Saturday, June 6, 2026
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श्रीमद्भगवद्गीता- कवि कालीचरण राजपूत

गीता श्लोक 3/36

मनुष्य स्वधर्म में प्रवृत्त क्यों नहीं होता……

अर्जुन बोले की हे वार्ष्णेय! फिर यह मनुष्य न चाहता हुआ भी जबरदस्ती लगाए हुए मनुष्य की तरह किससे प्रेरित होकर पाप का आचरण करता है ?

यादव कुल में वृषणि नाम का एक वंश था, इसी वंश में अवतार लेकर भगवान कृष्ण आए थे । अतः श्री कृष्ण के वंश का नाम वृषणि वंश था। इस वंश में जन्म लेने के कारण भगवान कृष्ण का एक नाम वार्ष्णेय भी है। धर्म – “वर्ण और कुल का होता है” । अतः अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण को उनके कुल, वंश का नाम वार्ष्णेय लेकर संबोधित करते हैं। क्या बलपूर्वक नियोजित करके किसी से कोई कार्य कराया जाप सकता है, नहीं। वही बात अर्जुन भगवान से पूछ रहे हैं कि मनुष्य जबरदस्ती की तरह, काम पर लगाए हुए की तरह, वह किस से प्रेरित होकर पाप का आचरण करता है?

दुर्योधन स्वयं कहता है कि “देव – वस्तुतः काम अर्थात भोग और संग्रह की इच्छा ही है, जिससे मनुष्य विचार पूर्वक जानता हुआ भी, धर्म का पालन और अधर्म का त्याग नहीं कर पाता। विचारवान मनुष्य स्वयं पाप नहीं करना चाहता, परंतु कोई अन्य ही उसे जबरदस्ती पाप में प्रवृत्त कर देता है।”

गीता श्लोक 3/36

मनुष्य स्वधर्म में प्रवृत्त क्यों नहीं होता……

अर्जुन बोले की हे वार्ष्णेय! फिर यह मनुष्य न चाहता हुआ भी जबरदस्ती लगाए हुए मनुष्य की तरह किससे प्रेरित होकर पाप का आचरण करता है ?

यादव कुल में वृषणि नाम का एक वंश था, इसी वंश में अवतार लेकर भगवान कृष्ण आए थे । अतः श्री कृष्ण के वंश का नाम वृषणि वंश था। इस वंश में जन्म लेने के कारण भगवान कृष्ण का एक नाम वार्ष्णेय भी है। धर्म – “वर्ण और कुल का होता है” । अतः अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण को उनके कुल, वंश का नाम वार्ष्णेय लेकर संबोधित करते हैं। क्या बलपूर्वक नियोजित करके किसी से कोई कार्य कराया जाप सकता है, नहीं। वही बात अर्जुन भगवान से पूछ रहे हैं कि मनुष्य जबरदस्ती की तरह, काम पर लगाए हुए की तरह, वह किस से प्रेरित होकर पाप का आचरण करता है?

दुर्योधन स्वयं कहता है कि “देव – वस्तुतः काम अर्थात भोग और संग्रह की इच्छा ही है, जिससे मनुष्य विचार पूर्वक जानता हुआ भी, धर्म का पालन और अधर्म का त्याग नहीं कर पाता। विचारवान मनुष्य स्वयं पाप नहीं करना चाहता, परंतु कोई अन्य ही उसे जबरदस्ती पाप में प्रवृत्त कर देता है।”

गीता श्लोक 3/37

कामना ही पाप का कारण है…

हे अर्जुन! रजोगुण से उत्पन्न यह काम अर्थात कामना ही पाप का कारण है। यह काम ही क्रोध में परिनित होता है । यह बहुत खाने वाला और महा पापी है। इस विषय में तू इसको ही वेरी जान ।

तृष्णा और आशक्ति से रजोगुण उत्पन्न होता है। यहां कहा जा रहा है कि रजोगुण से काम अर्थात कामना उत्पन्न होती है और काम से राग बढ़ता है। पाप कर्म कहीं तो काम अर्थात कामना के वसीभूत होकर और कहीं क्रोध के बसीभूत होकर, किया गया दिखाई देता है। भगवान ने तो कामना को ही पाप का मूल कारण कहा है। कामना वाले व्यक्ति को जागृत अवस्था में सुख मिलन तो दूर रहा, सपने में भी कभी सुख नहीं मिलता। काम अक्षत सुख सपने नाहीं।

नसवान पदार्थ की इच्छा ही काम कहलाती है। अविनाशी परमात्मा की इच्छा कामना के समान प्रतीत होती है । आमतौर पर कामनाओं का त्याग करना कठिन मानते हैं । परंतु विचार करें कि यदि कामनाओं का त्याग करना कठिन है, तो क्या कामनाओं की पूर्ति करना सरल है, नहीं, नहीं।

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