गीता श्लोक 4/39
पुरुष, ज्ञान प्राप्ति जा साधन है….
भगवान कहते हैं कि जीतेन्न्द्रिय तथा साधन पारायण है, ऐसा श्रद्धावन मनुष्य ज्ञान को प्राप्त होता है और ज्ञान को प्राप्त होकर वह तत्काल परम शांति को प्राप्त हो जाता है।
श्रद्धावन पुरुष को ज्ञान प्राप्त होता है। अपने में श्रद्धा कम होने पर भी मनुष्य भूल से अपने को अधिक श्रद्धा वाला मान सकता है, इसलिए भगवान ने श्रद्धा की पहचान के लिए दो विशेषण दिए हैं —
एक – संयतेंद्रीय – -जिसकी इंद्रियां पूर्णतया बस में है, वह संयतेद्रीय है।
दो – तत्परह – जो अपने साधन में तत्परता पूर्वक लगा हुआ है, वह तत्परह है
श्रद्धा परमात्मा में, महापुरुषों में, धर्म में और शास्त्रों में प्रत्यक्ष की तरह आदर पूर्वक विश्वास होना “श्रद्धा” कहलाती है।
परमात्मा सर्वत्र रहते हुए भी अनुभव में नहीं आ रहे। इसलिए परमात्मा अपने में हैं, ऐसा मान लेने का नाम ही श्रद्धा है। अगर मनुष्य केवल परमात्मा को प्राप्त करना चाहता है, तो उसे अवश्य परमात्मा का ज्ञान हो जाता है।
गीता श्लोक 4/40
विवेकहीन पुरुष का पतन हो जाता है…
भगवान कहते हैं कि विवेकहीन और श्रद्धा रहित, संशय आत्मा मनुष्य का पतन हो जाता है। ऐसे संशय आत्मा मनुष्य के लिए न तो यह लोक और न परलोक हितकारक है और न सुखकर ही है।
जिस पुरुष का विवेक अभी जागृत नहीं हुआ है तथा जिसका जितना विवेक जागृत हुआ है, उसको महत्व नहीं देता है और साथ ही जो अश्रद्धालु है, ऐसे संशय युक्त पुरुष का परमार्थिक मार्ग से पतन हो जाता है। संशय के नष्ट हुए बिना उन्नति कैसे हो सकती है। साधक का लक्षण है कि वह खोज करे। यदि वह मन और इंद्रियों से अच्छी बात को ही सत्य मान लेता है, तो वहीं रुक जाता है। वह आगे नहीं बढ़ पाता। परन्तु साधक को निरंतर आगे ही बढ़ता रहना चाहिए। संशय के रहते हुए कभी संतोष नहीं होना चाहिए। वरन जिज्ञासा बढ़ती ही रहनी चाहिए।
गीता श्लोक 4/41
शुद्ध बनने के लिये कर्मयोगी क्या करें…..
भगवान कहते हैं कि हे धनंजय! योग समता के द्वारा जिसका संपूर्ण कर्मों से संबंध विच्छेद हो गया है और विवेक, ज्ञान के द्वारा इसके संपूर्ण शंसयों का नाश हो गया है, ऐसे स्वरूप परायण मनुष्य को कर्म ही बांधते हैं, (अर्थात कर्मयोगी को कर्म के बंधनों में नहीं बंधना चाहिए)।
शरीर, इंद्रियां, मन, बुद्धि आदि जो वस्तुएं हमें मिली है और हमारी दिखती हैं, वह सब दूसरों की सेवा के लिए ही हैं,अपना अधिकार जमाने के लिए नहीं। इस दृष्टि से जब उन वस्तुओं को दूसरों की सेवा में लगा दिया जाता है, तब कर्मों और अपने में स्वत समता का अनुभव हो जाता है। इस प्रकार योग या समता के द्वारा जिसने कर्मों से संबंध विच्छेद कर लिया है, वह पुरुष “योगसन्यकर्मा ” अर्थात योग के द्वारा सारे कर्मों से संबंध विच्छेद करने वाला कहा जाता है। मनुष्य के अंदर कुछ संशय बने रहते हैं जैसे –
एक – कर्म करते हुए ही कर्मों से अपना संबंध विच्छेद कैसे होगा?
दो – अपने लिए कुछ न करें तो अपना कल्याण कैसे होगा आदि आदि?
इसका उत्तर है कि वह साधक कर्मों के तत्वों को अच्छी तरह जान ले तथा उसके समस्त संशय इस प्रकार से मिट जाएं।
गीता श्लोक 4/42
अर्जुन तुम स्वयं ही अपने ज्ञान के द्वारा अपने संशय का नाश करो…
भगवान कहते हैं कि हे अर्जुन! हृदय में स्थित इस आज्ञान से उत्पन्न अपने संशय का ज्ञान रूप तलवार से छेदन करके योग अर्थात समताओं में स्थित हो जा और युद्ध के लिए खड़ा हो जा।
इस श्लोक के आरंभ में तस्मात् पद का प्रयोग किया गया है जिसका अर्थ है कि अर्जुन तुम वैसा ही कर्तव्य कर्म करो, जैसा की एक कर्मयोगी करता है और वह जन्म – मरण के चक्कर से मुक्त हो जाता है। वास्तव में अर्जुन के मन में संशय था। इस युद्ध रूप घोर कर्म से मेरा कल्याण कैसे होगा और कल्याण के लिए मैं कर्मयोग का अनुष्ठान करूं अथवा ज्ञानयोग का। भगवान अर्जुन का संशय दूर करने का प्रयास करते हैं। क्योंकि संशय के रहते हुए कर्तव्य का पालन ठीक प्रकार से नहीं हो सकता। भगवान बताते हैं कि सब संशय अज्ञान से ही उत्पन्न होते हैं। जब तक अज्ञान हृदय में रहता है, तब तक अंतःकरण में संशय बने रहते हैं। भगवान – अर्जुन को योग में स्थित होकर, खड़े होने अर्थात युद्ध करने की आज्ञा देते हैं।
(इस प्रकार अध्याय -4 पूरा हुआ)
जय श्रीकृष्ण
श्रीमद्भगवद्गीता-कवि कालीचरण राजपूत






