माँ अम्बिके वरदायनी
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शक्ति-स्वरूपा-ज्योति-स्वरुपा,
माँ अम्बे वरदायनी ।
नव रुपों में विद्यमान माँ,
तू ही मंगलकारिणी ।।
अष्ठ-भुजाओं वाली माता,
तेरी जयजयकार है ।
सिंह पर होती सवार माँ,
करती बेड़ापार है ।।
कर में खड्ग-खप्पर धारे माँ,
लाल सिन्दूर-चूँदर धारें ।
ध्वजा-नारियल-पंचमेवा,
जननी तव चरणों पर वारें ।।
शेल-सुता-ब्रह्मचारिणी अम्बे,
चंद्रघंटा-कुष्माण्डा,
स्कंदमाता-कात्यायनी,
कालरात्रि जगदम्बिका ।।
महागौरी और सिद्धिदात्री,
लाज रखो हे मेरी माँ ।
तेरे चरणों के अतिरिक्त,
अन्य सहारा पाऊँ कहाँ ।।
ज्ञान-हीन-गुण-हीन तेरा,
कुछ छुपा नहीं तुझसे माता ।
अम्बिके वरदायनी माँ,
बेटे से रखना नाता ।।
(स्वरचित/मौलिक/अप्रकाशित)
(रचनाकार: बृजेन्द्र सिंह झाला”पुखराज”)
कोटा (राजस्थान)






