Tuesday, April 28, 2026
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श्रीमद्भगवद्गीता-कालीचरण राजपूत

गीता श्लोक 7/24 …

अल्प बुद्धि मनुष्य मुझे मनुष्य की तरह मानते हैं….

भगवान कहते हैं की अल्प बुद्धि हैं मनुष्य, मेरे परम अविनाशी और श्रेष्ठ भाव को न जानते हुए अव्यक्त मन और इंद्रियों पर मुझ सच्चिदानंद परमात्मा को मनुष्य की तरह शरीर धारण करने वाला मानते हैं ।

जो मनुष्य निरबुद्ध हैं और जिनकी मेरे में श्रद्धा भक्ति नहीं है वह अल्प मेधा अर्थात कम बुद्धि के कारण या कहा जाए समझ की कमी के कारण, मेरे को साधारण मनुष्य की तरह, अव्यक्त से व्यक्त होने वाला अर्थात जन्म वाला और मरने वाला मानते हैं । मेरे जो अविनाशी, अव्यय भाव, सदा रहने वाला अविनाशी है । ऐसे मेरे और अविनाशी भाव को अल्प बुद्धि पुरुष नहीं जानते और मेरे अवतार लेने का जो तत्व है, उसको नहीं जानते । इसलिए वह मेरे को साधारण मनुष्य मानकर मेरे मेरी उपासना नहीं करते, वरन देवताओं की उपासना करते हैं ।

गीता श्लोक 7/25 ….

में अज और अविनाशी हूं…

भगवान कहते हैं कि जो मूढ़ मनुष्य समुदाय मुझे अज और अविनाशी ठीक तरह से नहीं जानता या मान्यता, उन सबके सामने योग माया से अच्छी तरह से ढका हुआ, मैं प्रकट नहीं होता।

तब अज अर्थात अजन्मा रहता हुआ ही अवतार लेता हूं और अव्यय आत्मा रहता हुआ अदृश्य हो जाता हूं । भगवान कहते हैं कि मैं अज और अविनाशी हूं अर्थात जन्म मरण से रहित हूं । ऐसा होने पर भी, मैं प्रकट और अंतर ध्यान होने की लीला करता हूं । मैं जब अवतार लेता हूं तब अज अर्थात अजन्मा रहता हुआ ही अवतार लेता हूं और अव्यय आत्मा रहता हुआ अंतर ध्यान हो जाता हूं । जो मेरे को जन्म मरण से रहित मानते हैं, वह तो असम्म मूढ़ हैं। परंतु मेरे को जो साधारण प्राणियों की तरह जन्मने और मरने वाला मानते हैं वह मूड हैं । मूढ़ मनुष्यों को अज और अविनाशी नहीं जानते, उनके न जानने के कारण मेरा योग माया से छुपा रहना और उनकी स्वयं की मूढ़ता है ।

गीता श्लोक 7/26 …

मैं वर्तमान,भूत और भविष्य के प्राणियों को जानता हूं….

भगवान कहते हैं कि हे अर्जुन ! जो प्राणी भूतकाल में हो चुके हैं तथा जो वर्तमान में है और जो भविष्य में होंगे, उन सब प्राणियों को मैं जानता हूं । परंतु मुझे भक्तl के सिवाय कोई भी नहीं जानता ।

भगवान ने प्राणियों के लिए तो भूत वर्तमान और भविष्य तीन विशेषण दिए हैं, परंतु अपने लिए “अहम वेद”अर्थात मैं जानता हूं, ऐसा कहकर केवल वर्तमान काल का ही प्रयोग किया है । इसका तात्पर्य यह हो सकता है कि भगवान के लिए मनुष्य के वर्तमान, भूत और भविष्य काल तीनों ही वर्तमान काल हैं । अतः चाहे भूतकाल के प्राणी हो या वर्तमान काल के अथवा भविष्य काल के हों, भगवान के लिए तो वर्तमान काल के ही हैं । यह तीन काल तो केवल प्राणियों के लिए हैं भगवान के लिए तो एक ही काल है, वह है वर्तमान काल । भगवान जब भविष्य में होने वाले सब प्राणियों को जानते हैं, तो किसकी मुक्ति होगी और कौन बंधन में रहेगा, यह भी जानते ही है । क्योंकि भगवान का ज्ञान तो नित्य है । अतः वह जिसकी मुक्ति चाहते हैं, उसकी मुक्ति होगी और जिसका बंधन चाहते हैं, उसका बंधन होगा

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