# गिर कर उठना मनुज धर्म है
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गिरना-उठना, उठना-गिरना,
ये सब तो है चलता रहता ।
इसी तरह गतिमान समय का,
ऐसे यूँ ही ढलता रहता ।।
बार-बार गिर कर उठने में,
करना बिलकुल नहीं शर्म है ।
गिर कर फिर से ही उठ जाना,
यही तो प्यारे मनुज धर्म है ।।
सफल-असफलता के बारे में,
यही एक अपनाओ मत ।
आत्मविश्वास अगर जिंदा तो,
राई बन सकते पर्वत ।।
कर्म को उद्देश्य मान कर,
जीवन-पथ पर चलता चल ।
रहो अचल चट्टानों जैसे,
ख़तरा जाये स्वतः टल ।।
नव उल्लास रहे रग़ों में,
क़तरों में हो रवानी ।
सकारात्मक सोच अगर तो,
पर्वत बन जाये पानी ।।
जज्बे में वो भाव अनूठे ,
जिसमें कहीं छुपा मर्म है ।
गिर कर ही फिर से उठ जाना,
यही तो प्यारे मनुज धर्म है ।।
# स्वरचित/मौलिक/अप्रकाशित
# बृजेन्द्र सिंह झाला”पुखराज”,
कोटा (राजस्थान)
साहित्य- गिर कर उठना मनुज धर्म है. .कवि बृजेंद्र सिंह झाला “पुखराज”





