गीता ज्ञान………
उपदेश सुने भगवान के, अर्जुन हो लवलीन ।
बातों में वह कह गए, श्रद्धा होती तीन ।।
प्रभु ने ऐसा कह दिया, मानस जानें आम ।
निष्ठा भी तो तीन हैं, सत रज तम हैं नाम ।।
निष्ठा श्रद्धा एक हैं, बता गए प्रभु सत्य ।
गुण भी तो अब तीन हैं, तमो रजो और सत्व ।
पुरुष श्रद्धा होती हैं, उनके ही अनुरूप ।
नर भक्तिमय हैं सदा, उनका यही स्वरूप ।।
सात्विक पूजेँ देव को, रजस असुर गुणगान ।
तामस जन भूत प्रेत का, करते खूब बखान ।।
ईश्वर को नहीं मानते, करें वेद अपमान ।।
पुरुष अज्ञानी वे सभी, उनको आसुर जान।।
भोजन जो करते ग्रहण, भोज्य भेद हैं तीन ।
यज्ञादि दान तप जान लो, उनके खंड भी तीन ।।
सत्व रज तम तीन गुण, सत्व ही है महान ।
गुण एक दबाकर अन्य को, बन जाता बलवान ।।
रज गुण बढ़ता है कभी, तमो न पाता शान ।
रज दबने पर मान लो, सत्व दिखाए शान।
तम रज बढ़ता है कभी, तब नहिं बड़े प्रकाश । (सम्मान)
सत्वहि काया त्याग कर, नर पाता आकाश ।। (देवलोक)






