई।
पहलू निकालता है नये बात- बात में।।
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उनकी निगाहे कह्र* का कल तक जो था हदफ़*।
क्यों है वो आज दाइरहे इल्तिफ़ात* में।।
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“परकाश” आ गया हमें जीने का अब हुनर।
मिलता है इक सुकून सा सोज़े हयात* में।।
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शब्दार्थ:-
राहे हयात*ज़िन्दगी की राह, एज
मुश्किलात * मुसीबतें,
ख़्वाहिशात*इच्छाएँ,
सरिश्त*मिज़ाज,
वफ़ा परस्त*वफ़ा को पूजने वाला,
कायनात*दुनिया,
कुफ़्र*पाप(ईश्वर को नहीं मानना)
दैरो-हरम*मंदिर-मस्जिद,
क़लंदर* फ़क़ीर,
सदा*आवाज़,
लग़जिश* फिसलना, ग़लती करना,
पाए सबात*मजबूती का क़दम,
शोख़*चंचल,
निगाहे कह्र*ग़ुस्से वाली नज़र,
हदफ़*निशाना,
दाइरहे इल्तिफ़ात* मेहरबानी के घेरे में।
सोज़े हयात* ज़िन्दगी की जलन,
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