Wednesday, April 22, 2026
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ग़ज़ल- वेद प्रकाश ‘प्रकाश’✍

ग़ज़ल

खाई हैं इतनी ठोकरें राहे हयात* में।

अब जीना आ गया है मुझे मुश्किलात* में।।

*

निकलीं हज़ार ख़्वाहिशें दिल की मिरे मगर।

फिर भी कमी न आई कभी ख़्वाहिशात* में।

*

तुम हो जफ़ा सरिश्त* तो मैं हूँ वफ़ा परस्त*।

दोनों का है जवाब कहीं कायनात* में।।

*

दिल तोड़ना भी कुफ़्र* है दैरो-हरम* तो क्या।

कितना असर था एक क़लंदर* की बात में।।

*

किसकी सदा* सफ़र में ये देती है हौसला।

लग़जिश* न आये देखना पाए सबात* में।।

*

किसने मिरी वफ़ा का किया ख़ून क्या कहूॅ॑।

है किस का हाथ क़त्ल की इस वारदात में।।

*

बातें बनाना सीख ले उस शोख़* से कोई।

पहलू निकालता है नये बात- बात में।।

*

उनकी निगाहे कह्र* का कल तक जो था हदफ़*।

क्यों है वो आज दाइरहे इल्तिफ़ात* में।।

*

“परकाश” आ गया हमें जीने का अब हुनर।

मिलता है इक सुकून सा सोज़े हयात* में।।

*

शब्दार्थ:-

राहे हयात*ज़िन्दगी की राह, एज

मुश्किलात * मुसीबतें,

ख़्वाहिशात*इच्छाएँ,

सरिश्त*मिज़ाज,

वफ़ा परस्त*वफ़ा को पूजने वाला,

कायनात*दुनिया,

कुफ़्र*पाप(ईश्वर को नहीं मानना)

दैरो-हरम*मंदिर-मस्जिद,

क़लंदर* फ़क़ीर,

सदा*आवाज़,

लग़जिश* फिसलना, ग़लती करना,

पाए सबात*मजबूती का क़दम,

शोख़*चंचल,

निगाहे कह्र*ग़ुस्से वाली नज़र,

हदफ़*निशाना,

दाइरहे इल्तिफ़ात* मेहरबानी के घेरे में।

सोज़े हयात* ज़िन्दगी की जलन,

*

वेद प्रकाश”परकाश” 44 बी. शाॅपिंग सेंटर कोटा (राज0)

📞मो0 9352602229-6378759991

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